गाँव की महिलाएं अब सिर्फ पानी भरेंगी नहीं गुणवत्ता जांचकर बनेंगी आत्मनिर्भर, जानें किस राज्य में मिलते हैं पानी जांच के पैसे?
Gaon Connection | May 28, 2026, 19:15 IST
उत्तर प्रदेश में जल जीवन मिशन अब सिर्फ घर-घर नल से पानी पहुंचाने तक सीमित नहीं है। गाँवों की महिलाएं अब पानी की गुणवत्ता जांचने की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं। फील्ड टेस्टिंग किट (FTK) के जरिए महिलाएं गाँवों में दूषित पानी की पहचान कर रही हैं, जिससे जलजनित बीमारियों पर तेजी से रोक लगाना संभव हो रहा है। यह पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय, तकनीकी प्रशिक्षण और आत्मनिर्भरता का नया जरिया भी बन रही है।
जल जीवन मिशन बना ग्रामीण महिलाओं की आय का नया जरिया
उत्तर प्रदेश के गाँवों में महिलाएं अब सिर्फ पानी भरने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पानी की शुद्धता जांचने की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं। योगी सरकार के जल जीवन मिशन के तहत प्रदेश के 97 हजार से अधिक गाँवों में महिलाओं के समूह फील्ड टेस्टिंग किट (FTK) के जरिए पेयजल की गुणवत्ता की निगरानी कर रहे हैं। इससे जहाँ गाँवों में स्वच्छ पेयजल सुनिश्चित करने में मदद मिल रही है, वहीं ग्रामीण महिलाओं के लिए कमाई और तकनीकी सशक्तीकरण के नए रास्ते भी खुल रहे हैं।
पहले गाँवों में पानी खराब होने की शिकायत आने पर जांच के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था। कई बार रिपोर्ट आने तक लोग दूषित पानी पीने को मजबूर रहते थे। लेकिन अब प्रशिक्षित महिलाएं गाँव स्तर पर ही पाइपलाइन, ट्यूबवेल और अन्य जल स्रोतों से नमूने लेकर तुरंत जांच कर रही हैं। पानी में किसी हानिकारक रसायन या बैक्टीरिया की आशंका मिलने पर विभाग को तुरंत सूचना दी जाती है, जिससे समय रहते कार्रवाई संभव हो पा रही है।
इस अभियान ने ग्रामीण महिलाओं को नई पहचान दी है। जल गुणवत्ता परीक्षण से जुड़ी महिलाओं को प्रति जांच मानदेय दिया जा रहा है। उन्हें एक जांच पर 20 रुपये की दर से भुगतान मिलता है और एक दिन में अधिकतम 400 रुपये तक कमाई संभव है। गाँवों में यह महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय और स्वरोजगार का नया माध्यम बनता जा रहा है। कई महिलाएं अब गाँव में “पानी जांचने वाली दीदी” के नाम से पहचानी जाने लगी हैं।
जल जीवन मिशन के तहत महिलाओं को विशेष तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया है। इसमें उन्हें फील्ड टेस्टिंग किट का संचालन, जल नमूनों का सुरक्षित संग्रहण, पानी के अलग-अलग पैरामीटर की जांच और मोबाइल ऐप के जरिए रिपोर्ट दर्ज करना सिखाया गया है। इससे महिलाएं सिर्फ योजना की लाभार्थी नहीं, बल्कि उसकी निगरानी और संचालन का सक्रिय हिस्सा बन गई हैं।
नमामि गंगे और ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष में अब तक लगभग 63,700 जल गुणवत्ता नमूनों की जांच की जा चुकी है। विभाग का कहना है कि गाँव स्तर पर नियमित निगरानी से दूषित पानी की पहचान और जलजनित बीमारियों की रोकथाम पहले के मुकाबले ज्यादा तेज और प्रभावी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल सिर्फ पेयजल गुणवत्ता सुधारने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ग्रामीण महिलाओं का आत्मविश्वास और सामाजिक भागीदारी भी बढ़ रही है। गाँवों में महिलाएं अब तकनीकी जिम्मेदारियां संभाल रही हैं और स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी अहम कड़ी बनती जा रही हैं।