राष्ट्रीय राजनेता के स्तर पर अखिलेश का पहला क़दम

राष्ट्रीय राजनेता के स्तर पर अखिलेश का पहला क़दमराष्ट्रीय राजनेता के स्तर पर अखिलेश का पहला क़दम।

डाॅ. एसबी मिश्रा

अभी हाल में हुआ समाजवादी पार्टी में मंथन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का एक राष्ट्रीय राजनेता के रूप में पहला कदम है। अखिलेश यादव अब जाति बिरादरी और परिवार मोह से आगे निकल गए हैं। जब उन्होंने डीपी यादव को टिकट नहीं दिया यादव सिंह की मदद नहीं की, रामवृक्ष सिंह यादव से सहानुभति नहीं दिखाई, अतीक अहमद से दूरी बनाए रखी, मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय नहीं होने दिया और अंसारी के भाई अफ़जाल अंसारी को टिकट दिए जाने का विरोध किया तो उनमें जन नेता के लक्षण दिखे थे। वर्तमान पारिवारिक संघर्ष में उन्होंने दृढ़ निश्चय और पक्का इरादा दिखाकर सबित कर दिया है कि वह अल्पकालिक राजनीति नहीं बल्कि दीर्घकालिक पारी खेलेंगे। युवा शक्ति उनके साथ है। इंदिरा गांधी का उदाहरण बहुतों को याद होगा जब ‘युवा तुर्क’ ने उन्हें विजयी बनाया था।

राजनैतिक विरासत की लड़ाई अभी अधूरी है। पार्टी का नाम कौन प्रयोग करेगा और पार्टी के खाते और खजाने पर किसका मालिकाना हक होगा, पार्टी कार्यालय किसका कहां होगा? यह समस्याएं नहीं आतीं यदि मुलायम सिंह ने प्रतिनिधि सभा के फ़ैसलों को मान लिया होता और उसे अवैधानिक न कहते। सम्भव है छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करते हुए अखिलेश यादव नेताजी को साइकिल चिन्ह और पार्टी का नाम रखने दें। यदि ऐसा कर सकें तो यह दरियादिली होगी।

अखिलेश यादव की उत्तर प्रदेश की जनता में लोकप्रियता प्रामाणिक है। यह बात दूसरों की समझ में न आए तो कोई बात नहीं, लेकिन नेताजी न समझ पाएं तो आश्चर्य होता है। जब अखिलेश यादव को पार्टी से बाहर किया गया प्रत्याशियों की समानान्तर सूची जारी करने के लिए तो सड़कों पर हुजूम था, अखिलेश के समर्थन में। अखिलेश यादव ने मीटिंग बुलाई तो करीब 200 विधायक और सांसद पहुंचे। कहते हैं नेताजी की मीटिंग में करीब 20 विधायक और 325 प्रत्याशियों में से 65 ही हाजिर हुए। इतने से दीवार पर लिखी इबारत पढ़ लेनी चाहिए थी।

रामगोपाल यादव ने राष्ट्रीय प्रतिनिधि मंडल की बैठक बुलाकर अखिलेश यादव को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सिद्ध कर दिया है कि पार्टी अखिलेश के साथ है। अब नेताजी ने 5 जनवरी को यही बैठक बुलाई है और मानी हुई बात है कि उसमें फज़ीहत के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। चुनाव आयोग की भी समझ में आ जाएगा कि साइकिल का मालिक कौन है और समाजवादी पार्टी किसकी है?

कितना अच्छा होता कि नेताजी ने शालीनता से अखिलेश को विरासत सौंप दी होती और स्वयं मार्ग दर्शक बन जाते लालकृष्ण आडवाणी की तरह। समाजवादी आन्दोलन में बिखराव पुराना है और अनेक समाजवादी विचार की पार्टियां मौजूद हैं जिनके पास कुछ न कुछ विरासत है। यदि अखिलेश यादव इन्हें एकजुट करने में कामयाब होते हैं और इनमें से किसी दल का चिन्ह प्रयोग करते हैं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। फिलहाल पांच जनवरी की प्रतीक्षा करनी होगी।

sbmisra@gaonconnection.com

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