Samvad: सत्ता और विपक्ष साथ मिलकर करें काम, तभी देश का होगा बेहतर विकास

Dr SB Misra | Mar 19, 2026, 18:44 IST
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देश के विकास में सत्ता और विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। संसद का सुचारू रूप से चलाने के लिए संसद का संचालन देशहित में जरूरी है। लेकिन वर्तमान में राजनीतिक कड़वाहट बढ़ी है, जैसे विपक्ष सरकार पर अमेरिका को देश बेचने का आरोप लगाता है, विदेश नीति पर भी विवाद बढ़ रहा है, स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हुआ। ऐसे में हमे सोटना होगा कि क्या पक्ष और विपक्ष
राष्ट्रीय मुद्दों पर राजनीति बनाम सहयोग
राष्ट्रीय मुद्दों पर राजनीति बनाम सहयोग
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही यह जानते हैं की राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका परस्पर पूरक होनी चाहिए। फिर भी आचरण में वह नहीं आता, यानी जानते तो हैं लेकिन मानते नहीं। विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष की रचनात्मक आलोचना का स्वागत तो होना ही चाहिए लेकिन अभिव्यक्त की आजादी की एक सीमा जरूरी है। सोच कर देखें की श्रीमती इंदिरा गांधी ने क्या विपक्ष को उतनी आजादी दी होती जितनी वर्तमान सरकार दे रही है।

संसद का सुचारू संचालन क्यों जरूरी है?

आवश्यकता इस बात की है की व्यवस्थित तरीके से नियमानुसार संसद चले और देशवासियों के हित में नियम बनाए जाएँ और कार्यक्रम निर्धारित हो तभी राष्ट्र निर्माण हो सकता है। संसद न चलने के कारण अंततः देश के गरीबों किसानों का नुकसान होता है इसलिए जहाँ तक हो सके रचनात्मक दृष्टिकोण दोनों पक्षों से बना रहे जैसे शास्त्री जी के जमाने में अथवा अटल जी के समय बना रहता था। ऐसा नहीं की वाद विवाद तब नहीं होते थे लेकिन वह वैमनस्य भाव कभी नहीं रहता था मतभेद की एक सीमा रहती थी। आशा की जानी चाहिए कि देश हित में सभी सांसद मिल बैठकर सुचार रूप से देश चलाने का तरीका निकलेंगे।

बढ़ती राजनीतिक कड़वाहट और विदेश नीति पर विवाद

वर्तमान सरकार और विपक्ष के बीच जितनी कड़वाहट आज है, 1975 के आलावा कभी नहीं देखी। विपक्षीय नेताओं का मानना है की सरकार ने अमेरिका के हाथों देश बेच दिया और अमेरिका ने भारत की गर्दन दबोच रखी है दूसरी तरफ एक महिला सांसद का कहना है कि हमारी सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि वह अमेरिका और ईरान में से किसके साथ है। शायद उन माननीय सदस्या को पता नहीं की तटस्थ अंतरराष्ट्रीय नीति के तहत देश इस पक्ष में रहता है ना तो उस पक्ष में और यह नीति नेहरू जी के जमाने से चली आ रही है। विद्वान सांसदों के ध्यान में यह तो होगा विश्व युद्ध की नौबत आ गई तो भारत किसी का पक्ष नहीं लेगा और सबके साथ अच्छे समबन्ध रहेंगे। आज अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की जो साथ है वह शायद ही पहले कभी रही हो। विपक्ष ने शायद सोचा होगा के स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा में सरकार के प्रति अविश्वास उभर कर आएगा और स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पारित हो जाए।

स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: क्या हुआ सदन में?

सदन में विपक्ष द्वारा स्पीकर के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से ना मंजूर हो गया। आजाद भारत के संसदीय इतिहास में यह अपने प्रकार का चौथा अविश्वास प्रस्ताव था। विपक्ष का एक मुद्दा था के स्पीकर महोदय नेता विपक्ष को बोलने का मौका नहीं देते। सत्ता पक्ष की तरफ से गृहमंत्री ने आंकड़ों के साथ यह प्रमाणित किया कि नेता विपक्ष अधिकतर लोकसभा में हाजिर ही नहीं रहते हैं इसलिए मौका कैसे दिया जाए। विपक्ष ने शायद स्पीकर के बहाने सरकार पर अविश्वास जताने का मौका ढूंढा था। विचित्र हालत तब हो गई जब गृहमंत्री के भाषण के बाद प्रस्ताव रखने वाले एमपी ने अपने प्रस्ताव के पक्ष में शायद बोलने से ही इनकार कर दिया। गृह मंत्री के उत्तर के बाद इतना ज्यादा शोर शराबा होता रहा विपक्ष की तरफ से कुछ सुनाई नहीं पड़ा की क्या वजह थी की प्रस्ताव रखने वाले ने अपने प्रस्ताव के पक्ष में और गृहमंत्री की बात काटते हुए अपने विशेष अधिकार का प्रयोग तक नहीं किया। एक ही बात सुनाई पड़ रही थी "अमित शाह माफी माँगो" लेकिन पता नहीं किस बात के लिए। लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान एक बात उभर कर आयी के विपक्ष के पास कोई सशक्त वक्ता नहीं है। विपक्ष के पास मौका था गृहमंत्री के वक्तव्य को काटने का लेकिन उसे अवसर का विपक्ष ने उपयोग ही नहीं किया।

पुराने दौर का मजबूत और प्रभावी विपक्ष

आज के परिपेक्ष में यदि हम पुराने समय के विपक्ष के नेताओं के बारे में सोचें तो ध्यान में आता है एक लंबी कतार थी विपक्ष के दिग्गज नेताओं की जिन में कम्युनिस्ट पार्टी के भूपेश गुप्त, हीरेन मुखर्जी समाजवादी जेबी कृपलानी, राम मनोहर लोहिया, मधु लिमए और मधु दंडवते। स्वतंत्र पार्टी से एनजी रंगा और मीनू मसानी। इसी प्रकार जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेई और पंडित दीनदयाल उपाध्याय। यह लोग जो सवाल उठाते थे अनेक बार सरकार निरुत्तर हो जाती थी। मुझे याद है डॉक्टर लोहिया ने जब बजट पर चर्चा के दरमियान कहा था कि देश की प्रति व्यक्ति दैनिक आमदनी तीन आना है तो नेहरू जी को बहुत ही नागवार गुजरा था और सरकार के कर्मचारियों ने खोजबीन के बाद दूसरे दिन सरकार ने शायद तेरह आना स्वीकार किया था। चीन के हाथों भारत की पराजय के कर्म पर चर्चा के समय शर्मनाक पराजय के कारण स्पष्ट रूप से सरकार नहीं बता पाई और जहाँ तक मैं समझता हूँ, जाँच रिपोर्ट आज भी संसद में धूल खा रही है। किसी को नहीं पता कि भारत की शर्मनाक पराजय क्यों हुई थी।

मुद्दों की कमी या रणनीति की कमजोरी?

विपक्ष की तरफ से उतारे गए अनेक वक्ताओं ने यह कहा कि अविश्वास प्रस्ताव स्पीकर बिरला के खिलाफ नहीं है बल्कि सरकार द्वारा संसद के संचालन में हस्तक्षेप के खिलाफ है। सत्ता पक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना था तब वह सीधे प्रधानमंत्री के खिलाफ ला सकते थे लेकिन ऐसा नहीं किया। सत्ता पक्ष के खिलाफ आरोप यह लगता रहा है कि उसने ईवीएम मशीन का दुरुपयोग करके वोट चोरी की है और बहुत ही असिस्ट तरीके से नारे लगाए कि वोट चोर गद्द्दी छोड़। अब वे लोग 70 साल पीछे जाना चाहते हैं और वैलिड बॉक्स के माध्यम से पर्ची डालकर वोटिंग करना चाहते हैं। कैसी विचित्र बात है की वैलिड बॉक्स और पर्ची छोड़कर उसके स्थान पर ईवीएम मशीन उन्हीं लोगों के द्वारा लाई गई थी जिस जो लोग यह संदेह व्यक्त कर रहे हैं कि इसका दुरुपयोग संभव है, ऐसा किसी ने अभी तक प्रमाणित नहीं किया है और जब तक प्रमाणित नहीं किया जाता इसे तथ्य आधारित नहीं माना जाएगा।

पुराने चुनावी दौर की सच्चाई और बदलाव

अब से 50 साल पहले जब वर्तमान विपक्ष के घटक शासन कर रहे थे तो उन पर यह दोषारोपण हुआ था कि रूस ने ऐसी स्याही दी है जिसे चुनाव के समय उंगली पर लगाने के बाद कुछ ही समय में मिटाया जा सकता है। बहुत शोर शराबा हुआ था लेकिन इसे तब के विपक्ष ने प्रमाणित करने का प्रयास नहीं किया। 60 के दशक में पार्टयों के लठैत बूथों पर कब्जा कर लेते थे और अपने मनपसंद पार्टी के खाने में टप्पा लगाकर मतदान पेटी में डाल दिया करते थे। बूथ कैपचरिंग कि इस प्रक्रिया से निजात पाने के लिए ही ईवीएम मशीन सामने आई। इसलिए उन्हें लोगों द्वारा एवं प्रश्न का पैदा करना जो स्वयं इस मशीन को लाए थे थोड़ा विचित्र लगता है।

संसद में हंगामा: नुकसान किसका?

सत्ता पक्ष को शायद लगता होगा के विपक्ष उन्हें काम नहीं करने दे रहा। चाहे संसद के अंदर की कार्यवाही हो, जिसमें हल्ला ब्रिगेड सक्रिय हो जाती है और देश के गरीबों का पैसा जो लाखों रुपए रोज संसद की कार्यवाही पर खर्च होता है लेकिन कई कई दिनों तक नतीजा कुछ नहीं निकलता। इसके विपरीत शायद विपक्ष को लगता होगा की सत्ता पक्ष उनके अनुसार सरकार क्यों नहीं चलती। यह अपेक्षाएं पहले भी होती रही होगी लेकिन अब थोड़ा अधिक हो गई है।

राष्ट्रीय मुद्दों पर राजनीति बनाम सहयोग

विपक्ष तो तब भी था जब देश का बंटवारा हुआ। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने भारत का बटवारा स्वीकार किया था जिसमें लाखों लोगों का खून खराबा हुआ था। 1971 में पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूर्वी पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद अतिरिक्त टैक्स लगाया गया था, आर्थिक संकट से निपटने के लिए। विपक्ष ने आज जैसा रुख नहीं अपनाया था और सत्ता पक्ष का साथ दिया था। आज तो जब देशवासियों को गैस सिलेंडर या पेट्रोल अथवा डीजल मिलने में कठिनाई हो रही है तो इसका जिम्मेदार सत्ता पक्ष को ठहराया जा सकता है परन्तु विपक्ष द्वारा उसमें विजय भव महसूस करना थोड़ा अटपटा लगता है। जहाँ तक विदेश नीति की आलोचना की बात है तो भारत की तटस्थ विदेश नीति तब भी थी जब हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे लग रहे थे और चीन ने दगाबाजी करके भारत पर हमला कर दिया था। सरकार किसी देश के साथ यदि कोई समझौता करती है और उसमें दोष दिखाई पड़ते हैं तो यह कहना कि भारत की गर्दन दबा दी है या अमेरिका को देश बेच दिया, यह उचित नहीं है।

विदेश नीति और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति

हमारे देश में वर्तमान विपक्ष को चुनाव आयोग पक्षपात करता हुआ लगता है, ईवीएम मशीन नकारा लगती है, मुख्य चुनाव आयुक्त और संसद के स्पीकर पक्षपाती लगते हैं तथा सरकार देश बेचने वाली और घुटना टेकने वाली लगती है। फिर भी गरीब जनता उसे बार बार चुनती है। जनता का हित हो रहा है या अहित इसका फैसला कौन करेगा ? देश की तटस्थ विदेश नीति नाकाम लगती है और सरकार का एक भी काम सही नहीं लगता। लेकिन यह सारी व्यवस्थाएं उन्हीं की बनाई हुई है जिन का प्रयोग करते हुए सदियों तक उन्होंने शासन किया और वर्तमान का सत्ता पक्ष उसी व्यवस्था में काम कर रहा। नेहरू जी के समय में दुनिया ने, भारत को तटस्थ न मानकर रूस का पक्षधर मनाती रही थी। लेकिन वर्तमान में भारत की तटस्थ विदेश नीति स्वीकार हो रही है। भारत के लोग प्राक्रतिक गैस और तेल की कमी से कठिनाई तो महसूस कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षित और शांत जीवन बिता रहे है। यदि किसी एक पक्ष की तरफ झुकाव होगा तो यह निश्चिंतता नहीं रह पायेगी। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच परस्पर सम्मान और विश्वांश तभी संभव है जब सत्ता पक्ष को जनहित की नीतियाँ बनाने और काम करने का वातावरण मिले। विपक्ष की आलोचना तभी सार्थक होगी जब वह तथ्यों पर आधारित होगी और भविष्य की आशंकाओं पर आधारित नहीं होगी।
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