40% कम बारिश के साथ खत्म हो सकता है जून, कमजोर मानसून से खरीफ़ सीज़न पर बढ़ी चिंता, आगे भी राहत के आसार कम
Gaon Connection | Jun 30, 2026, 13:12 IST
जून का महीना देश में लगभग 40 प्रतिशत वर्षा की कमी के साथ समाप्त हो सकता है। 29 जून तक सामान्य से 42 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। मौसम मॉडल जुलाई से सितंबर के दौरान भी सामान्य से कम वर्षा की संभावना जता रहे हैं। कमजोर मानसून का असर खरीफ़ फसलों की बुआई के साथ उर्वरकों की माँग पर भी पड़ सकता है। अब कृषि क्षेत्र की उम्मीद जुलाई की बारिश और मानसून की प्रगति पर टिकी है।
जुलाई की वर्षा पर टिकी उम्मीदें
दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौजूदा सीज़न की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है और जून का महीना देश के लिए बड़ी वर्षा कमी के साथ समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के आँकड़ों के अनुसार 29 जून तक देश में सामान्य से 42 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। महीने के आख़िरी दिनों में कुछ इलाकों में बारिश में सुधार ज़रूर हुआ है, लेकिन इसके बावजूद जून के अंत तक वर्षा की कमी लगभग 39 से 40 प्रतिशत रहने का अनुमान है। ऐसे में खरीफ़ फसलों की बुआई, कृषि उत्पादन और वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
मानसून के आगे के प्रदर्शन को लेकर भी बहुत अधिक राहत की उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। आईएमडी समेत विभिन्न मौसम मॉडल संकेत दे रहे हैं कि जुलाई से सितंबर के दौरान बारिश में कोई असाधारण सुधार होने की संभावना नहीं है। यही कारण है कि कृषि क्षेत्र की नज़र अब जुलाई की बारिश पर टिकी हुई है, क्योंकि पूरे दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सबसे अधिक वर्षा इसी महीने होती है। यदि जुलाई में भी सामान्य से कम बारिश होती है, तो इसका असर खरीफ़ फसलों के उत्पादन और कृषि गतिविधियों पर पड़ सकता है।
आईएमडी ने इस वर्ष पूरे दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान दीर्घकालिक औसत (एलपीए) 86.86 सेंटीमीटर के मुकाबले 90 प्रतिशत वर्षा, यानी लगभग 78.17 सेंटीमीटर बारिश का अनुमान जताया है। यदि जून का कुल वर्षापात लगभग 10 सेंटीमीटर पर समाप्त होता है, तो जुलाई से सितंबर के बीच 68.17 सेंटीमीटर बारिश की आवश्यकता होगी। इसके बावजूद यह आँकड़ा इस अवधि के सामान्य वर्षापात से लगभग 3 प्रतिशत कम रहेगा।
29 जून तक देश में कुल वर्षा 9.21 सेंटीमीटर दर्ज की गई, जो सामान्य से 42 प्रतिशत कम है। महीने के पहले पखवाड़े में वर्षा की कमी 32 प्रतिशत थी, लेकिन 21 जून तक यह बढ़कर 41 प्रतिशत हो गई और उसके बाद लगातार 41 से 42 प्रतिशत के बीच बनी रही। 28, 29 और 30 जून के दौरान कुछ इलाकों में बारिश बढ़ने से कुल कमी में मामूली सुधार की संभावना है, लेकिन इससे तस्वीर में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद नहीं है।
इस बीच, दक्षिण कोरिया के बुसान स्थित एपेक क्लाइमेट सेंटर (APCC) के एक पूर्वानुमान में जुलाई से सितंबर के दौरान सामान्य से 53.8 प्रतिशत कम वर्षा होने का अनुमान जताया गया है, जिसे एशिया में सबसे बड़ी संभावित वर्षा कमी बताया गया है। आईएमडी जुलाई महीने का विस्तृत पूर्वानुमान 30 जून को जारी करेगा। जुलाई पूरे मानसून सीज़न की कुल वर्षा का लगभग 32 प्रतिशत हिस्सा देता है, इसलिए इसकी स्थिति कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कमज़ोर मानसून का असर केवल फसलों की बुआई तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उर्वरकों की खपत पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ने की संभावना है। कृषि क्षेत्र में उर्वरकों की माँग काफी हद तक वर्षा और बुआई की रफ़्तार पर निर्भर करती है। वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में यदि बारिश सामान्य से कम रहती है, तो उर्वरकों के उपयोग में भी कमी आ सकती है।
आँकड़ों के अनुसार 1 अप्रैल से 14 जून के बीच देश में 102.78 लाख टन उर्वरकों की बिक्री हुई है। जबकि पूरे खरीफ़ सीज़न के लिए अनुमानित आवश्यकता 390.56 लाख टन है। इसका मतलब है कि 15 जून से 30 सितंबर के बीच लगभग 281.12 लाख टन उर्वरकों की आपूर्ति का अनुमान था। हालांकि, यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो वास्तविक माँग अनुमान से कम रह सकती है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व उप महानिदेशक अनिल कुमार सिंह ने कहा कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में उर्वरकों की खपत सीधे मानसून पर निर्भर करती है। कई हिस्सों में मानसून देर से पहुँचा है, जिससे पहली बार उर्वरक डालने का काम भी टल गया है। आने वाले दिनों में लगातार होने वाली बारिश और खरीफ़ फसलों की बुआई की प्रगति ही यह तय करेगी कि उर्वरकों की वास्तविक खपत कितनी होगी।
मानसून के आगे के प्रदर्शन को लेकर भी बहुत अधिक राहत की उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। आईएमडी समेत विभिन्न मौसम मॉडल संकेत दे रहे हैं कि जुलाई से सितंबर के दौरान बारिश में कोई असाधारण सुधार होने की संभावना नहीं है। यही कारण है कि कृषि क्षेत्र की नज़र अब जुलाई की बारिश पर टिकी हुई है, क्योंकि पूरे दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सबसे अधिक वर्षा इसी महीने होती है। यदि जुलाई में भी सामान्य से कम बारिश होती है, तो इसका असर खरीफ़ फसलों के उत्पादन और कृषि गतिविधियों पर पड़ सकता है।
कई मौसम मॉडल सामान्य से कम वर्षा का अनुमान लगा रहे
29 जून तक देश में कुल वर्षा 9.21 सेंटीमीटर दर्ज की गई, जो सामान्य से 42 प्रतिशत कम है। महीने के पहले पखवाड़े में वर्षा की कमी 32 प्रतिशत थी, लेकिन 21 जून तक यह बढ़कर 41 प्रतिशत हो गई और उसके बाद लगातार 41 से 42 प्रतिशत के बीच बनी रही। 28, 29 और 30 जून के दौरान कुछ इलाकों में बारिश बढ़ने से कुल कमी में मामूली सुधार की संभावना है, लेकिन इससे तस्वीर में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद नहीं है।
इस बीच, दक्षिण कोरिया के बुसान स्थित एपेक क्लाइमेट सेंटर (APCC) के एक पूर्वानुमान में जुलाई से सितंबर के दौरान सामान्य से 53.8 प्रतिशत कम वर्षा होने का अनुमान जताया गया है, जिसे एशिया में सबसे बड़ी संभावित वर्षा कमी बताया गया है। आईएमडी जुलाई महीने का विस्तृत पूर्वानुमान 30 जून को जारी करेगा। जुलाई पूरे मानसून सीज़न की कुल वर्षा का लगभग 32 प्रतिशत हिस्सा देता है, इसलिए इसकी स्थिति कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कम बारिश से घट सकती है उर्वरक की माँग
आँकड़ों के अनुसार 1 अप्रैल से 14 जून के बीच देश में 102.78 लाख टन उर्वरकों की बिक्री हुई है। जबकि पूरे खरीफ़ सीज़न के लिए अनुमानित आवश्यकता 390.56 लाख टन है। इसका मतलब है कि 15 जून से 30 सितंबर के बीच लगभग 281.12 लाख टन उर्वरकों की आपूर्ति का अनुमान था। हालांकि, यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो वास्तविक माँग अनुमान से कम रह सकती है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व उप महानिदेशक अनिल कुमार सिंह ने कहा कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में उर्वरकों की खपत सीधे मानसून पर निर्भर करती है। कई हिस्सों में मानसून देर से पहुँचा है, जिससे पहली बार उर्वरक डालने का काम भी टल गया है। आने वाले दिनों में लगातार होने वाली बारिश और खरीफ़ फसलों की बुआई की प्रगति ही यह तय करेगी कि उर्वरकों की वास्तविक खपत कितनी होगी।