कमजोर मानसून और अल नीनो के खतरे से निपटने के लिए सरकार अलर्ट, खरीफ सीजन से पहले तैयार किया बड़ा कंटिजेंसी प्लान
Gaon Connection | May 23, 2026, 15:24 IST
इस वर्ष देश में कमजोर मानसून और अल नीनो के संभावित प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन के लिए एक महत्वपूर्ण योजना बनाई है। कृषि मंत्रालय ने राज्यों को सलाह दी है कि उन्हें कम जल की आवश्यकता वाली फसलों को प्रोत्साहित करना चाहिए। सूखे प्रभावित क्षेत्रों में विशेष बीज वितरित किए जा रहे हैं।
अल नीनो से बिगड़ सकता है खरीफ सीजन!
देश में इस साल कमजोर मानसून और अल नीनो के खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन से पहले बड़ा कंटिजेंसी प्लान तैयार किया है। कृषि मंत्रालय ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे जिला स्तर पर फसल रणनीति बनाएं और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को बढ़ावा दें ताकि खराब मौसम की स्थिति में किसानों को कम नुकसान हो।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस बार मानसून को सामान्य से कमजोर रहने का अनुमान जताया है। मौसम विभाग के अनुसार इस साल मानसून बारिश दीर्घकालिक औसत का करीब 92 प्रतिशत रह सकती है। साथ ही अल नीनो बनने की संभावना भी जताई गई है, जिसके कारण कई इलाकों में सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। मौसम विभाग ने कहा है कि अल नीनो की वजह से बारिश की मात्रा और वितरण दोनों प्रभावित हो सकते हैं, जिससे खरीफ फसलों की पैदावार पर असर पड़ने का खतरा बढ़ गया है।
कृषि मंत्रालय ने राज्यों को दालें, कुछ मोटे अनाज (मिलेट्स) और सब्जियों जैसी कम अवधि और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने को कहा है। अधिकारियों का मानना है कि ऐसी फसलें कम बारिश की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन दे सकती हैं और किसानों का जोखिम कम कर सकती हैं। सरकार का कहना है कि जल्दी तैयार होने वाली फसलें मौसम की अनिश्चितता और लंबे सूखे के दौर में किसानों के लिए ज्यादा सुरक्षित विकल्प साबित हो सकती हैं।
जिन जिलों में अल नीनो का असर ज्यादा पड़ने की आशंका है, वहां सरकार सूखा-रोधी बीजों का वितरण कर रही है। इस बार खरीफ सीजन की तैयारियों में मौसम निगरानी और बीज प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस बार सरकार मिशन मोड में काम कर रही है ताकि किसानों तक समय पर सही सलाह, वैकल्पिक खेती के विकल्प और जरूरी संसाधन पहुंचाए जा सकें।
देश में खरीफ सीजन की शुरुआत जून और जुलाई में होती है। इस दौरान धान, दालें, तिलहन, गन्ना और कपास जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई की जाती है। फसल की कटाई सितंबर और अक्टूबर में होती है। लेकिन इस बार बढ़ती गर्मी, कम बारिश की आशंका और अल नीनो के खतरे ने सरकार और कृषि वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है।
सरकार की चिंता सिर्फ मानसून तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास संकट की स्थिति के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। इसका असर उर्वरकों की कीमतों पर भी पड़ सकता है, जिससे किसानों की लागत बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उर्वरक महंगे हुए और मानसून कमजोर रहा तो किसानों पर दोहरा दबाव पड़ सकता है।
कृषि मंत्रालय ने राज्यों को क्षेत्रवार मौसम और बुवाई से जुड़ी एडवाइजरी भी जारी की है। राज्यों से कहा गया है कि वे जलाशयों के जल स्तर, सिंचाई व्यवस्था और खाद-बीज की उपलब्धता पर लगातार नजर रखें। सरकार चाहती है कि हर जिले की जलवायु और मौसम के अनुसार अलग रणनीति बनाई जाए ताकि नुकसान को कम किया जा सके।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले महीने खरीफ तैयारियों की समीक्षा बैठक में अधिकारियों को संभावित खराब मौसम से निपटने के लिए विस्तृत एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि किसानों को समय पर बीज, उर्वरक, वैकल्पिक फसल विकल्प और देर से बुवाई की रणनीति उपलब्ध कराई जाए ताकि मौसम की मार से बचाव किया जा सके।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से जुड़े वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के अनुसार अल नीनो वाले वर्षों में कई जिलों में खरीफ फसलों का उत्पादन 10 प्रतिशत से ज्यादा तक घट सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते तैयारी नहीं की गई तो धान, दाल और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार की यह तैयारी किसानों और देश की खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए अहम मानी जा रही है।