World Coconut Day: नारियल की खेती में भारत सबसे आगे, हर साल 21,373 मिलियन से ज़्यादा नारियल का उत्पादन
Mansi | Sept 02, 2026, 12:06 IST
भारत नारियल उत्पादन में सबसे आगे है, जहां लाखों किसान इस पर निर्भर हैं। केरल की खेती में प्रमुखता है, जबकि तमिलनाडु उत्पादन में सबसे आगे है। तेल, दूध और कोयर जैसी मूल्यवान वस्तुएं नारियल से बनती हैं। घरेलू और वैश्विक बाजारों में इनकी खपत तेजी से बढ़ रही है। सरकार ने पुराने नारियल पेड़ों को बदलने और उत्पादकता में वृद्धि लाने के लिए कई योजनाएं बनाई हैं।
नारियल बना ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मज़बूत आधार
गर्मी में नारियल पानी की ठंडी घूँट हो या रसोई में नारियल का इस्तेमाल, पूजा-पाठ से लेकर साबुन, तेल और दूसरे उत्पादों तक नारियल हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कई तरह से शामिल है। लेकिन जिस नारियल को हम आमतौर पर एक फल या पेड़ के रूप में देखते हैं, उसके पीछे किसानों और ग्रामीण परिवारों की एक बड़ी अर्थव्यवस्था भी जुड़ी हुई है। देश में करीब 3 करोड़ लोग, जिनमें लगभग 1 करोड़ किसान शामिल हैं, नारियल क्षेत्र पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं। यही वजह है कि नारियल को कई जगह ‘ट्री ऑफ़ लाइफ़’ यानी जीवन का पेड़ भी कहा जाता है।
हर साल 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस मनाया जाता है। इस दिन का मक़सद नारियल के महत्व, इसके उत्पादन से जुड़े किसानों और इससे बनने वाले अलग-अलग उत्पादों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। 2026 में International Coconut Community ने नारियल क्षेत्र की चुनौतियों और संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए “Coconuts in Times of Uncertainty: Securing Food, Energy, and Livelihoods” थीम रखी है। यानी इस बार चर्चा सिर्फ़ नारियल खाने या पीने तक सीमित नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और लाखों लोगों की आजीविका से इसके रिश्ते पर भी है।
भारत नारियल उत्पादन के मामले में दुनिया के प्रमुख देशों में ही नहीं, बल्कि सरकारी 2026 के आँकड़ों के अनुसार दुनिया का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक देश है। भारत हर साल करीब 21,373.62 मिलियन नारियल का उत्पादन करता है और वैश्विक उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी लगभग 30.37 % है। देश में नारियल की खेती करीब 21.65 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के 2024-25 के आँकड़ों के मुताबिक भारत में करीब 2.19 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 13.97 मिलियन टन नारियल का उत्पादन हुआ। इस दौरान औसत उत्पादकता करीब 6.36 टन प्रति हेक्टेयर रही।
भारत में नारियल की खेती कई राज्यों में होती है, लेकिन दक्षिण भारतीय राज्यों का इसमें बड़ा योगदान है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक केरल नारियल के खेती क्षेत्र के मामले में आगे है, जबकि तमिलनाडु उत्पादन में अग्रणी है। वहीं आंध्र प्रदेश उत्पादकता के मामले में सबसे आगे है। इससे पता चलता है कि अलग-अलग राज्यों में नारियल की खेती और उसकी उत्पादकता की तस्वीर अलग है। नारियल की खेती से जुड़े किसानों के लिए यह सिर्फ़ खेत में खड़ी फसल नहीं है। एक पेड़ से मिलने वाला नारियल कई तरह के उत्पादों का आधार बन सकता है। यही वजह है कि नारियल की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करना किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक रास्ता माना जाता है।
नारियल का इस्तेमाल सिर्फ़ पानी पीने या गिरी खाने तक सीमित नहीं है। इससे नारियल तेल, वर्जिन नारियल तेल, नारियल दूध, सूखा नारियल, नारियल आधारित खाद्य उत्पाद और कई दूसरे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इसके छिलके और रेशे से कोयर जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं, जबकि नारियल के खोल का भी अलग-अलग कामों में इस्तेमाल होता है। नारियल के पेड़ का लगभग हर हिस्सा किसी न किसी रूप में उपयोगी है। यही बात इसे किसानों और ग्रामीण स्तर पर छोटे कारोबार के लिए भी महत्वपूर्ण बनाती है। कच्चे नारियल की बिक्री के साथ अगर स्थानीय स्तर पर उसकी प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन बढ़े, तो किसानों और छोटे उद्यमियों के लिए कमाई के नए रास्ते बन सकते हैं।
भारत में नारियल और इससे जुड़े उत्पादों की माँग घरेलू बाज़ार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी बढ़ रही है। भारतीय निर्यात में अब पारंपरिक उत्पादों के साथ वर्जिन नारियल ऑयल, नारियल मिल्क और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे वैल्यू-एडेड उत्पाद भी शामिल हो रहे हैं। इससे नारियल को सिर्फ़ कृषि उपज के बजाय एक बड़े ग्रामीण कारोबार के रूप में देखने की संभावना बढ़ती है।
नारियल क्षेत्र के सामने कई चुनौतियाँ हैं। पुराने और कम उत्पादक पेड़, बदलता मौसम, कीट एवं रोग, उत्पादन लागत और बाज़ार की कीमतों में उतार-चढ़ाव किसानों की कमाई को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में उत्पादकता बढ़ाने के साथ पुराने पेड़ों की जगह बेहतर पौधों और किस्मों को बढ़ावा देना भी ज़रूरी है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने 2026-27 के बजट में नारियल प्रोत्साहन योजना की घोषणा की है। इसका उद्देश्य नारियल उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना तथा प्रमुख नारियल उत्पादक राज्यों में पुराने और गैर-उत्पादक पेड़ों को नए पौधों और बेहतर किस्मों से बदलने जैसे उपायों को बढ़ावा देना है। नारियल समेत उच्च-मूल्य वाली फसलों के लिए ₹350 करोड़ के व्यापक आवंटन का प्रावधान किया गया है।
नारियल दिवस की असली अहमियत यहीं समझ आती है। अगर किसान सिर्फ़ कच्चा नारियल बेचता है, तो उसकी कमाई बाज़ार की कीमत पर निर्भर रहती है। लेकिन उसी नारियल से तेल, दूध, सूखे उत्पाद, कोयर या दूसरे सामान तैयार किए जाएँ, तो उसकी कीमत और उपयोग दोनों बढ़ सकते हैं। 2026 का विश्व नारियल दिवस भी इसी व्यापक सोच की ओर इशारा करता है नारियल को सिर्फ़ एक फसल नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, रोज़गार और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी पूरी अर्थव्यवस्था के रूप में देखने की ज़रूरत है। भारत के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में करोड़ों लोगों की आजीविका इस क्षेत्र से जुड़ी है।
हर साल 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस मनाया जाता है। इस दिन का मक़सद नारियल के महत्व, इसके उत्पादन से जुड़े किसानों और इससे बनने वाले अलग-अलग उत्पादों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। 2026 में International Coconut Community ने नारियल क्षेत्र की चुनौतियों और संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए “Coconuts in Times of Uncertainty: Securing Food, Energy, and Livelihoods” थीम रखी है। यानी इस बार चर्चा सिर्फ़ नारियल खाने या पीने तक सीमित नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और लाखों लोगों की आजीविका से इसके रिश्ते पर भी है।
नारियल उत्पादन में भारत दुनिया में सबसे आगे
केरल में सबसे ज़्यादा क्षेत्र, तमिलनाडु उत्पादन में आगे
एक नारियल से कई तरह के उत्पाद
भारत का नारियल अब सिर्फ़ घरेलू बाज़ार तक सीमित नहीं
नारियल क्षेत्र के सामने कई चुनौतियाँ हैं। पुराने और कम उत्पादक पेड़, बदलता मौसम, कीट एवं रोग, उत्पादन लागत और बाज़ार की कीमतों में उतार-चढ़ाव किसानों की कमाई को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में उत्पादकता बढ़ाने के साथ पुराने पेड़ों की जगह बेहतर पौधों और किस्मों को बढ़ावा देना भी ज़रूरी है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने 2026-27 के बजट में नारियल प्रोत्साहन योजना की घोषणा की है। इसका उद्देश्य नारियल उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना तथा प्रमुख नारियल उत्पादक राज्यों में पुराने और गैर-उत्पादक पेड़ों को नए पौधों और बेहतर किस्मों से बदलने जैसे उपायों को बढ़ावा देना है। नारियल समेत उच्च-मूल्य वाली फसलों के लिए ₹350 करोड़ के व्यापक आवंटन का प्रावधान किया गया है।