पर्यावरण और सांस्कृतिक सोच में घनिष्ट है सम्बन्ध

Dr SB Misra | Mar 13, 2026, 14:24 IST
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हमारे पर्यावरण का संतुलन तेजी से भंग हो रहा है, जो केवल मानव गतिविधियों का परिणाम है। जल स्तर कम होता जा रहा है, वायु प्रदूषण अपने चरम पर है और जलवायु परिवर्तन की मार भी सहनी पड़ रही है। हमें प्राचीन भारतीय परंपराओं को अपनाकर भूजल प्रबंधन को सुदृढ़ करना होगा।
पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ने के कारण विलुप्त हो रही सभ्यताएं 
पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ने के कारण विलुप्त हो रही सभ्यताएं 
पर्यावरण दिवस प्रत्येक वर्ष 5 जून को आता है और चला जाता है। कुछ भाषण होते है गोष्ठियाँ और चर्चाएँ होती है वादे और संकल्प होते है, चिन्ताएँ व्यक्त की जाती है और बस। ठीक उसी तरह जैसे बाल दिवस, शिक्षक दिवस, मित्रता दिवस, तम्बाकू निवारण दिवस और न जाने कितने दिवस आते जाते रहते हैं । पर्यावरण के लिए पाँच घटक जैसे क्षिति जल पावक गगन और समीर सबसे महत्वपूर्ण है। जल के विषय में सोचें तो पृथ्वी पर जल चक्र सदैव चलता रहता है। समुद्र की सतह से पानी वाष्प बनकर वायुमंडल में जाता है, वहाँ से घनीभूत होकर वर्षा जल के रूप में पृथ्वी पर गिरता है जिसका कुछ भाग पर्वतों पर बर्फ के रूप में जमा रहता है। कुछ भाग प्रतिवर्ष पृथ्वी के अन्दर समावेश करके भूजल के रूप में जमा हो जाता है और शेष भाग नदियों के माध्यम से पुनः समुद्र तक पहुँच जाता है।

आज के दिन सारी आवश्यकताएँ जैसे सिंचाई, कल कारखाने, शौचालयों के फ्लश आदि सभी पृथ्वी के अन्दर के भूजल पर निर्भर हैं। परिणाम यह हुआ है कि भूजल का स्तर कुछ स्थानों पर एक मीटर प्रतिवर्ष की दर से नीचे गिर रहा है। यहाँ उल्लेखनीय है की दक्षिण अफ्रीका के शहर केपटाउन में कहते है जल समाप्त हो गया है और टैंकरों से काम चल रहा है। कल्पना कीजिये यदि विश्व भर में ऐसी हालत आ जाये तो टैंकरों में भरने के लिए भी पानी बचेगा! यदि इस संकट से बचना है तो पृथ्वी की सतह पर जल भंडारण और जल प्रबंधन की अपनी पुरानी परम्पराओं को पुनर्जीवित करना होगा और भूजल पर से दबाव घटाना होगा।

नहीं रहा है प्राकृतिक धरोहरों के प्रति सम्मान

वैश्विक ताप वृद्धि का कहर
वैश्विक ताप वृद्धि का कहर
पर्यावरण और उसके संतुलन के बनने बिगड़ने कुछ सीमा तक प्राकतिक घटनायें जिम्मेदार होती है लेकिन अधिकांश रूप से मानवीय सोच और मानव की गतिविधियाँ जिम्मेदार रहती है। हर साल उत्तरी अमेरिका में भीषण बर्फबारी और आपदाएँ आती रहती हैं, जिनके लिए प्रकृति का प्रकोप जिम्मेदार है। इसी प्रकार इस वर्ष उत्तरी भारत में औसत से बहुत कम बर्फबारी हुई। मैदानी इलाकों में शीत लहर चली और त्राहि त्राहि मची। कुछ समय से यह भी देखा जा रहा है कि जाड़ा, गर्मी और बरसात अपने परम्परागत समय पर आरम्भ न हो कर कभी जल्दी तो कभी देर से आरम्भ हो रहे है। हमारे देश की परम्परा रही है की धरती, पानी, आग और वायु को देवता समान मानकर इन्हें सम्मान दिया जाता था। लेकिन पश्चिमी अवधारणा से प्रभावित होकर सब कुछ बदल गया है। इस लिए विकास कार्यों को करते समय पंचतत्वों के प्रति सः अस्तित्व का भाव नहीं रहता। कभी जलवायु परिवर्तन तो कभी वैश्विक ताप वृद्धि का कहर झेलना पड़ रहा है।

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बिगड़ रहा है पर्यावरण का संतुलन

बिगड़ते पर्यावरण का संतुलन जरूरी
बिगड़ते पर्यावरण का संतुलन जरूरी
आज प्रदूषण अपनी सीमाएँ पार कर चुका है, भूक्षरण की गति तीव्र हुई है, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि हो रही है, पर्वतीय क्षेत्र अस्थिर हैं, रोगाणुओं ओर विषाणुओं की निरन्तर वृद्धि हो रही है, मानव का अस्तित्व ही संकट में है। हम में से कुछ लोग जानते हुए भी मानने को तैयार नहीं हैं कि इन इन सब के लिए जिम्मेदार हमारी है सांस्कृतिक सोच। भारतीय विचारक तो जानते थे 'यद् पिण्डे तदैव ब्रम्हांडे' अर्थात जो शरीर के अवयव हैं वही बाहरी जगत में हैं। यह भी कहा कि 'क्षिति, जल, पावक, गगन ,समीरा, पंच तत्व मिलि बनेहु शरीरा' और इसलिए पंच तत्वों से बना हुआ यह शरीर तभी तक स्वस्थ रह सकता है जब तक इन घटकों का वाह्य जगत में सन्तुलन बना है ।

पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ने के कारण विलुप्त हो चुकी सभ्यताओं में ग्वाटेमाला की टिकाल सभ्यता, पीरू की चैन चैन सभ्यता, मेक्सिको की माया सभ्यता और मध्यपूर्व की वेबिलोनियन सभ्यता उल्लेखनीय हैं। मध्यपूर्व की वेबिलोनियन सभ्यता के समय सिंचाई की नहरों का जाल बिछा था, हरियाली, खुशहाली और सम्पन्नता थी। वहाँ की नहरें बालू मिट्टी से इसलिए भर गईं कि ऊँचे भागों में जंगलों का अत्यधिक कटान और मृदा अपक्षय हुआ। इस प्रकार सीरिया, ईराक, लेबनान और तुर्की की रेगिस्तानी भूमि और जलवायु की दुर्दशा के लिए स्वयं मनुष्य उत्तरदायी है ।

मध्ययुग में स्पेन एक समुद्री महाशक्ति बन गया था, परन्तु जहाजों को बनाने में स्पेन वासियों ने इतने जंगल काट डाले कि स्पेन वीरान हो गया। मैक्सिको की माया सभ्यता इसलिए विलुप्त हुई कि वहाँ की धरती में इतनी धारक क्षमता नहीं थी कि वह अत्यधिक आबादी का पोषण कर सकती। इतिहास का यही सन्देश है कि जो सभ्यताएँ प्रकृति का संरक्षण करती रहेंगी वही भविष्य में पल्लवित और पुष्पित होंगी।

जहाँ सदविचार होते हैं वहाँ अच्छे पर्यावरण का निर्माण सम्भव

प्रकृति और जरूरत में हो मेलजोल
प्रकृति और जरूरत में हो मेलजोल
इस प्रकार समाज की संस्कृति यह निर्धारित करती है कि वहाँ के लोगों का प्राकृतिक संसाधनों के प्रति कैसा दृष्टिकोण होगा और यह दृष्टिकोण ही निश्चित करता है कि हम पृथ्वी को माता मानेंगे या फिर दासी का स्थान देंगे। इसी दृष्टिकोण से वहाँ के पर्यावरण का निर्धारण होता है। हमारे देश का पर्यावरण रमणीक था, शस्य श्यामला धरती थी और उस पर विकसित होने वाले आध्यात्मिक विचार थे। जो लुटेरे यहाँ आए और विध्वंस का तांडव किया उनके वहाँ न तो सुन्दर पर्यावरण था और न सद्विचार। जहाँ सद्विचार होते हैं वहाँ अच्छे पर्यावरण का निर्माण सम्भव है और जहाँ अच्छा पर्यावरण है वहाँ सद्विचार स्वतः आते हैं।

हमारे मुनीषियों का मानना था कि यह पृथ्वी बहुत पुरानी है, इसके साथ हमारा नाता भी उतना ही पुराना है और इस पर हमें बार बार आना है अतः इसे संजोकर रखना है। दूसरे लोगों की सोच रही है कि इस धरती पर जो कुछ नेमत परमेश्वर ने बक्शी है वह इंसान के लिए है, इसका शोषण करो क्योंकि केवल एक ही जीवन मिला है सुख भोगने के लिए। ऐसी विचारधाराओं के चलते पर्यावरण का विनाश होना ही था और हुआ भी। दूसरी तरफ घनी आबादी और निर्धनता के बावजूद पर्यावरण बिगाड़ने में हमारे देश की बहुत कम भूमिका रही है। आज भी दुनिया के तमाम देशों की अपेक्षा हमारे यहाँ कार्बनडाइऑक्साइड का उत्सर्जन बहुत कम है। पिछले वर्षो में धान के पैरा जलाने, फसल काटने के बाद कीटाणु नष्ट करने के लिए खेतों में आग लगाने और औद्योगिक गतिविधियों से कार्बनडाइऑक्साइड का उत्सर्जन बढ़ा है।

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शहरों से गायब हो रही है प्राणवायु

शहरों में बढ़ता प्रदूषण
शहरों में बढ़ता प्रदूषण
कहने की आवश्यकता नहीं कि मनुष्य का जीवन तभी तक है जब तक प्राण वायु है और प्राणवायु तभी तक है जब तक वन और वनस्पति है। प्राणवायु का भंडार है -ओजोन परत, चाहें तो नीली छतरी कह लीजिए। यह छतरी जीव जगत को सूर्य के अल्ट्रावाइलेट किरणों से बचाती है लेकिन ओजोन परत को सबसे अधिक हानी पहुँचाती है क्लोरोफ्लोरो कार्बन, जो रेफ्रीजरेटरों, एयर कंडीशनर तथा फ्रिज आदि के निर्माण में उपयोग होती है। इसी प्रकार कार्बन के साथ प्रतिक्रिया करके ऑक्सीजन को नष्ट कर देती है। इसी प्रकार कार्बन मोनोऑक्साइड भी ओजोन के साथ अभिक्रिया करके उसे नष्ट कर देती हैं और ओजोन परत में छिद्र होने लगते हैं। इसके परिणाम स्वरूप पृथ्वी पर ऑक्सीजन की उपलब्धता घट रही है।

हमारे प्रमुख त्यौहार दीपावली और होली है। दोनों ही पर्यावरण विदारक हैं। दीपावली पर ध्वनि और वायु प्रदूषण से बचने के तीन तरीके हैं- हम देशभक्ति का परिचय दें और चाइनीज़ पटाखे खरीदें ही नहीं अथवा प्रान्तीय सरकारें वायू और घ्वनि प्रदूषण से बचने के लिए पटाखे दगाने पर रोक लगा दे अथवा सरकार चाहे तो पटाखों पर प्रतिबंध लगाकर पटाखों का आयात बन्द कर दे। चीन ने धमकी दी है कि पटाखों पर प्रतिबंध लगाने से द्विपक्षीय व्यापार पर बुरा असर पड़ेगा। बाजार का एक चक्कर लगाएँ तो लगता है कम्पटीशन होने वाला है कि घ्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण का सिरमौर कौन सा श्हर रहेगा। किस शहर में पटाखों से आग लगेगी और कहाँ धुंआ से किसी का दम घुटेगा। प्रतिबंध लगाने से वोट जाने का डर है, कोई सरकार जोखिम नहीं उठाएगी। स्वाधीनता आन्दोलन के समय जब विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई थी तो किसी ने अपना नफा नुकसान नहीं सोचा था।

वायुमंडल में कार्बनडाइआक्साइड की मात्रा निरन्तर बढ़ रही जिसके प्रमुख कारण हैं कल कारखानों और वाहनों से तथा लकड़ी ईंधन जलने से निकलता धुआँ। इस कार्बनडाइआक्साइड को वृक्ष अपने भोजन के रुप में प्रयोग करके उसके बदले ऑक्सीजन दे सकते हैं। परन्तु वृक्षों का निरन्तर कटते जाना और अवांछनीय गैसों की हो रही वृद्धि हमारे वायुमंडल की वायु को इतना प्रदूषित कर रही है कि सांस लेने के लिए प्राणवायु दिल्ली जैसो शहरों में निरन्तर घटती जा रही है।

जीवन जीना है तो करना होगा मिट्टी का बचाव

मिट्टी का करें बचाव
मिट्टी का करें बचाव
मनुष्य को जीवित रहने के लिए मिट्टी में पैदा होने वाला अन्न ही आधार है। मिट्टी की परत का निर्माण लाखों वर्षों में होता है। इस पर उगने वाली वनस्पति और पेड़ अनेक प्रकार से मिटटी की रक्षा करते हैं, अपनी पत्तियों से इसे उपजाऊ बनाते हैं और वर्षाजल को भूप्रवेश के लिए अपनी जड़ों के माध्यम से सहयोग देते हैं। जिन क्षेत्रों में वनस्पति नहीं रहती वहाँ की मिट्टी का कटान अधिक होता है, भूजल की मात्रा घटती रहती है और बंजर, अनुपजाऊ क्षेत्र का निर्माण होता है। वनों और वनस्पतियों के अभाव में पर्वतीय क्षेत्रों में प्रायः भूक्षरण तथा भूस्खलन होता रहता है क्योंकि मिट्टी की परत को रोकने का काम करने वाली वनस्पति समाप्त होती जा रही है। हमारे देश के पूर्वज वनों के महत्व को जानते थे और वाणप्रस्थ आश्रम में पहुँच कर वनों में निवास करते थे। उनकी कामना रहती थी समुद्र, नदियों और जल से सम्पन्न रहे पृथ्वी, जिसमें कृषि और अन्न होता, जिससे यह प्राण्वान संसार तृप्त होता है ।

जिन क्षेत्रों में वनस्पति नहीं रहती वहाँ की मिट्टी का कटान अधिक होता है, भूजल की मात्रा घटती रहती है और बंजर अनुपजाऊ भूमि का निर्माण होता है। पृथ्वी को पेड़ पौधों और विविघ वनस्पति से ढकने के काम को अधिक दिन टाल नहीं सकते। कुछ लोगों की मान्यता है कि माँसाहार से पर्यावरण को अधिक हानि होती है शायद इसीलिए कबीरदास ने कहा था ‘‘बकरी पाती खात है ताकी खींची खाल, जे बकरी को खात हैं उन कर कौन हवाल"।

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माँसाहार से जुड़ें कुछ आंकड़ों पर ध्यान देने की आवश्यकता

  • - सोलह किलोग्राम अन्न पशुओं को खिलाकर अमेरिका में एक किलोग्राम माँस प्राप्त होता है।
  • - एक एकड़ भूमि में 100 क्विंटल आलू पैदा किया जा सकता है और यही भूमि यदि माँस हेतु पशु आहार उत्पादन में प्रयोग हो तो एक क्विंटल से भी कम माँस मिलेगा।
  • - माँसाहारी आबादी की अपेक्षा यह पृथ्वी दस गुना से भी अधिक शाकाहारी आबादी का भार वहन कर सकती है। यह तथ्य भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।
  • - माँसोत्पादन में अन्नोत्पादन की अपेक्षा 100 गुना अधिक पानी व्यय होता है।
  • - लागत की दृष्टि से देखें तो माँसाहारी प्रोटीन की कीमत शाकाहारी प्रोटीन से कम से कम 10 गुना अधिक है।
  • - स्वास्थ्य की दृष्टि से माँसाहार की अपनी समस्याएं हैं जिन्हें आज पश्चिमी वैज्ञानिक भी जानते और मानते हैं।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि शाकाहार का भारतीय विचार मानते हुए यह पृथ्वी माँसाहारियों की अपेक्षा दस से सोलह गुनी अधिक आबादी का पालन पोषण कर सकती है।

जीव प्रजातियों के प्रति हमारा नज़रियां हमारे पर्यावरणीय सोच का पैमाना है। जब कोई व्यक्ति भारतीय संस्कृति को मानने वाला, किसी पशु-पक्षी को देखता है तो उसे सहजीवी प्राणी के रूप में देखता है। जब कि अन्य लोग भेड़, बकरी, ऊंट, मुर्गा , भैंसा सभी को परमेश्वर की दी हुई नेमत समझ कर उन सब को अपना भोजन मानते हैं। जैव विविधता की रक्षा के लिए आवश्यक है कि जीवों के प्रति सहजीवी और स्नेह भाव रहे। स्पष्ट है कि अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हुए जीवन यापन करने की भारतीय प्रवृत्ति पर्यावरण संरक्षण में अत्यधिक सहायक हो सकती है।
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