क्या 45 डिग्री तापमान में रहना हो जाएगा हमारे लिए नॉर्मल! तपती रातें और बेहाल शहर... क्या यही है भविष्य का मौसम?
Preeti Nahar | Jun 10, 2026, 18:08 IST
बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन दुनिया भर के शहरों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। चेन्नई में UNEP की पहल के तहत स्कूलों में पैसिव कूलिंग तकनीकों का इस्तेमाल कर कक्षाओं का तापमान कम किया गया है, जिससे छात्रों को राहत मिली है। यह पहल बताती है कि सही शहरी योजना, हरित क्षेत्र और पारंपरिक निर्माण तकनीकों के जरिए भीषण गर्मी के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
मुंबई में गर्मी से परेशान महिला
दिल्ली, चेन्नई, बैंकॉक या न्यूयॉर्क... दुनिया के लगभग हर बड़े शहर में गर्मी अब सिर्फ मौसम की समस्या नहीं रह गई है। बढ़ते तापमान का असर बच्चों की पढ़ाई, लोगों की सेहत और रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ दिखने लगा है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अगर शहरों ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में कई शहरों में रहना मुश्किल हो सकता है।
भारत समेत दुनिया के कई देशों में तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। हालात ऐसे हैं कि स्कूलों में बच्चे गर्मी के कारण पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, बाहर काम करने वाले मजदूरों के लिए काम करना मुश्किल होता जा रहा है और शहरों में रात के समय भी राहत नहीं मिल रही है।
भारत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के प्रमुख डॉक्टर बालकृष्ण पिसुपति का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ता शहरीकरण इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। कंक्रीट के जंगल, घटते हरित क्षेत्र और बढ़ती ऊर्जा खपत शहरों को लगातार गर्म बना रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का मानना है कि यदि शहरों ने समय रहते टिकाऊ और प्राकृतिक ठंडक वाले उपाय नहीं अपनाए, तो आने वाले वर्षों में कई बड़े शहरों में रहना और काम करना पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
देशभर के कई स्कूलों में दोपहर होते-होते कक्षाएं तपने लगती हैं। बाहर तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच जाता है। पंखे चलते हैं, लेकिन बच्चों को राहत नहीं मिलती। कई बच्चे थकान महसूस करते हैं, पढ़ाई में ध्यान नहीं लगा पाते और बार-बार पानी पीने को मजबूर हो जाते हैं। दुनिया के कई शहरों में लोग इसी तरह की गर्मी का सामना कर रहे हैं। कहीं कामकाज प्रभावित हो रहा है तो कहीं अस्पतालों में गर्मी से जुड़ी बीमारियों के मरीज बढ़ रहे हैं।
इसके पीछे दो बड़े कारण हैं:
पहला कारण है जलवायु परिवर्तन- कोयला, पेट्रोलियम और अन्य जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसें बढ़ रही हैं, जिससे धरती का तापमान लगातार ऊपर जा रहा है।
दूसरा कारण- शहरों की बनावट है। कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें और कम होते पेड़-पौधे शहरों को और ज्यादा गर्म बना रहे हैं।
वैज्ञानिक इसे "अर्बन हीट आइलैंड/Urban Heat Island" यानी शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव कहते हैं। दिनभर इमारतें और सड़कें गर्मी सोखती हैं और रात में धीरे-धीरे उसे छोड़ती रहती हैं।
भीषण गर्मी का असर हर व्यक्ति पर पड़ता है, लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को झेलनी पड़ती है। झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले परिवारों के पास गर्मी से बचने के पर्याप्त साधन नहीं होते। खेतों, निर्माण स्थलों और सड़कों पर काम करने वाले मजदूरों को तेज धूप में काम करना पड़ता है। वहीं बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है।
पहली नजर में एयर कंडीशनर यानी AC इसका आसान समाधान लगता है। UN की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि ये पूरी समस्या का जवाब नहीं है।
एक तो AC महंगा होता है और हर व्यक्ति इसे खरीद नहीं सकता। दूसरा, यह काफी बिजली खर्च करता है। यदि बिजली जीवाश्म ईंधन से बन रही है, तो इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और बढ़ता है, जो आगे चलकर गर्मी को और बढ़ा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक ठंडक पहुँचाने वाले उपकरण वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा बन सकते हैं।
शहरों को सिर्फ AC पर निर्भर रहने के बजाय ऐसे उपाय अपनाने होंगे जो प्राकृतिक रूप से तापमान कम करने में मदद करें।
शहरों में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाए जा सकते हैं। इसके अलावा इमारतों की छतों पर हल्के या सफेद रंग का इस्तेमाल करने से सूर्य की गर्मी कम अवशोषित होती है। ऐसे उपायों से घरों के अंदर का तापमान कई डिग्री तक कम किया जा सकता है।
शहरों को सबसे पहले अपनी सरकारी इमारतों, स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक संस्थानों में गर्मी से बचाव के बेहतर उपाय अपनाने चाहिए। इसके तहत प्राकृतिक रूप से तापमान कम रखने वाली तकनीकों का इस्तेमाल, बेहतर वेंटिलेशन, पंखों की व्यवस्था और जरूरत पड़ने पर ऊर्जा-कुशल एयर कंडीशनर लगाए जा सकते हैं।
यदि सरकारी संस्थान इस दिशा में पहल करते हैं, तो इससे बड़े पैमाने पर बदलाव की शुरुआत हो सकती है और अन्य संस्थानों को भी ऐसे उपाय अपनाने के लिए प्रेरणा मिल सकती है।
पहले भारत में घरों का निर्माण स्थानीय मौसम और जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता था। मिट्टी की दीवारें, ऊंची छतें, खुले आंगन और चूने का पलस्तर जैसी पारंपरिक तकनीकें घरों को बिना किसी मशीन के भी अपेक्षाकृत ठंडा बनाए रखती थीं। ये तरीके पीढ़ियों के अनुभव और स्थानीय जलवायु की समझ से विकसित हुए थे।
लेकिन समय के साथ इनकी जगह कंक्रीट और शीशे पर आधारित आधुनिक निर्माण ने ले ली। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे भवन गर्मी को अधिक सोखते हैं और लंबे समय तक रोककर रखते हैं, जिससे भीषण गर्मी के दौरान घरों के भीतर भी तापमान काफी बढ़ जाता है।
चेन्नई के कम आय वाले इलाकों के कई स्कूलों में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की मदद से पैसिव कूलिंग यानी प्राकृतिक शीतलन तकनीकें अपनाई जा रही हैं।
इसके तहत छतों पर गर्मी को परावर्तित करने वाले विशेष कोटिंग या हल्के रंगों का इस्तेमाल, खिड़कियों और वेंटिलेशन की बेहतर व्यवस्था, छायादार संरचनाएं, हरित आवरण (ग्रीन कवर) और भवनों के आसपास पेड़-पौधे लगाने जैसे उपाय किए गए हैं।
इन तकनीकों की मदद से स्कूलों के अंदर का तापमान करीब 3 डिग्री सेल्सियस तक कम करने में सफलता मिली है। इस पहल से लगभग डेढ़ लाख विद्यार्थियों को फायदा मिलने की संभावना है।डॉक्टर बालकृष्ण पिसुपति का कहना है कि यदि ऐसे मॉडल अन्य शहरों में भी अपनाए जाएं तो लाखों लोगों को राहत मिल सकती है।
बढ़ती गर्मी अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गई है। यह स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुकी है।
यदि शहर समय रहते पेड़-पौधों को बढ़ावा दें, ऊर्जा-कुशल निर्माण अपनाएं और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ें, तो बढ़ती गर्मी के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
आने वाले वर्षों में सवाल सिर्फ इतना नहीं होगा कि तापमान कितना बढ़ा, बल्कि यह भी होगा कि हमारे शहर उस गर्मी का सामना करने के लिए कितने तैयार हैं।
भारत समेत दुनिया के कई देशों में तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। हालात ऐसे हैं कि स्कूलों में बच्चे गर्मी के कारण पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, बाहर काम करने वाले मजदूरों के लिए काम करना मुश्किल होता जा रहा है और शहरों में रात के समय भी राहत नहीं मिल रही है।
भारत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के प्रमुख डॉक्टर बालकृष्ण पिसुपति का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ता शहरीकरण इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। कंक्रीट के जंगल, घटते हरित क्षेत्र और बढ़ती ऊर्जा खपत शहरों को लगातार गर्म बना रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का मानना है कि यदि शहरों ने समय रहते टिकाऊ और प्राकृतिक ठंडक वाले उपाय नहीं अपनाए, तो आने वाले वर्षों में कई बड़े शहरों में रहना और काम करना पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
गर्मी ने बदला स्कूलों का माहौल
गर्मी से राहत पाने की कोशिश करता बालक
आखिर इतनी गर्मी बढ़ क्यों रही है?
पहला कारण है जलवायु परिवर्तन- कोयला, पेट्रोलियम और अन्य जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसें बढ़ रही हैं, जिससे धरती का तापमान लगातार ऊपर जा रहा है।
दूसरा कारण- शहरों की बनावट है। कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें और कम होते पेड़-पौधे शहरों को और ज्यादा गर्म बना रहे हैं।
शहर खुद पैदा कर रहे हैं अतिरिक्त गर्मी
सबसे ज्यादा असर गरीब परिवारों पर
बढ़ती गर्मी से धूप में काम करने वाले मजदूर, सबसे अधिक प्रभावित
क्या सिर्फ AC ही समाधान है?
एक तो AC महंगा होता है और हर व्यक्ति इसे खरीद नहीं सकता। दूसरा, यह काफी बिजली खर्च करता है। यदि बिजली जीवाश्म ईंधन से बन रही है, तो इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और बढ़ता है, जो आगे चलकर गर्मी को और बढ़ा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक ठंडक पहुँचाने वाले उपकरण वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा बन सकते हैं।
फिर क्या हैं विकल्प?
पैसिव कूलिंग समाधानों अपनाएं जैसे- ठंडे फ़ुटपाथ और छाया प्रदान करने वाले वृक्ष
1. पेड़ और ठंडी छतें
2. सरकारी इमारतों से शुरुआत
यदि सरकारी संस्थान इस दिशा में पहल करते हैं, तो इससे बड़े पैमाने पर बदलाव की शुरुआत हो सकती है और अन्य संस्थानों को भी ऐसे उपाय अपनाने के लिए प्रेरणा मिल सकती है।
3. पुराने निर्माण तरीकों से सीख
लेकिन समय के साथ इनकी जगह कंक्रीट और शीशे पर आधारित आधुनिक निर्माण ने ले ली। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे भवन गर्मी को अधिक सोखते हैं और लंबे समय तक रोककर रखते हैं, जिससे भीषण गर्मी के दौरान घरों के भीतर भी तापमान काफी बढ़ जाता है।
चेन्नई में दिख रहा बदलाव
कक्षा में तापमान चैक करती छात्रा
इसके तहत छतों पर गर्मी को परावर्तित करने वाले विशेष कोटिंग या हल्के रंगों का इस्तेमाल, खिड़कियों और वेंटिलेशन की बेहतर व्यवस्था, छायादार संरचनाएं, हरित आवरण (ग्रीन कवर) और भवनों के आसपास पेड़-पौधे लगाने जैसे उपाय किए गए हैं।
इन तकनीकों की मदद से स्कूलों के अंदर का तापमान करीब 3 डिग्री सेल्सियस तक कम करने में सफलता मिली है। इस पहल से लगभग डेढ़ लाख विद्यार्थियों को फायदा मिलने की संभावना है।डॉक्टर बालकृष्ण पिसुपति का कहना है कि यदि ऐसे मॉडल अन्य शहरों में भी अपनाए जाएं तो लाखों लोगों को राहत मिल सकती है।
केवल मौसम नहीं, जीवन की गुणवत्ता का सवाल
यदि शहर समय रहते पेड़-पौधों को बढ़ावा दें, ऊर्जा-कुशल निर्माण अपनाएं और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ें, तो बढ़ती गर्मी के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
आने वाले वर्षों में सवाल सिर्फ इतना नहीं होगा कि तापमान कितना बढ़ा, बल्कि यह भी होगा कि हमारे शहर उस गर्मी का सामना करने के लिए कितने तैयार हैं।