अभिव्यक्ति की इतनी आज़ादी न मांगिए कि देश बिखर जाए 

अभिव्यक्ति की इतनी आज़ादी न मांगिए कि देश बिखर जाए प्रतीकात्मक तस्वीर।

समाजवादी पार्टी के बड़े नेता मुहम्मद आज़म खां ने हमारी सेना पर लांछन लगाते हुए एक तरह से आतंकवादियाें द्वारा सैनिकों के शवों को क्षत-विक्षत करने का कारण समझाया है। एक प्रकार से उनके कृत्यों को न्यायोचित ठहराया है। आजम खां को भारत माता और गंगा मैया के विषय में भी कुछ भी कहने की आजादी रही है।

इन्हीं की तरह दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर को भी आतंकवादियों के पक्ष में कुछ भी बोलने की आजादी है और इसके बावजूद असहिष्णुता की तोहमत लगाते हैं सरकार और समाज पर।

पिछले साल टीवी पर देख रहा था जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय कैम्पस में भीड़ नारे लगा रही थी ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और एक-एक को गिनाते हुए सब तरह की आजादी मांग रहे थे। इसी प्रकार की आवाजें उस्मानिया और जादवपुर विश्वविद्यालयों में भी उठ रही थीं। बाद में पता चला ये वामपंथी विचारों के लोग हैं। अगर सचमुच आजादी के दीवाने हैं ये लोग तो इन्हें चीन के थियनमान चौक पर जाकर ये नारे लगाने चाहिए जहां हजारों छात्रों को रौंदकर मार डाला गया था केवल इसलिए कि वे अपनी बात कहना चाहते थे।

विश्वविद्यालयों के ये लोग केवल आजादी के नारों तक सीमित नहीं रहे, उन्होंने आगे भी नारे बुलन्द किए ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’। इन्हें कौन बताए भारत के कितने टुकड़े पहले ही हो चुके हैं अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांगलादेश, म्यांमार ये सब भारत ही तो थे। संयुक्त राष्ट्र में जुल्फिकार अली भुट्टो ने दहाड़ा था हमने भारत पर एक हजार साल हुकूमत की है और एक हजार साल करेंगे। कहां गए भुट्टो? एक हजार साल तक इसलिए राज कर पाए कि भारतीय मरना मारना नहीं जानता और जिस दिन सीख लेगा मरना मारना उस दिन भूल जाएगा बड़बोलापन।

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इस देश का समाज हजारों साल से गाय के प्रति सम्मान भाव रखता आया है भले ही वह सम्मान अब प्रासंगिक नहीं रहा। अब इसमें राजनीति घुल गई है फिर भी कुछ लोगों की जिद कितनी उचित है कि हम गोमांस ही खाएंगे और न मिला तो बारात लौट जाएगी। यदि सरकार ने गोवध पर प्रतिबंध लगाया तो वे इसे अपनी आजादी में दखल मानते हैं। उनका कहना है हम कुछ भी खाए उस पर रोक नहीं लग सकती।

तो क्या राष्ट्रीय पशु-पक्षी, सिंह और मोर को मार कर खा सकते हैं या खाना उचित होगा? आजादी मांगने वाले या तो साम्यवादी चिन्तन के लोग हैं या भटकी इस्लामिक विचारधारा को मानते हैं। इन्हें सोचना चाहिए कि साम्यवादी और इस्लामिक व्यवस्था में कितनी और किसको आजादी मिली हुई है। इन्हीं के साथ ही कांग्रेस के लोग भी आजादी चाहते हैं और सोचते हैं कि असहिष्णुता बढ़ रही है।

मैं भूल नहीं सकता 25 जून 1975 का वह सवेरा जब रेडियो पर उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज सुनाई पड़ी ‘राष्ट्रपति ने देश में आपात काल लागू कर दिया है’ आतंकित होने की कोई बात नहीं है। लम्बे भाषण में उन्होंने आश्वस्त करने की कोशिश की थी लेकिन दिमाग नहीं मान रहा था, आखिर क्या होगा आपातकाल में। परिवार और बच्चों का क्या होगा और कितने दिन तक चलेगा आपातकाल?

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आपातकाल तो तब लगाया जाता है जब विदेशी आक्रमण हुआ हो, देश में सशस्त्र क्रान्ति हो गई हो या राजा मार डाला गया हो। ऐसा तो कुछ नहीं हुआ था। दिमाग काम नहीं कर रहा था, आखिर क्या यह मार्शल लॉ जैसा होगा या फिर कफ् र्यू जैसा या सारे देश में धारा 144 लगेगी। क्या हमारे देश की व्यवस्था पाकितान जैसी होगी या कम्युनिस्ट देशों की तरह? बाहर सड़कों पर निकला तो बाहर सन्नाटा था सशंकित शान्ति थी।

जिस इन्दिरा गांधी कों कुछ लोगों ने कभी गूंगी गुड़िया कहा था वह आपातकाल लगा देगी, शायद ही किसी की कल्पना में रहा हो। जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा गाँव-गाँव पहुंचाया था। अखबारों से अगले दिन पता चला कि जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, सहित सभी विरोधी दलों के नेता गिरफ्तार हो चुके थे, जार्ज फर्नांडीस जैसे अनेक नेता भूमिगत हो गए थे। देश की बोलती बन्द थी। मेरी तरह शायद सभी हक्का-बक्का थे, जाने कैसा समय आने वाला है। इसे कहते हैं अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबन्दी।

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