पराली सिर्फ किसानों का सरदर्द नहीं है, सरकार भी उठाए जिम्मेदारी

पराली सिर्फ किसानों का सरदर्द नहीं है, सरकार भी उठाए जिम्मेदारी

हाल ही में हवाई जहाज से चंड़ीगढ़ लौटते समय मैंने देखा कि खेतों में कई जगहों पर आग लगी हुई थी। खेतों में लगी यह आग संख्या में पहले के वर्षों जितनी तो नहीं थी फिर भी उसे देखकर लगा समस्या बरकरार है। मेरे सहयात्री पवनप्रीत सिंह बोल उठे, "यह तो कुछ भी नहीं है। जैसे-जैसे आप पटियाला की तरफ या उससे आगे बढ़ते जाएंगे तब आप असलियत में देख पाएंगे कि पराली में लगी आग कितने बड़े इलाके में फैली हुई है।" पवनप्रीत बठिंडा के पास मुक्तसर में बायोमास एनर्जी प्लांट चलाते हैं।

मैं पटियाला और संगरूर की हवाई यात्रा तो नहीं कर सकता था लेकिन मैं उनकी बात समझ गया। भले ही अभी पराली की आग पिछले पांच बरसों (2014 से 2018 के बीच) में सबसे कम लग रही है लेकिन सबसे बुरा दौर आना अभी बाकी है। इस साल फसल कटाई के समय भारी बारिश की वजह से कटाई विलंब से हुई है। इस लिहाज से अगले दो हफ्ते बड़े मुश्किल साबित होने वाले हैं।

इस साल फसल कटाई के समय भारी बारिश की वजह से कटाई विलंब से हुई है। इस लिहाज से अगले दो हफ्ते मुश्किल होने वाले हैं।

सरकार जिस तरह से पराली जलाने से रोकने के अपने फैसले को लागू कर रही है उसके खिलाफ किसानों के एक बड़े तबके ने विद्रोही तेवर दिखाते हुए अपनी नाराजगी जताई है। हर रोज इस इलाके से पराली जलाने की खबरें आ रही हैं। एक तरफ, जहां राज्य सरकारें उपग्रह के इस्तेमाल से खेतों में आग लगाने वाले किसानों पर नजर रख रही हैं, वहीं ऐसे भी किसान हैं जो खेतों में आग लगाने से बचने के लिए हर संभव उपाय कर रहे हैं। इनमें मल्चिंग या पराली की खाद बनाना वगैरह शामिल है। पर मुद्दे की बात यह है कि किसानों ने अपनी तरफ से पहल शुरू कर दी है भले ही सरकार और बहुत हद तक जनता को किसानों की कोई खास परवाह नहीं है। असल में, अगर पराली जलाने से दिल्ली में प्रदूषण न हो तो पंजाब के किसानों में किसी को कोई रुचि नहीं है।

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आखिर ये किसान पराली में आग लगाना बंद क्यों नहीं कर रहे हैं? किसान क्यों पराली में आग लगाने को मजबूर हैं इसके वाजिब कारणों पर काफी कुछ लिखा और बोला जा चुका है, इसके बावजूद व्यावहारिक तरीके से किसानों के गुस्से को शांत करने की कोई कोशिश नहीं की गई। किसान मूर्ख नहीं हैं, वह भी जानते हैं कि वायु प्रदूषण उनके, उनके परिवार और वातावरण के लिए हानिकारक है।

सरकार के बताए तरीके से पराली से निपटने में मशीनों का इस्तेमाल किया जाए तब भी एक एकड़ में 5 से 6 हजार रुपए का खर्च आता है।

वर्तमान दौर में भारतीय खेती जिस आर्थिक संकट से गुजर रही है उसे देखते हुए जिन किसानों ने पराली में आग लगाने की जगह फसलों के अपशिष्ट के निपटारे के लिए ज्यादा श्रमसाध्य तरीका अपनाया है उन्हें पर्याप्त वित्तीय सहायता मुहैया कराने की जरूरत है। अगर सरकार के बताए तरीके से पराली से निपटने के लिए मशीनों का भी इस्तेमाल किया जाए तब भी एक एकड़ में 5 से 6 हजार रुपए का खर्च आता है। किसानों पर आए इस अतिरिक्त बोझ के एवज में उन्हें मुआवजा दिया जाना चाहिए।

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लेकिन इसके उलट, पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि प्रधानराज्य किसानों को ज्यादा से ज्यादा मशीनें बेचने पर आमादा हैं। शायद उन्हें यह अहसास नहीं है कि कृषि संकट की बहुत बड़ी वजह इन मंहगे कृषि उपकरणों का अनचाहा बोझ भी है। पंजाब सरकार ने अभी तक 27,972 कृषि उपकरणों की आपूर्ति की है। इनमें हैपी सीडर, पैडी स्ट्रॉ चॉपर, कटर, मल्चर, रिवर्सिबल बोर्ड प्लो, श्रब कटर, जीरो टिल ड्रिल शामिल हैं। इसके अलावा सरकार ने यह भी आवश्यक कर दिया है कि हार्वेस्टर मशीनों में सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट उपकरण लगाए जाएं जो फसल अवशेष को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में बिखेर दे। दूसरी अधिकांश मशीनों में रोटावेटर और एक रोटरी स्लैशर लगाने की जरूरत पड़ेगी। हरियाणा में, ऐसी 40 हजार मशीनें 900 हायरिंग सेंटरों को भेजी जा चुकी हैं, इसके अलावा हजारों किसान व्यक्तिगत तौर पर इन मशीनों को खरीद चुके हैं। अगर एक किसान ये मशीनें खरीदता है तो उसे ये 50 प्रतिशत सब्सिडी के साथ मिलेंगी, और अगर कोऑपरेटिव और किसानों का समूह इन्हें खरीदता है तो ये 80 प्रतिशत सब्सिडी पर उपलब्ध हैं।

किसान पराली जलाने के वातावरणीय दुष्प्रभावों से परिचित हैं। पर उन्हें इससे निपटने के लिए सरकारी मदद की जरूरत है।

एक तरह से यह कृषि उपकरण बनाने वाली कंपनियों के जबर्दस्त मुनाफा कमाने का सीजन है। इतने बरसों से वे इन मशीनों की बिक्री के लिए पूरा जोर लगा रही थीं, पराली में आग की घटनाएं उनके लिए मुंहमांगी मुराद पूरी होने जैसी है। उन्हें मौका मिल गया है कि अब वे अपनी मशीनें खेतों में खपा दें। पंजाब में पहले से ही लगभग 4.5 लाख ट्रैक्टर मौजूद हैं, जबकि जरूरत महज 1 लाख ट्रैक्टरों की है। ऐसे में मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि किसानों पर छह-आठ नई मशीनों को खरीदने का बोझ क्यों डाला जा रहा है। पंजाब में जरूरत से ज्यादा ट्रैक्टरों की बिक्री किसानों पर बढ़ते कर्ज के बोझ के लिए जिम्मेदार है। पराली में आग की समस्या अधिक से अधिक तीन हफ्तों तक चलती है, इसके बाद ये नई मशीनें साल भर बेकार पड़ी रहेंगी।

इन मशीनों की खरीद के लिए सरकार ने सब्सिडी का जो बंदोबस्त किया है उसी से पता चलता है कि जब खेती की बात आती है तो सरकार की नीतियों कितनी अदूरदर्शी साबित होती हैं। मैं हैरान हूं कि कहीं सरकार का वास्तविक लक्ष्य किसानों के नाम पर मशीन निर्माताओं को लाभ पहुंचाना तो नहीं है।

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने एक प्रस्ताव पेश किया था, वास्तव में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को इसी की जरूरत है। अमरिंदर सिंह ने केंद्र सरकार से मांग की थी कि किसान पराली को जलाने की जगह उसे काट कर अलग कर लें, यह सुनिश्चित करने के लिए 2000 करोड़ रुपयों की व्यवस्था की जाए। उन्होंने कहा था, "हमने मांग की थी कि केंद्र किसानों को प्रति क्विंटल पराली पर 100 रुपए दे। यह लगभग 2000 करोड़ रुपए के आसपास बैठेगा।" अमरिंदर सिंह का सुझाव सही था। पर उन्हें जवाब मिला कि सरकार के पास पैसा नहीं है।

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अजीब बात है, क्या राजमार्गों के निर्माण के लिए प्रस्तावित 6.9 लाख करोड़ रुपयों के आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज का एक छोटा सा हिस्सा पराली जलाने की समस्या के समाधान के लिए खर्च नहीं किया जा सकता? इसके अलावा, अभी कुछ महीनों पहले ही सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में 1 प्रतिशत की वृद्धि की थी। इससे राजकोष पर 3 हजार करोड़ रुपयों का अतिरिक्त बोझ आया। लेकिन जब बात खेती की होती है तो सरकार हमेशा हाथ खड़े कर देती है।

किसान पराली जलाने के वातावरणीय दुष्प्रभावों से परिचित हैं। पर उन्हें इससे निपटने के लिए वित्तीय मदद की जरूरत है। पंजाब के किसान पराली के सुरक्षित निबटारे पर आए खर्च के लिए प्रति एकड़ 6000 रुपयों की मांग कर रहे हैं। यह ऐसा निवेश है जो सरकार को साल में सिर्फ एक बार करना होगा। मुझे नहीं पता कि सरकार किसानों को सीधी वित्तीय मदद देने में क्यों असमर्थ है।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके निजी विचार हैं। उनका ट्विटर हैंडल है @Devinder_Sharma उनके सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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