Agriculture Education: इस स्कूल में धनिया-प्याज उगाने की होड़
Lata Mishra | Feb 24, 2026, 18:01 IST
‘द गुड हार्वेस्ट स्कूल’ ग्रामीण लड़कियों के लिए पढ़ाई का एक अलग ही मॉडल पेश कर रहा है, जहां क्लासरूम की दीवारें खेत हैं और किताबों के साथ कुदाल भी थमाई जाती है। इस स्कूल में बच्चियां हल चलाना, पौध तैयार करना, बीज चयन और जैविक खेती जैसे कौशल सीखती हैं।
एक स्कूल जो तमाम पारंपरिक ढांचों को चुनौती दे रहा है जो कहते हैं कि स्कूल सिर्फ चारदीवारी और ब्लैकबोर्ड के बीच ही हो सकता है।
UNNAO (Uttar Pradesh ) पांचवीं क्लास में पढ़ने वाली सारा आजकल थोड़ी फिक्रमंद है। फिक्र इस बात की नहीं कि गणित के सवाल हल होंगे या नहीं, बल्कि चिंता इस बात की है कि इस बार स्कूल के 'वेजिटेबल कॉम्पिटिशन' में कहीं उसकी सहेलियां—हिमांशी, काजल या निहारिका—उससे आगे न निकल जाएं। पिछले साल सारा की प्याज की फसल फंगस की भेंट चढ़ गई थी, लेकिन इस बार वह अपनी क्यारियों से घास निकालने और पानी देने में कोई कोताही नहीं बरत रही।
यह कहानी किसी आम प्राइमरी स्कूल की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के पश्चिम गांव में स्थित 'द गुड हार्वेस्ट स्कूल' की है। यह एक ऐसा अनोखा स्कूल है, जहाँ लड़कियां सिर्फ किताबें नहीं पढ़तीं, बल्कि हल चलाना और बीज बोना भी सीखती हैं।
जब विज्ञापन की दुनिया छोड़, गांव की पगडंडी पकड़ी
इस कहानी की शुरुआत होती है दिल्ली और गुड़गांव की भागदौड़ भरी जिंदगी से। अनीश, जो कभी विज्ञापन की दुनिया में एक नामी राइटर थे, अपनी पत्नी अशिता के साथ एक दिन घूमने निकले थे। शहर की आरामदायक जिंदगी थी, अच्छी नौकरी थी, लेकिन मिट्टी की सोंधी खुशबू उन्हें खींच लाई उन्नाव के इस छोटे से गांव में।
अनीश बताते हैं, "जब हम यहाँ आए, तो यहाँ सिर्फ चार आम के पेड़ों के अलावा कुछ नहीं था। दिल्ली की लाइफ बहुत कंफर्टेबल थी, पर हम यहाँ आए और फिर यहीं के होकर रह गए।"
किसान मतलब सिर्फ आदमी क्यों?
स्कूल की नींव रखने के पीछे एक दिलचस्प और आंखें खोल देने वाला वाकया है। अनीश और अशिता ने एक दिन बच्चों से कहा कि वे एक किसान का चित्र बनाएं। जब ड्राइंग बनकर तैयार हुई, तो सब दंग रह गए। हर बच्चे ने एक पुरुष किसान की तस्वीर बनाई थी—सिर पर साफा, हाथ में हल। उस तस्वीर में कहीं भी महिला नहीं थी।
अशिता कहती हैं, "खेत-खलिहानों में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा मेहनत करती हैं, लेकिन जब भी 'किसान' शब्द आता है, हमारे दिमाग में सिर्फ आदमी की छवि क्यों उभरती है? हम इसी स्टीरियोटाइप को तोड़ना चाहते थे।" बस, यहीं से जन्म हुआ लड़कियों के लिए खेती के स्कूल' का।
डिब्बों में बंद है पूरे भारत की मिट्टी
'द गुड हार्वेस्ट स्कूल' में पढ़ाई का तरीका बिल्कुल अलग है। यहाँ छोटे-छोटे डिब्बों में सिर्फ बीज नहीं, बल्कि भारत की विविधता बंद है। यहाँ देश के कोने-कोने से लाए गए बीज रखे हैं, ताकि बच्चे यह समझ सकें कि उनके इलाके के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में किस तरह की मिट्टी और फसलें होती हैं। स्कूल की छात्राएं बताती हैं, "यहाँ हमने पहली बार सीखा कि सब्जियां कैसे बोई जाती हैं, दो पौधों के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए और उनकी देखभाल कैसे होती है।"
सात समंदर पार से आ रहे हैं लोग
आज यह स्कूल सिर्फ उन्नाव के लिए मिसाल नहीं है, बल्कि सात समंदर पार से विदेशी वॉलंटियर्स भी इस मॉडल को समझने यहाँ आ रहे हैं। यह स्कूल उन तमाम पारंपरिक ढांचों को चुनौती दे रहा है जो कहते हैं कि स्कूल सिर्फ चारदीवारी और ब्लैकबोर्ड के बीच ही हो सकता है। चाहे आप शहर में हों या गांव में, 'द गुड हार्वेस्ट स्कूल' एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: क्या हमारे शिक्षा तंत्र में मिट्टी के लिए जगह नहीं होनी चाहिए? अनीश और अशिता ने ना केवल यह सवाल पूछा है, बल्कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से इसका जवाब भी दुनिया को दे दिया है।
यह कहानी किसी आम प्राइमरी स्कूल की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के पश्चिम गांव में स्थित 'द गुड हार्वेस्ट स्कूल' की है। यह एक ऐसा अनोखा स्कूल है, जहाँ लड़कियां सिर्फ किताबें नहीं पढ़तीं, बल्कि हल चलाना और बीज बोना भी सीखती हैं।
खेत-खलिहानों में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा मेहनत करती हैं, लेकिन जब भी 'किसान' शब्द आता है, हमारे दिमाग में सिर्फ आदमी की छवि क्यों उभरती है?
इस कहानी की शुरुआत होती है दिल्ली और गुड़गांव की भागदौड़ भरी जिंदगी से। अनीश, जो कभी विज्ञापन की दुनिया में एक नामी राइटर थे, अपनी पत्नी अशिता के साथ एक दिन घूमने निकले थे। शहर की आरामदायक जिंदगी थी, अच्छी नौकरी थी, लेकिन मिट्टी की सोंधी खुशबू उन्हें खींच लाई उन्नाव के इस छोटे से गांव में।
अनीश बताते हैं, "जब हम यहाँ आए, तो यहाँ सिर्फ चार आम के पेड़ों के अलावा कुछ नहीं था। दिल्ली की लाइफ बहुत कंफर्टेबल थी, पर हम यहाँ आए और फिर यहीं के होकर रह गए।"
शहर की चका - चौंध छोड़ के गाँव की पगडंडियों को चुना।
स्कूल की नींव रखने के पीछे एक दिलचस्प और आंखें खोल देने वाला वाकया है। अनीश और अशिता ने एक दिन बच्चों से कहा कि वे एक किसान का चित्र बनाएं। जब ड्राइंग बनकर तैयार हुई, तो सब दंग रह गए। हर बच्चे ने एक पुरुष किसान की तस्वीर बनाई थी—सिर पर साफा, हाथ में हल। उस तस्वीर में कहीं भी महिला नहीं थी।
अशिता कहती हैं, "खेत-खलिहानों में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा मेहनत करती हैं, लेकिन जब भी 'किसान' शब्द आता है, हमारे दिमाग में सिर्फ आदमी की छवि क्यों उभरती है? हम इसी स्टीरियोटाइप को तोड़ना चाहते थे।" बस, यहीं से जन्म हुआ लड़कियों के लिए खेती के स्कूल' का।
छात्राएँ बोलीं उन्होंने पहली बार सीखा कि सब्जियां कैसे बोई जाती हैं, दो पौधों के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए और उनकी देखभाल कैसे होती है।
'द गुड हार्वेस्ट स्कूल' में पढ़ाई का तरीका बिल्कुल अलग है। यहाँ छोटे-छोटे डिब्बों में सिर्फ बीज नहीं, बल्कि भारत की विविधता बंद है। यहाँ देश के कोने-कोने से लाए गए बीज रखे हैं, ताकि बच्चे यह समझ सकें कि उनके इलाके के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में किस तरह की मिट्टी और फसलें होती हैं। स्कूल की छात्राएं बताती हैं, "यहाँ हमने पहली बार सीखा कि सब्जियां कैसे बोई जाती हैं, दो पौधों के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए और उनकी देखभाल कैसे होती है।"
इस स्कूल में सिर्फ़ किताबी ज्ञान नहीं मिल रहा बल्कि बच्चों का प्रैक्टिकल ज्ञान भी बढ़ रहा है ।
आज यह स्कूल सिर्फ उन्नाव के लिए मिसाल नहीं है, बल्कि सात समंदर पार से विदेशी वॉलंटियर्स भी इस मॉडल को समझने यहाँ आ रहे हैं। यह स्कूल उन तमाम पारंपरिक ढांचों को चुनौती दे रहा है जो कहते हैं कि स्कूल सिर्फ चारदीवारी और ब्लैकबोर्ड के बीच ही हो सकता है। चाहे आप शहर में हों या गांव में, 'द गुड हार्वेस्ट स्कूल' एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: क्या हमारे शिक्षा तंत्र में मिट्टी के लिए जगह नहीं होनी चाहिए? अनीश और अशिता ने ना केवल यह सवाल पूछा है, बल्कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से इसका जवाब भी दुनिया को दे दिया है।