ग्लोबल संकट, महँगी खाद और बढ़ता सब्सिडी बिल: क्यों सरकार उठा रही है लाखों करोड़ रुपये का बोझ?

Lata Mishra | Jun 10, 2026, 13:45 IST
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मिडिल ईस्ट के तनाव, लाल सागर और हॉर्मुज़ में बढ़ते ख़तरों, और चीन के खाद एक्सपोर्ट बैन ने ग्लोबल फर्टिलाइज़र मार्केट को हिला दिया है। भारत भी DAP, पोटाश और यूरिया के लिए इंपोर्ट पर निर्भर है। इंटरनेशनल रेट्स बढ़ने के बावजूद, किसानों को फर्टिलाइज़र फ़िक्स रेट पर मिल रहे हैं, जिससे सरकार का सब्सिडी बिल रिकॉर्ड तोड़ रहा है।

<strong>ग्लोबल संकट से क्यों बढ़ रहा है खाद सब्सिडी का बोझ?</strong>
ग्लोबल संकट से क्यों बढ़ रहा है खाद सब्सिडी का बोझ?
मिडिल ईस्ट के तनाव, लाल सागर और हॉर्मुज़ में बढ़ते ख़तरों, और चीन के खाद एक्सपोर्ट बैन ने ग्लोबल फर्टिलाइज़र मार्केट को हिला दिया है। भारत भी DAP, पोटाश और यूरिया के लिए इंपोर्ट पर निर्भर है। इंटरनेशनल रेट्स बढ़ने के बावजूद, किसानों को फर्टिलाइज़र फ़िक्स रेट पर मिल रहे हैं, जिससे सरकार का सब्सिडी बिल रिकॉर्ड तोड़ रहा है।
जब किसान खेत में खाद डालता है तो उसे शायद ही अंदाज़ा होता है कि उस एक बोरी खाद के पीछे सरकार को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। किसान आज भी यूरिया की एक बोरी लगभग उसी कीमत पर खरीद रहा है, जिस कीमत पर वह कई साल पहले खरीदता था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में खाद और उसे बनाने वाले कच्चे माल की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं। यही वजह है कि भारत का उर्वरक सब्सिडी बिल लगातार बढ़ रहा है और सरकार पर वित्तीय दबाव भी बढ़ता जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़े भू-राजनीतिक संकट देखे हैं। पहले कोविड-19 महामारी ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित किया, फिर रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा और उर्वरक बाज़ार को झटका दिया। अब मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर वैश्विक व्यापारिक मार्गों पर दबाव बढ़ा दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार लाल सागर (Red Sea) और स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ (Strait of Hormuz) जैसे समुद्री मार्गों में व्यवधान आने से उर्वरक और कच्चा माल महँगा हो रहा है। दूसरी तरफ चीन जैसे देशों ने अपने घरेलू भंडार सुरक्षित रखने के लिए उर्वरकों के निर्यात पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण लगाए हैं। इन परिस्थितियों का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में यूरिया, DAP और पोटाश जैसी खादों की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ा है।

भारत कितना आयात पर निर्भर है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि देशों में शामिल है, लेकिन उर्वरकों के मामले में अभी भी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। देश अपनी ज़रूरत का लगभग 100 प्रतिशत पोटाश (MOP) आयात करता है। DAP और फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए ज़रूरी कच्चे माल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। यूरिया उत्पादन में भारत ने काफ़ी प्रगति की है, लेकिन फिर भी कुल ज़रूरत का लगभग 20-25 प्रतिशत हिस्सा आयात करना पड़ता है। यानी जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कीमतें बढ़ती हैं तो भारत की खरीद लागत भी सीधे बढ़ जाती है।

किसान तक सस्ती खाद कैसे पहुँचती है?
यूरिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कीमतों में उछाल आने के बाद कई बार एक बोरी यूरिया की वास्तविक लागत सरकार के लिए 2,500 से 3,000 रुपये या उससे अधिक तक पहुँच जाती है। लेकिन किसान को यही बोरी लगभग 242 रुपये से 266 रुपये के निर्धारित मूल्य पर उपलब्ध कराई जाती है। दोनों कीमतों के बीच का अंतर सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उथल-पुथल का सीधा असर किसान की जेब पर नहीं पड़ता।

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कैसे बढ़ता गया उर्वरक सब्सिडी का बोझ?
पिछले कुछ वर्षों के आँकड़े बताते हैं कि सरकार का उर्वरक सब्सिडी खर्च लगातार बढ़ा है।

2020-21: कोरोना काल
कोविड-19 महामारी और वैश्विक आपूर्ति बाधाओं के बीच उर्वरक सब्सिडी पर सरकार का खर्च बढ़कर लगभग 1.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया।

2022-23: रूस-यूक्रेन युद्ध का असर
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के बाद प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल आया। इसी दौरान भारत का उर्वरक सब्सिडी बिल रिकॉर्ड लगभग 2.51 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया।

2025-26: नया दबाव
वित्त वर्ष 2025-26 के लिए सरकार ने उर्वरक सब्सिडी का बजटीय प्रावधान लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये रखा है। हालाँकि वैश्विक परिस्थितियों और बढ़ती लागत को देखते हुए कई विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक बोझ इससे काफ़ी अधिक हो सकता है। कुछ अनुमानों में यह 3 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जाने की संभावना भी जताई जा रही है।

सरकार यह भारी खर्च क्यों कर रही है?
यह सवाल अक्सर उठता है कि सरकार आखिर लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी क्यों देती है। इसका जवाब देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है। अगर उर्वरकों की पूरी लागत किसानों पर डाल दी जाए तो खेती की लागत तेज़ी से बढ़ जाएगी। इससे किसानों का उत्पादन खर्च बढ़ेगा और अंततः इसका असर गेहूँ, चावल, दाल, सब्जियों और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दिखाई देगा। यानी खाद महँगी होने का असर सिर्फ किसान पर नहीं, बल्कि देश के हर उपभोक्ता पर पड़ेगा। इसीलिए सरकार खाद्य महँगाई को नियंत्रित रखने और किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी का बोझ खुद उठाती है।

क्या है इस संकट का स्थायी समाधान?
विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे समय में केवल सब्सिडी बढ़ाते रहना समाधान नहीं है। इसके लिए उत्पादन और तकनीक दोनों स्तरों पर बदलाव ज़रूरी हैं।

घरेलू उत्पादन बढ़ाना
सरकार ने गोरखपुर, सिंदरी, बरौनी और रामागुंडम जैसे बंद पड़े यूरिया संयंत्रों को पुनर्जीवित किया है। इससे घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ी है और आयात पर निर्भरता कुछ हद तक कम हुई है।

नैनो उर्वरकों को बढ़ावा
नैनो यूरिया और नैनो DAP को पारंपरिक उर्वरकों के विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। इनका उद्देश्य कम मात्रा में अधिक प्रभावी पोषण उपलब्ध कराना है।

संतुलित और प्राकृतिक खेती
सरकार PM-PRANAM जैसी पहलों के माध्यम से रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग, जैविक खेती और प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित कर रही है, ताकि रासायनिक खादों पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके।

भारत की कृषि व्यवस्था केवल खेत और किसान तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक बाज़ार, समुद्री व्यापार, ऊर्जा कीमतों और सरकारी नीतियों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। आज किसान को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए सरकार भारी सब्सिडी दे रही है, लेकिन लंबे समय में आत्मनिर्भर उत्पादन, नई तकनीक और टिकाऊ खेती ही इस चुनौती का स्थायी समाधान बन सकती है।
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