पर्यावरण कैसे सुधरेगा
Dr SB Misra | May 30, 2026, 17:13 IST
मानव सभ्यता का इतिहास सिखाता है कि प्रकृति का सम्मान करने वाले ही आगे बढ़ते हैं। भारत की प्राचीन परंपरा प्रकृति को जीवन का आधार मानती है। जल, वायु, मिट्टी और वनस्पति जीवन के लिए आवश्यक हैं। जीव विविधता का संरक्षण भी महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण हर नागरिक की जिम्मेदारी है। प्रकृति का सम्मान ही सुरक्षित भविष्य की गारंटी है।
पर्यावरण संरक्षण
मध्ययुग में स्पेन एक समुद्री महाशक्ति बन गया था परन्तु जहाजों के बनाने में स्पेनवासियों ने इतने जंगल काट डाले कि स्पेन वीरान हो गया। उन्हीं दिनों भारत की धरती शस्य-श्यामला थी, सुख और समृद्धि का जीवन था, अब वह बात नहीं रही। इतिहास का यही सन्देश है कि जो सभ्यताएँ प्रकृति का सम्मान करेंगी वही भविष्य में फलेंगी और फूलेंगी। भारतीय मानसिकता, आस्थाएँ और जीवनशैली में बिगड़ते पर्यावरण की चुनौतियों को झेलने की शक्ति विद्यमान है, लेकिन उसका उपयोग तभी होगा जब हम करेंगे।
दुनिया की अनेक सभ्यताएँ विलुप्त हो चुकी हैं जैसे ग्वाटेमाला की टिकाल सभ्यता, पेरू की चान चान सभ्यता, मेक्सिको की माया सभ्यता और मध्यपूर्व की बेबिलोनियन सभ्यता। मध्यपूर्व की बेबिलोनियन सभ्यता के समय सिंचाई की नहरों का जाल बिछा था, हरियाली, खुशहाली और सम्पन्नता थी। वहाँ की नहरें बालू-मिट्टी से इसलिए भर गईं कि ऊँचे भागों में जंगलों का बेहद कटान और मिट्टी का क्षरण हुआ। इस प्रकार सीरिया, इराक, लेबनान और तुर्की की भूमि रेगिस्तान बन गई और जलवायु की दुर्दशा हुई।
हमारे पूर्वजों का मानना था कि यह पृथ्वी बहुत पुरानी है, इसके साथ हमारा नाता भी उतना ही पुराना है और इस पर हमें बार-बार आना है अतः इसे बचाकर रखना है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हुए जीवन बिताने की भारतीय आदत पर्यावरण की रक्षा में सहायक थी, इसीलिए हमारी संस्कृति जीवित है। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति और प्राणी - यानी जीव और जगत - का सम्बन्ध बड़ी बारीकी से समझा था और निष्कर्ष निकाला था - “यत् पिण्डे तथैव ब्रह्माण्डे।” इसे और स्पष्ट करते हुए कहा गया कि “क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच तत्व मिलि बनेहु शरीरा।” इनमें से यदि एक भी घटक न रहे या दूषित हो जाय तो शरीर संकट में पड़ सकता है।
हमारे देश की मान्यता रही है कि पंच तत्वों से बना हुआ यह शरीर तभी तक स्वस्थ रह सकता है जब तक इन घटकों का बाहरी जगत में सन्तुलन बना है। मनुष्य का जीवन तभी तक है जब तक वायुमंडल में प्राणवायु यानी ऑक्सीजन है और प्राणवायु तभी तक है जब तक उसका निर्माण करने वाले पेड़ और वनस्पति पृथ्वी पर विद्यमान हैं। पेड़ और वनस्पति तभी तक हैं जब तक धरती पर मिट्टी और पानी है। किसी भी कड़ी को तोड़ने से पूरी श्रृंखला टूट जाएगी। प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन सबसे महत्त्वपूर्ण है जो वायुमंडल में दूसरी अनेक गैसों के साथ पाई जाती है। वायुमंडल की दूसरी गैस कार्बन डाइऑक्साइड अर्थात धुएँ का भी अपना महत्त्व है। यदि वायुमंडल में इसकी मात्रा अत्यधिक हो जाय तो तापमान बढ़ जाएगा और यदि बहुत कम हो जाय तो तापमान घटेगा और हिमयुग आ सकता है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण घटक है पानी जो धरती के ऊपर और धरती के अन्दर पाया जाता है। वर्तमान में भूजल का स्तर नीचे गिर रहा है और सतह पर जलभंडारण घट रहा है। इसलिए आने वाले वर्षों में पीने का पानी मिलना कठिन हो जाएगा। यदि इस संकट से बचना है तो पृथ्वी पर जलभंडारण और जल-प्रबंधन की अपनी पुरानी परम्पराओं को फिर से जीवित करना होगा और भूजल पर से दबाव घटाना होगा। हमारे देश में भी हिमालय का क्षेत्र लगातार जंगल कटने के कारण पथरीले रेगिस्तान में बदल रहा है और वहाँ प्रायः भूस्खलन होता रहता है। हमारे देश के पूर्वज वनों के महत्त्व को जानते थे और वानप्रस्थ आश्रम में पहुँचकर वनों में निवास करते थे; आदर्श पर्यावरण की सदैव कामना रहती थी।
पर्यावरण दिवस हर साल 5 जून को आता और चला जाता है। कुछ भाषण होते हैं, गोष्ठियाँ और चर्चाएँ, वादे और संकल्प व्यक्त किए जाते हैं और बस। ठीक उसी तरह जैसे बाल दिवस, शिक्षक दिवस, मित्रता दिवस, तम्बाकू निवारण दिवस और न जाने कितने दिवस आते-जाते रहते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध हमारी संस्कृति से है और पर्यावरण को बचाने के लिए भारतीय संस्कृति को बचाना होगा।
पर्यावरण चर्चा ने तब जोर पकड़ा था जब अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देशों के ऊपर नीली छतरी अर्थात ओज़ोन परत में छेद देखे गए। अब तो सभी जानते हैं कि प्रदूषण अपनी सीमाएँ पार कर चुका है, मिट्टी के कटान की गति तेज़ हुई है, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि हो रही है, पर्वतीय क्षेत्र अस्थिर हैं, रोगाणुओं और विषाणुओं की निरन्तर वृद्धि हो रही है, मानव का अस्तित्व ही संकट में है। हम में से कुछ लोग जानते तो हैं परन्तु मानते नहीं कि इनके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है भारतीय संस्कृति और जीवनशैली से बढ़ती दूरी।
आज वायुमंडल का तापमान यानी ग्रीनहाउस प्रभाव बढ़ रहा है क्योंकि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। इससे हिमखंड पिघल सकते हैं और समुद्र का जलस्तर बढ़ सकता है जिससे समुद्र के किनारे बसे नगर जलमग्न हो सकते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड को वृक्ष अपने भोजन के रूप में प्रयोग करके उसके बदले प्राणवायु देते रहते हैं। इससे वृक्षों का महत्त्व समझ में आ जाना चाहिए। वायुमंडल के ऊपरी भाग में ओज़ोन की परत है जो सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों को रोकती है। लेकिन रेफ्रिजरेटरों, एयर कंडीशनर तथा फ्रिज आदि के निर्माण में काम आने वाली क्लोरोफ्लोरोकार्बन गैस ओज़ोन परत को क्षति पहुँचाती है। यह गैस जगह-जगह ओज़ोन को नष्ट कर देती है और ओज़ोन परत में छिद्र होने लगते हैं। अब तो गाँवों में भी फ्रिज बढ़ रहे हैं, पेड़ घट रहे हैं और गाँवों में शीतल मन्द समीर नहीं रह गई है। जल के विषय में सोचें तो पृथ्वी पर जलचक्र सदैव चलता रहता है। समुद्र की सतह से पानी वाष्प बनकर वायुमंडल में जाता है, वहाँ से घनीभूत होकर वर्षाजल के रूप में पृथ्वी पर गिरता है; जिसका कुछ भाग पर्वतों पर बर्फ के रूप में जमा रहता है, कुछ भाग प्रतिवर्ष पृथ्वी के अन्दर समाकर भूजल के रूप में जमा हो जाता है और शेष भाग नदियों के माध्यम से पुनः समुद्र तक पहुँच जाता है।
आज सारी आवश्यकताएँ जैसे सिंचाई, कल-कारखाने, शौचालयों के फ्लश आदि सभी पृथ्वी के अन्दर के भूजल पर निर्भर हैं। परिणाम यह हुआ है कि भूजल का स्तर कुछ स्थानों पर एक मीटर प्रतिवर्ष की दर से नीचे गिर रहा है। आने वाले वर्षों में पीने का पानी मिलना कठिन हो जाएगा। यदि इस संकट से बचना है तो पृथ्वी की सतह पर जलभंडारण और जल-प्रबंधन की अपनी पुरानी परम्पराओं को पुनर्जीवित करना होगा और भूजल पर से दबाव घटाना होगा। मेरे गाँव में दो तालाब थे — देवरा और देवरी — जो साल भर पानी देते थे। आज वे सूख गए हैं और गाँववाले नहीं चाहते कि उन्हें पुनर्जीवित किया जाय। मकान बनाने के लिए जगह जो चाहिए। इसी प्रकार पृथ्वी पर हजारों वर्षों में मिट्टी की परत का निर्माण होता है। इस मिट्टी पर उगने वाली वनस्पति और पेड़ अनेक प्रकार से मिट्टी की रक्षा भी करते हैं, अपनी पत्तियों से इसे उपजाऊ बनाते हैं और वर्षाजल को भूप्रवेश के लिए अपनी जड़ों के माध्यम से प्रेरित करते हैं। जिन क्षेत्रों में वनस्पति नहीं रहती वहाँ की मिट्टी का कटान अधिक होता है, भूजल की मात्रा घटती रहती है और बंजर तथा अनुपजाऊ भूमि का निर्माण होता है। हमारे गाँव के पास एक बड़ा जंगल था जहाँ पशु-पक्षी रहते थे, पालतू जानवर चरने जाते थे और रमणीय वातावरण था। अब कट गया है और खेत बन गए। पृथ्वी को पेड़-पौधों और विविध वनस्पति से ढकने को अधिक दिन टाला नहीं जा सकता।
कई साल पहले कानपुर के चिड़ियाघर में कई दर्जन दुर्लभ प्रजाति के काले हिरन एक साथ मर गए, उनके मृत शरीरों के पोस्टमार्टम हुए और कहा गया कि सबके हार्ट फेल हो गए थे। अखबारों में खबर छपी और बात आई-गई हो गई; सबने मान लिया हार्ट अटैक की बात। प्रयाग और वाराणसी में पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध के दिनों में गिद्ध, कौवे, कुत्ते और विविध जानवरों को भोजन कराने की प्रथा है। इन जीवों की बहुत कमी आ गई है। बात अखबारों में छपती है, हम पढ़ लेते हैं, बस। आज हालत यह है कि मरे हुए जानवरों को खाने के लिए गिद्ध नहीं दिखाई पड़ते, हमें फ़िक्र नहीं होती। फ़िक्र होगी एक दिन जब बहुत देर हो चुकी होगी।
दूध के लालच में दूधियों ने जहरीला इंजेक्शन लगाकर जानवरों का माँस जहरीला कर दिया और जहरीला माँस खाकर गिद्ध मरने लगे; लगभग समाप्त हो गए हैं। अब मरे जानवर की खाल निकाले जाने के बाद खुले मैदान में माँस पड़ा रहता है जिसे निबटाने में कौवे और कुत्ते काम करने की कोशिश करते हैं। जहरीला माँस खाकर वे भी नहीं बचेंगे और वह खुले में सड़ता रहेगा; इससे नई-नई बीमारियाँ फैलेंगी। मनुष्य अपने स्वार्थवश अपने ही विनाश को दावत दे रहा है। जीवमंडल में जितने भी जीव-जन्तु विद्यमान हैं -चाहे जल में मछलियाँ, मरुस्थल में ऊँट और बकरी, पर्वतीय और मैदानी भागों में गाय, भैंस, याक आदि तथा पेड़ों पर पक्षी और कीट-पतंगे, अथवा मिट्टी के अन्दर रहने वाले साँप और चूहे — सबका जीवन एक-दूसरे पर निर्भर है और मनुष्य का इन सब पर। वृक्षों और पौधों के फूलों में परागण (गर्भाधान) कीट-पतंगे और मधुमक्खियाँ करती हैं। बदले में वृक्ष उपजाऊ मिट्टी की परत को क्षरण से बचाते हैं, सूखी पत्तियों से उसे उपजाऊ शक्ति प्रदान करते हैं, फल और छाया देते हैं।
दलहनी फसलें बोने से खेत उपजाऊ हो जाता है क्योंकि ऐसी फसलों की जड़ों में एक प्रकार का बैक्टीरिया होता है - राइज़ोबियम - जो हवा से नाइट्रोजन लेकर उसे मिट्टी में स्थिर करता है। इसी प्रकार केंचुआ भी मिट्टी को उलट-पलट कर उपजाऊ बना देता है। गाँवों में रहने वाले लोग विविध प्रकार के जीवों को अन्न, भोजन और दूध देते हैं और पूजा में अनेकानेक वनस्पतियों का प्रयोग करते हैं और जीव विविधता की रक्षा करते रहे हैं। बहुत से पशु, पक्षी, कीट-पतंगे, पेड़-पौधे केवल नाम में बचे हैं। हमें इस बात का एहसास नहीं कि प्राणि और वनस्पति पर ही निर्भर है हमारा जीवन। जब हम लकड़ी ईंधन जलाते हैं तो वायुमंडल में धुआँ यानी कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं और पेड़-पौधे इसे अपने भोजन के लिए प्रयोग करके बदले में प्राणवायु यानी ऑक्सीजन देते हैं। जल में रहने वाली मछलियाँ और अन्य जीव जल को शुद्ध करते हैं; वर्ना नदी-तालाबों का पानी किसी काम का नहीं रहेगा।
जीवित रहने के लिए शाकाहारी प्राणी तो वनस्पति पर निर्भर ही हैं और माँसाहारी प्राणी भी जिन जन्तुओं को खाते हैं वे वनस्पति पर निर्भर हैं। विविध जीव एक-दूसरे के लिए भोजन श्रृंखला बनाते हैं - जैसे घास और वनस्पति को वन्य जीव खाते हैं और उन्हें शेर खाता है। परन्तु जब वन्य जीवों को मनुष्य खाने लगेगा और शेर का भोजन छिन जाएगा तो वह मनुष्य को खाएगा। इसलिए पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों तथा वनस्पति को जीवित रखकर भोजन श्रृंखला को बचाए रखना है। पेड़ों के अंधाधुंध कटान के साथ ही पेड़ों पर रहने वाले पक्षियों और कीट-पतंगों का संसार भी उजड़ रहा है। नीम, तुलसी, हल्दी, आँवला आदि के गुण हमारे गाँवों के लोगों को मालूम थे। वे चेचक के मरीज की खाट पर नीम की पत्तियाँ अनिवार्य रूप से रखते थे और मरते समय तक तुलसी की पत्तियाँ मुँह में डालते थे। गाँवों में घर के सामने नीम के अनेक पेड़ लगाए जाते थे; घर में तुलसी का पौधा तो रहता ही था। ये पौधे वायु में पाए जाने वाले जीवाणुओं और विषाणुओं को नष्ट करते हैं। पश्चिमी देशों के लोग कभी नीम, कभी हल्दी, आँवला, जामुन और कभी तुलसी का पेटेंट कराते रहते हैं जिससे हम इनसे औषधियाँ बनाने से वंचित रहें।
जैव विविधता मनुष्य की धरोहर ही नहीं बल्कि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संसाधन भी है क्योंकि अनेकानेक जंगली प्रजातियों के साथ संकरण करके अनाज की नए प्रकार की रोग-अवरोधी प्रजातियाँ उत्पन्न की जा सकती हैं। अफसोस की बात है कि पिछली कुछ दशाब्दियों में ही हमारी वे अन्न की प्रजातियाँ विलुप्त हो गई हैं जो उत्पादन भले ही कम देती थीं परन्तु उनमें रोग नहीं लगते थे। विदेशियों का कुचक्र चल रहा है। उन्होंने एक अद्भुत तरीका निकाला है जिससे वे विलुप्त हो रही प्रजातियों के “जीन्स” निकालकर जीन्स बैंक बना रहे हैं। वे जब चाहेंगे उन्हीं जीन्स की मदद से फिर से अपने देश में जानवर और अनाज की वही प्रजातियाँ उत्पन्न कर लेंगे। गरीब देश देखते रह जाएँगे।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि धरती पर जितने भी प्राणि और वनस्पति विद्यमान हैं सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं। जब हम लकड़ी ईंधन जलाते हैं तो वायुमंडल में धुआँ छोड़ते हैं और पेड़-पौधे इसे अपने भोजन के लिए प्रयोग करके बदले में प्राणवायु देते हैं। यदि पेड़-पौधे न हों तो मनुष्य के लिए साँस लेने को प्राणवायु नहीं बचेगी। जल में रहने वाली मछलियाँ और अन्य जीव जल को शुद्ध करते हैं परन्तु जल-प्रदूषण के कारण जब मछलियाँ मरने लगेंगी तो जल को शुद्ध कौन करेगा। वृक्ष हमें शुद्ध वायु, अच्छे फल, औषधियाँ, ईंधन तथा पशुओं का चारा प्रदान करते हैं; साथ ही उपजाऊ मिट्टी की परत को क्षरण से बचाते हैं, सूखी पत्तियों से उसे उपजाऊ शक्ति प्रदान करते हैं और वर्षा के प्रेरक बनते हैं।
जीव श्रृंखला में सभी का अपना महत्त्व है। इसलिए पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों तथा वनस्पति को भी जीवित रहने का उतना ही अधिकार है जितना हमें। भारत के लोगों ने कच्छप, शूकर, मछली और नरसिंह के रूप में भी परमात्मा के दर्शन किए थे। पूजा-अर्चना के लिए जब हम बैठते हैं तो फूल, दूब घास, कुश, चन्दन, तुलसीदल, बेलपत्र, आम के पत्ते, जल, फल आदि हमारे सामने होते हैं। इनके बिना तो पूजा-अर्चना ही सम्भव नहीं। हमें याद रखना होगा कि यदि हमारे व्यवहार के कारण जानवर और पशु विलुप्त हो सकते हैं तो स्वयं मनुष्य भी हो सकता है; हम भस्मासुर बन जाएँगे।
16 जून 2013 को बाढ़ और भूस्खलन ने गढ़वाल हिमालय में जो ताण्डव किया उसकी विकरालता बढ़ाने में स्वयं मनुष्य का भी योगदान है। दिल्ली में बाढ़ और केदारनाथ घाटी में भूस्खलन को शायद रोका तो नहीं जा सकता था परन्तु इसकी विनाशलीला को कम जरूर किया जा सकता था। आपदा प्रबंधन का तंत्र तभी सक्रिय होता है जब आपदा सिर पर होती है। आपदा के पहले और आपदा गुजर जाने के बाद प्रबन्धन भी शान्त हो जाता है। केदारनाथ की घटना बादल फटने से हुई थी। बरसात के दिनों में जब अधिक ऊँचाई वाले बादल बड़ी-बड़ी बूँदों वाले पानी में घनीभूत हो जाते हैं और छोटी बूँदों के साथ मिलकर अचानक और थोड़े इलाके में घनघोर वर्षा करते हैं तो इसे क्लाउडबर्स्ट यानी बादल फटना कहते हैं। जब मैदानी इलाकों में बादल फटते हैं तो केवल बाढ़ आने का डर रहता है लेकिन पहाड़ी इलाकों में बाढ़ के साथ भूस्खलन अर्थात ढालू धरती भी खिसकती है। दुनिया भर में और हमारे देश में भी अनेक स्थानों पर बादल फटते रहते हैं। जुलाई 1970 का बादल फटना बहुतों को याद होगा जब अलकनन्दा नदी का जलस्तर लगभग 15 मीटर बढ़ गया था; 1998 को मालपा में बादल फटने और भूस्खलन से 250 लोगों की मृत्यु हुई थी जिसमें कैलाश मानसरोवर के यात्री भी शामिल थे; अगस्त 2010 में लेह में बादल फटने और भूस्खलन से करीब 1000 लोग मरे थे और अब केदारनाथ और अन्य स्थानों पर भारी वर्षा और भूस्खलन से कई हजार लोगों के मरने की आशंका है।
बाढ़ नियंत्रण के लिए मैदानी इलाकों में नदियों पर बाँध बनाने की बात कही जाती है परन्तु अस्थिर पहाड़ों पर टिहरी जैसे बड़े बाँध और जलाशय बनाकर बोझा बढ़ाना तर्कसंगत नहीं लगता। साथ ही जब ऐसे जलाशयों से पानी छोड़ना पड़ता है तो निचले भागों में बाढ़ और आपदा की आशंका बढ़ती है। दिल्ली में बाढ़ का कारण वर्षाजल नहीं था, हथिनी कुण्ड से छोड़ा गया पानी था। केदारनाथ घाटी में तबाही वर्षाजल से कम बल्कि अचानक वर्षा के कारण भूस्खलन से अधिक हुई। भूस्खलन के लिए मनुष्य की गतिविधियाँ बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। वैसे तो अनादि काल से नदी-घाटी सभ्यताएँ नदियों के किनारे शहर और गाँव बनाकर विकसित होती रही हैं लेकिन तब आबादी कम थी, मकान भारी-भरकम नहीं होते थे, धरती पर वनस्पति की चादर ढकी थी और मोटर गाड़ियों के न होने से पक्की सड़कों की जरूरत नहीं थी। अब पहाड़ों के ऊपर बहुमंजिला मकान बनने से एक तरफ तो वजन बढ़ा है तो निचले भागों में सड़क बनाने के लिए कटान करके पहाड़ी ढलान को अस्थिर बना दिया गया है। मकान और सड़क निर्माण की इस प्रक्रिया में निकला मलबा मैदानी भागों तक पहुँचकर नदियों को ही पाटता है और बाढ़ का कारण बनता है।
पहाड़ों पर से पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो रहा है और सुन्दरलाल बहुगुणा जी का चिपको आन्दोलन लोग भूल चुके हैं। वनस्पति के अभाव में पानी तेजी से बहता है जिससे पहाड़ों पर मिट्टी का कटान बढ़ गया है। सड़कों का मार्ग यदि भूवैज्ञानिकों और इंजीनियरों की सलाह से न किया गया तो भूस्खलन होते रहेंगे। कुछ स्थानों पर सड़कें प्रायः टूटती ही रहती हैं क्योंकि वहाँ की भूरचना कमजोर होती है। जहाँ पर परतदार और कमजोर चट्टानें हैं वहाँ यदि जल निकास वैज्ञानिक ढंग से न हुआ तो भी भूस्खलन हो सकता है।
धनी लोगों की बड़ी गाड़ियाँ देवभूमि पर आसानी से चली जाएँ इसलिए कुमाऊँ और गढ़वाल के पहाड़ों पर काफी छेड़छाड़ की गई है। एक सज्जन कह रहे थे - “अब तो बद्रीनाथ के दरवाजे तक गाड़ी चली जाती है।” उन्हें कौन बताए - यह वरदान नहीं, अभिशाप है। विकास कार्य करते समय यदि मैदान और पहाड़ की जमीन की स्थिरता के अन्तर को ध्यान में न रखा गया तो वही होगा जो हो रहा है। अपनी परम्परा के अनुसार धार्मिक पर्यटन या तो पैदल होना चाहिए नहीं तो छोटे सार्वजनिक वाहनों से। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि विकास का मैदानी मॉडल यदि पहाड़ों पर थोपा जाता रहा तो हिमालय एक दिन रेगिस्तान बन जाएगा। कहना कठिन है कि जो लाखों लोग अपनी गाड़ियाँ लेकर छोटे-छोटे बच्चों के साथ देवभूमि में देवस्थानों को जाते हैं उनमें कितने आस्थावान श्रद्धालु होते हैं और कितने केवल भ्रमण के लिए जाते हैं। जो लोग केवल भ्रमण के लिए जाते हैं उन्हें सोचना चाहिए कि ऐसे दुर्गम स्थानों पर बच्चों को ले जाने का औचित्य क्या है। यह सच है कि संख्या के कारण आपदा नहीं आई परन्तु संख्या कम होने से आपदा प्रबंधन सरल हो सकता था। नेपाल और उत्तरी बिहार के इलाकों को भूकम्प ने झकझोर दिया है, त्राहि-त्राहि मची है। सारा देश दहशत में जी रहा है तो मन में आना स्वाभाविक है कि क्या हमारा समाज, देश या दुनिया कुछ नहीं कर सकती? कड़वी सच्चाई यह है कि जो कुछ करेगा भूकम्प करेगा, हम उसका कुछ नहीं कर सकते। विज्ञान की मदद से हम अपना बचाव कर सकते हैं। पुराने समय में यह भी सम्भव नहीं था।
विज्ञान ने यह जानकारी उपलब्ध कराई है कि किन स्थानों पर भूकम्प और ज्वालामुखी आने की अधिक सम्भावना है - उसी प्रकार जैसे हमें पता हो शेर की माँद कहाँ है। इस जानकारी के आधार पर हम शेर की माँद से दूर रहेंगे और यदि पास जाना बेहद जरूरी होगा तो पूरी सावधानी और तैयारी के साथ जाएँगे। जिन देशों को भूकम्प और ज्वालामुखी का प्रायः सामना करना पड़ता है उन्होंने यह सावधानी बरती है।
क्या कारण है कि हमारा विज्ञान यह तो बता पाता है कि भूकम्प की सम्भावना कहाँ अधिक है और कहाँ कम, लेकिन यह नहीं बता पाता कि भूचाल कब आएगा? गाँव की भाषा में कहें तो यदि एक मैदान में जलते चूल्हों पर सैकड़ों पतीलियाँ चढ़ी हों जिनमें पानी हो और जिन पर ढक्कन रखा हो - यह बताना तो सम्भव हो सकता है कि किस पतीली के ढक्कन को भाप अस्थिर कर रही है परन्तु यह नहीं कि कौन सा ढक्कन कब भाप द्वारा उठा दिया जाएगा। दुनिया के जिन भागों में प्रायः भूकम्प और ज्वालामुखी की घटनाएँ होती रहती हैं उनमें प्रशान्त महासागर के तटीय भागों में बसे देश प्रमुख हैं। जापान, चीन, इण्डोनेशिया हमारे पूर्व में और अमेरिका, मेक्सिको, ब्राज़ील, चिली आदि हमारे पश्चिम में। इसके अलावा भारतीय भूभाग के उत्तर में म्यानमार से चलकर हिमालय श्रृंखला यूरोप के आल्प्स पर्वत में मिलती है और एक अस्थिर बेल्ट बनाती है।
भारत को स्थिरता के हिसाब से तीन भागों में बाँट सकते हैं - पहला तो दक्षिण का पठारी भाग जो मजबूत और स्थिर है; दूसरा उत्तर में हिमालय जो निरन्तर अस्थिर है और जिस भाग में नेपाल पड़ता है। इन दोनों के बीच में गंगा-यमुना का मैदान है जिसके नीचे हजारों फीट गहरी बालू है। अब यदि बड़े बाँध बनाने हों या नए शहर बसाने हों तो स्थिर भागों का ही चुनाव करना होगा। आजादी के बाद जब पंजाब के उत्तरी भाग में भाखड़ा नांगल बाँध का निर्माण कराया गया तब इतनी जानकारी नहीं थी कि यह अस्थिर क्षेत्र है; अन्यथा वैकल्पिक स्थान खोजा गया होता। दुर्भाग्यवश हमारे देश में अनेक बार राजनेताओं की जिद, अहंकार और स्वार्थ इतना हावी हो जाता है कि भूवैज्ञानिक सोच गौण हो जाती है। टिहरी बाँध का विवाद ऐसी ही सोचों के टकराव का परिणाम है।
प्रधानमंत्री मोदी की योजना है अनेक स्मार्ट शहर बसाना। तब राजनीति से ऊपर उठकर भूगर्भ की जानकारी को ध्यान में रखते हुए योजनाएँ बनानी होंगी। कभी-कभी स्थिर भागों में भी परियोजनाएँ भूगर्भीय कारणों से प्रभावित हो जाती हैं जैसे महाराष्ट्र के कोयनानगर बाँध के साथ 1968 में हुआ था। कुछ लोगों का मानना है कि कोयनानगर भूकम्प आया ही कोयना बाँध के कारण, परन्तु यह प्रमाणित नहीं है। फिर भी यदि छोटे बाँधों और जलाशयों से काम चल सके तो बड़े बाँध न बनाए जाएँ और अस्थिर पर्वतीय क्षेत्रों में तो कतई नहीं। यदि अस्थिर भागों में बड़ी इमारतें बनानी ही हों तो हल्की भवन सामग्री का प्रयोग करना होगा। जापान में लकड़ी के मकान बनाते हैं परन्तु हमारे यहाँ तो जंगल कटने से लकड़ी की भी कमी है। भूकम्प से निपटने के लिए अलग डिजाइन के मकान बनाने होते हैं; हमारे पूर्वजों को यह ज्ञान था। वे ऐसी तकनीक का प्रयोग करते थे जिससे बनी इमारत में जोड़ होते थे जो शॉक अब्जॉर्बर का काम करते थे। दुनिया के विकसित देशों ने भूगर्भ की विस्तृत जानकारी हासिल की है और भूकम्प से निपटने के उपाय खोजे हैं। भवन निर्माण सामग्री, कमजोर इलाकों के लिए भवन डिजाइन, और कभी-कभी भूकम्प का पूर्वानुमान - यह सब मानव जाति के हित में उन्हें विकासशील देशों के साथ बाँटना चाहिए। भारतीय सोच को मानते हुए “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से ज्ञान बाँटना ही मानव जाति की रक्षा कर सकेगा। यदि पेटेंट कानून बनाकर ज्ञान छुपाते रहेंगे तो अमेरिका, चीन, यूरोप और रूस के भी पर्यटक नेपाल में मरते रहेंगे।
दुनिया की अनेक सभ्यताएँ विलुप्त हो चुकी हैं जैसे ग्वाटेमाला की टिकाल सभ्यता, पेरू की चान चान सभ्यता, मेक्सिको की माया सभ्यता और मध्यपूर्व की बेबिलोनियन सभ्यता। मध्यपूर्व की बेबिलोनियन सभ्यता के समय सिंचाई की नहरों का जाल बिछा था, हरियाली, खुशहाली और सम्पन्नता थी। वहाँ की नहरें बालू-मिट्टी से इसलिए भर गईं कि ऊँचे भागों में जंगलों का बेहद कटान और मिट्टी का क्षरण हुआ। इस प्रकार सीरिया, इराक, लेबनान और तुर्की की भूमि रेगिस्तान बन गई और जलवायु की दुर्दशा हुई।
हमारे पूर्वजों का मानना था कि यह पृथ्वी बहुत पुरानी है, इसके साथ हमारा नाता भी उतना ही पुराना है और इस पर हमें बार-बार आना है अतः इसे बचाकर रखना है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हुए जीवन बिताने की भारतीय आदत पर्यावरण की रक्षा में सहायक थी, इसीलिए हमारी संस्कृति जीवित है। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति और प्राणी - यानी जीव और जगत - का सम्बन्ध बड़ी बारीकी से समझा था और निष्कर्ष निकाला था - “यत् पिण्डे तथैव ब्रह्माण्डे।” इसे और स्पष्ट करते हुए कहा गया कि “क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच तत्व मिलि बनेहु शरीरा।” इनमें से यदि एक भी घटक न रहे या दूषित हो जाय तो शरीर संकट में पड़ सकता है।
हमारे देश की मान्यता रही है कि पंच तत्वों से बना हुआ यह शरीर तभी तक स्वस्थ रह सकता है जब तक इन घटकों का बाहरी जगत में सन्तुलन बना है। मनुष्य का जीवन तभी तक है जब तक वायुमंडल में प्राणवायु यानी ऑक्सीजन है और प्राणवायु तभी तक है जब तक उसका निर्माण करने वाले पेड़ और वनस्पति पृथ्वी पर विद्यमान हैं। पेड़ और वनस्पति तभी तक हैं जब तक धरती पर मिट्टी और पानी है। किसी भी कड़ी को तोड़ने से पूरी श्रृंखला टूट जाएगी। प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन सबसे महत्त्वपूर्ण है जो वायुमंडल में दूसरी अनेक गैसों के साथ पाई जाती है। वायुमंडल की दूसरी गैस कार्बन डाइऑक्साइड अर्थात धुएँ का भी अपना महत्त्व है। यदि वायुमंडल में इसकी मात्रा अत्यधिक हो जाय तो तापमान बढ़ जाएगा और यदि बहुत कम हो जाय तो तापमान घटेगा और हिमयुग आ सकता है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण घटक है पानी जो धरती के ऊपर और धरती के अन्दर पाया जाता है। वर्तमान में भूजल का स्तर नीचे गिर रहा है और सतह पर जलभंडारण घट रहा है। इसलिए आने वाले वर्षों में पीने का पानी मिलना कठिन हो जाएगा। यदि इस संकट से बचना है तो पृथ्वी पर जलभंडारण और जल-प्रबंधन की अपनी पुरानी परम्पराओं को फिर से जीवित करना होगा और भूजल पर से दबाव घटाना होगा। हमारे देश में भी हिमालय का क्षेत्र लगातार जंगल कटने के कारण पथरीले रेगिस्तान में बदल रहा है और वहाँ प्रायः भूस्खलन होता रहता है। हमारे देश के पूर्वज वनों के महत्त्व को जानते थे और वानप्रस्थ आश्रम में पहुँचकर वनों में निवास करते थे; आदर्श पर्यावरण की सदैव कामना रहती थी।
पर्यावरण दिवस हर साल 5 जून को आता और चला जाता है। कुछ भाषण होते हैं, गोष्ठियाँ और चर्चाएँ, वादे और संकल्प व्यक्त किए जाते हैं और बस। ठीक उसी तरह जैसे बाल दिवस, शिक्षक दिवस, मित्रता दिवस, तम्बाकू निवारण दिवस और न जाने कितने दिवस आते-जाते रहते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध हमारी संस्कृति से है और पर्यावरण को बचाने के लिए भारतीय संस्कृति को बचाना होगा।
पर्यावरण चर्चा ने तब जोर पकड़ा था जब अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देशों के ऊपर नीली छतरी अर्थात ओज़ोन परत में छेद देखे गए। अब तो सभी जानते हैं कि प्रदूषण अपनी सीमाएँ पार कर चुका है, मिट्टी के कटान की गति तेज़ हुई है, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि हो रही है, पर्वतीय क्षेत्र अस्थिर हैं, रोगाणुओं और विषाणुओं की निरन्तर वृद्धि हो रही है, मानव का अस्तित्व ही संकट में है। हम में से कुछ लोग जानते तो हैं परन्तु मानते नहीं कि इनके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है भारतीय संस्कृति और जीवनशैली से बढ़ती दूरी।
आज वायुमंडल का तापमान यानी ग्रीनहाउस प्रभाव बढ़ रहा है क्योंकि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। इससे हिमखंड पिघल सकते हैं और समुद्र का जलस्तर बढ़ सकता है जिससे समुद्र के किनारे बसे नगर जलमग्न हो सकते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड को वृक्ष अपने भोजन के रूप में प्रयोग करके उसके बदले प्राणवायु देते रहते हैं। इससे वृक्षों का महत्त्व समझ में आ जाना चाहिए। वायुमंडल के ऊपरी भाग में ओज़ोन की परत है जो सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों को रोकती है। लेकिन रेफ्रिजरेटरों, एयर कंडीशनर तथा फ्रिज आदि के निर्माण में काम आने वाली क्लोरोफ्लोरोकार्बन गैस ओज़ोन परत को क्षति पहुँचाती है। यह गैस जगह-जगह ओज़ोन को नष्ट कर देती है और ओज़ोन परत में छिद्र होने लगते हैं। अब तो गाँवों में भी फ्रिज बढ़ रहे हैं, पेड़ घट रहे हैं और गाँवों में शीतल मन्द समीर नहीं रह गई है। जल के विषय में सोचें तो पृथ्वी पर जलचक्र सदैव चलता रहता है। समुद्र की सतह से पानी वाष्प बनकर वायुमंडल में जाता है, वहाँ से घनीभूत होकर वर्षाजल के रूप में पृथ्वी पर गिरता है; जिसका कुछ भाग पर्वतों पर बर्फ के रूप में जमा रहता है, कुछ भाग प्रतिवर्ष पृथ्वी के अन्दर समाकर भूजल के रूप में जमा हो जाता है और शेष भाग नदियों के माध्यम से पुनः समुद्र तक पहुँच जाता है।
आज सारी आवश्यकताएँ जैसे सिंचाई, कल-कारखाने, शौचालयों के फ्लश आदि सभी पृथ्वी के अन्दर के भूजल पर निर्भर हैं। परिणाम यह हुआ है कि भूजल का स्तर कुछ स्थानों पर एक मीटर प्रतिवर्ष की दर से नीचे गिर रहा है। आने वाले वर्षों में पीने का पानी मिलना कठिन हो जाएगा। यदि इस संकट से बचना है तो पृथ्वी की सतह पर जलभंडारण और जल-प्रबंधन की अपनी पुरानी परम्पराओं को पुनर्जीवित करना होगा और भूजल पर से दबाव घटाना होगा। मेरे गाँव में दो तालाब थे — देवरा और देवरी — जो साल भर पानी देते थे। आज वे सूख गए हैं और गाँववाले नहीं चाहते कि उन्हें पुनर्जीवित किया जाय। मकान बनाने के लिए जगह जो चाहिए। इसी प्रकार पृथ्वी पर हजारों वर्षों में मिट्टी की परत का निर्माण होता है। इस मिट्टी पर उगने वाली वनस्पति और पेड़ अनेक प्रकार से मिट्टी की रक्षा भी करते हैं, अपनी पत्तियों से इसे उपजाऊ बनाते हैं और वर्षाजल को भूप्रवेश के लिए अपनी जड़ों के माध्यम से प्रेरित करते हैं। जिन क्षेत्रों में वनस्पति नहीं रहती वहाँ की मिट्टी का कटान अधिक होता है, भूजल की मात्रा घटती रहती है और बंजर तथा अनुपजाऊ भूमि का निर्माण होता है। हमारे गाँव के पास एक बड़ा जंगल था जहाँ पशु-पक्षी रहते थे, पालतू जानवर चरने जाते थे और रमणीय वातावरण था। अब कट गया है और खेत बन गए। पृथ्वी को पेड़-पौधों और विविध वनस्पति से ढकने को अधिक दिन टाला नहीं जा सकता।
जीव विविधता यानी विराट जीवन
दूध के लालच में दूधियों ने जहरीला इंजेक्शन लगाकर जानवरों का माँस जहरीला कर दिया और जहरीला माँस खाकर गिद्ध मरने लगे; लगभग समाप्त हो गए हैं। अब मरे जानवर की खाल निकाले जाने के बाद खुले मैदान में माँस पड़ा रहता है जिसे निबटाने में कौवे और कुत्ते काम करने की कोशिश करते हैं। जहरीला माँस खाकर वे भी नहीं बचेंगे और वह खुले में सड़ता रहेगा; इससे नई-नई बीमारियाँ फैलेंगी। मनुष्य अपने स्वार्थवश अपने ही विनाश को दावत दे रहा है। जीवमंडल में जितने भी जीव-जन्तु विद्यमान हैं -चाहे जल में मछलियाँ, मरुस्थल में ऊँट और बकरी, पर्वतीय और मैदानी भागों में गाय, भैंस, याक आदि तथा पेड़ों पर पक्षी और कीट-पतंगे, अथवा मिट्टी के अन्दर रहने वाले साँप और चूहे — सबका जीवन एक-दूसरे पर निर्भर है और मनुष्य का इन सब पर। वृक्षों और पौधों के फूलों में परागण (गर्भाधान) कीट-पतंगे और मधुमक्खियाँ करती हैं। बदले में वृक्ष उपजाऊ मिट्टी की परत को क्षरण से बचाते हैं, सूखी पत्तियों से उसे उपजाऊ शक्ति प्रदान करते हैं, फल और छाया देते हैं।
दलहनी फसलें बोने से खेत उपजाऊ हो जाता है क्योंकि ऐसी फसलों की जड़ों में एक प्रकार का बैक्टीरिया होता है - राइज़ोबियम - जो हवा से नाइट्रोजन लेकर उसे मिट्टी में स्थिर करता है। इसी प्रकार केंचुआ भी मिट्टी को उलट-पलट कर उपजाऊ बना देता है। गाँवों में रहने वाले लोग विविध प्रकार के जीवों को अन्न, भोजन और दूध देते हैं और पूजा में अनेकानेक वनस्पतियों का प्रयोग करते हैं और जीव विविधता की रक्षा करते रहे हैं। बहुत से पशु, पक्षी, कीट-पतंगे, पेड़-पौधे केवल नाम में बचे हैं। हमें इस बात का एहसास नहीं कि प्राणि और वनस्पति पर ही निर्भर है हमारा जीवन। जब हम लकड़ी ईंधन जलाते हैं तो वायुमंडल में धुआँ यानी कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं और पेड़-पौधे इसे अपने भोजन के लिए प्रयोग करके बदले में प्राणवायु यानी ऑक्सीजन देते हैं। जल में रहने वाली मछलियाँ और अन्य जीव जल को शुद्ध करते हैं; वर्ना नदी-तालाबों का पानी किसी काम का नहीं रहेगा।
जीवित रहने के लिए शाकाहारी प्राणी तो वनस्पति पर निर्भर ही हैं और माँसाहारी प्राणी भी जिन जन्तुओं को खाते हैं वे वनस्पति पर निर्भर हैं। विविध जीव एक-दूसरे के लिए भोजन श्रृंखला बनाते हैं - जैसे घास और वनस्पति को वन्य जीव खाते हैं और उन्हें शेर खाता है। परन्तु जब वन्य जीवों को मनुष्य खाने लगेगा और शेर का भोजन छिन जाएगा तो वह मनुष्य को खाएगा। इसलिए पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों तथा वनस्पति को जीवित रखकर भोजन श्रृंखला को बचाए रखना है। पेड़ों के अंधाधुंध कटान के साथ ही पेड़ों पर रहने वाले पक्षियों और कीट-पतंगों का संसार भी उजड़ रहा है। नीम, तुलसी, हल्दी, आँवला आदि के गुण हमारे गाँवों के लोगों को मालूम थे। वे चेचक के मरीज की खाट पर नीम की पत्तियाँ अनिवार्य रूप से रखते थे और मरते समय तक तुलसी की पत्तियाँ मुँह में डालते थे। गाँवों में घर के सामने नीम के अनेक पेड़ लगाए जाते थे; घर में तुलसी का पौधा तो रहता ही था। ये पौधे वायु में पाए जाने वाले जीवाणुओं और विषाणुओं को नष्ट करते हैं। पश्चिमी देशों के लोग कभी नीम, कभी हल्दी, आँवला, जामुन और कभी तुलसी का पेटेंट कराते रहते हैं जिससे हम इनसे औषधियाँ बनाने से वंचित रहें।
जैव विविधता मनुष्य की धरोहर ही नहीं बल्कि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संसाधन भी है क्योंकि अनेकानेक जंगली प्रजातियों के साथ संकरण करके अनाज की नए प्रकार की रोग-अवरोधी प्रजातियाँ उत्पन्न की जा सकती हैं। अफसोस की बात है कि पिछली कुछ दशाब्दियों में ही हमारी वे अन्न की प्रजातियाँ विलुप्त हो गई हैं जो उत्पादन भले ही कम देती थीं परन्तु उनमें रोग नहीं लगते थे। विदेशियों का कुचक्र चल रहा है। उन्होंने एक अद्भुत तरीका निकाला है जिससे वे विलुप्त हो रही प्रजातियों के “जीन्स” निकालकर जीन्स बैंक बना रहे हैं। वे जब चाहेंगे उन्हीं जीन्स की मदद से फिर से अपने देश में जानवर और अनाज की वही प्रजातियाँ उत्पन्न कर लेंगे। गरीब देश देखते रह जाएँगे।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि धरती पर जितने भी प्राणि और वनस्पति विद्यमान हैं सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं। जब हम लकड़ी ईंधन जलाते हैं तो वायुमंडल में धुआँ छोड़ते हैं और पेड़-पौधे इसे अपने भोजन के लिए प्रयोग करके बदले में प्राणवायु देते हैं। यदि पेड़-पौधे न हों तो मनुष्य के लिए साँस लेने को प्राणवायु नहीं बचेगी। जल में रहने वाली मछलियाँ और अन्य जीव जल को शुद्ध करते हैं परन्तु जल-प्रदूषण के कारण जब मछलियाँ मरने लगेंगी तो जल को शुद्ध कौन करेगा। वृक्ष हमें शुद्ध वायु, अच्छे फल, औषधियाँ, ईंधन तथा पशुओं का चारा प्रदान करते हैं; साथ ही उपजाऊ मिट्टी की परत को क्षरण से बचाते हैं, सूखी पत्तियों से उसे उपजाऊ शक्ति प्रदान करते हैं और वर्षा के प्रेरक बनते हैं।
जीव श्रृंखला में सभी का अपना महत्त्व है। इसलिए पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों तथा वनस्पति को भी जीवित रहने का उतना ही अधिकार है जितना हमें। भारत के लोगों ने कच्छप, शूकर, मछली और नरसिंह के रूप में भी परमात्मा के दर्शन किए थे। पूजा-अर्चना के लिए जब हम बैठते हैं तो फूल, दूब घास, कुश, चन्दन, तुलसीदल, बेलपत्र, आम के पत्ते, जल, फल आदि हमारे सामने होते हैं। इनके बिना तो पूजा-अर्चना ही सम्भव नहीं। हमें याद रखना होगा कि यदि हमारे व्यवहार के कारण जानवर और पशु विलुप्त हो सकते हैं तो स्वयं मनुष्य भी हो सकता है; हम भस्मासुर बन जाएँगे।
प्राकृतिक और मानवजनित आपदाएँ
केदारनाथ जैसी आपदाओं को निमंत्रण देता है मनुष्य
बाढ़ नियंत्रण के लिए मैदानी इलाकों में नदियों पर बाँध बनाने की बात कही जाती है परन्तु अस्थिर पहाड़ों पर टिहरी जैसे बड़े बाँध और जलाशय बनाकर बोझा बढ़ाना तर्कसंगत नहीं लगता। साथ ही जब ऐसे जलाशयों से पानी छोड़ना पड़ता है तो निचले भागों में बाढ़ और आपदा की आशंका बढ़ती है। दिल्ली में बाढ़ का कारण वर्षाजल नहीं था, हथिनी कुण्ड से छोड़ा गया पानी था। केदारनाथ घाटी में तबाही वर्षाजल से कम बल्कि अचानक वर्षा के कारण भूस्खलन से अधिक हुई। भूस्खलन के लिए मनुष्य की गतिविधियाँ बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। वैसे तो अनादि काल से नदी-घाटी सभ्यताएँ नदियों के किनारे शहर और गाँव बनाकर विकसित होती रही हैं लेकिन तब आबादी कम थी, मकान भारी-भरकम नहीं होते थे, धरती पर वनस्पति की चादर ढकी थी और मोटर गाड़ियों के न होने से पक्की सड़कों की जरूरत नहीं थी। अब पहाड़ों के ऊपर बहुमंजिला मकान बनने से एक तरफ तो वजन बढ़ा है तो निचले भागों में सड़क बनाने के लिए कटान करके पहाड़ी ढलान को अस्थिर बना दिया गया है। मकान और सड़क निर्माण की इस प्रक्रिया में निकला मलबा मैदानी भागों तक पहुँचकर नदियों को ही पाटता है और बाढ़ का कारण बनता है।
पहाड़ों पर से पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो रहा है और सुन्दरलाल बहुगुणा जी का चिपको आन्दोलन लोग भूल चुके हैं। वनस्पति के अभाव में पानी तेजी से बहता है जिससे पहाड़ों पर मिट्टी का कटान बढ़ गया है। सड़कों का मार्ग यदि भूवैज्ञानिकों और इंजीनियरों की सलाह से न किया गया तो भूस्खलन होते रहेंगे। कुछ स्थानों पर सड़कें प्रायः टूटती ही रहती हैं क्योंकि वहाँ की भूरचना कमजोर होती है। जहाँ पर परतदार और कमजोर चट्टानें हैं वहाँ यदि जल निकास वैज्ञानिक ढंग से न हुआ तो भी भूस्खलन हो सकता है।
धनी लोगों की बड़ी गाड़ियाँ देवभूमि पर आसानी से चली जाएँ इसलिए कुमाऊँ और गढ़वाल के पहाड़ों पर काफी छेड़छाड़ की गई है। एक सज्जन कह रहे थे - “अब तो बद्रीनाथ के दरवाजे तक गाड़ी चली जाती है।” उन्हें कौन बताए - यह वरदान नहीं, अभिशाप है। विकास कार्य करते समय यदि मैदान और पहाड़ की जमीन की स्थिरता के अन्तर को ध्यान में न रखा गया तो वही होगा जो हो रहा है। अपनी परम्परा के अनुसार धार्मिक पर्यटन या तो पैदल होना चाहिए नहीं तो छोटे सार्वजनिक वाहनों से। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि विकास का मैदानी मॉडल यदि पहाड़ों पर थोपा जाता रहा तो हिमालय एक दिन रेगिस्तान बन जाएगा। कहना कठिन है कि जो लाखों लोग अपनी गाड़ियाँ लेकर छोटे-छोटे बच्चों के साथ देवभूमि में देवस्थानों को जाते हैं उनमें कितने आस्थावान श्रद्धालु होते हैं और कितने केवल भ्रमण के लिए जाते हैं। जो लोग केवल भ्रमण के लिए जाते हैं उन्हें सोचना चाहिए कि ऐसे दुर्गम स्थानों पर बच्चों को ले जाने का औचित्य क्या है। यह सच है कि संख्या के कारण आपदा नहीं आई परन्तु संख्या कम होने से आपदा प्रबंधन सरल हो सकता था। नेपाल और उत्तरी बिहार के इलाकों को भूकम्प ने झकझोर दिया है, त्राहि-त्राहि मची है। सारा देश दहशत में जी रहा है तो मन में आना स्वाभाविक है कि क्या हमारा समाज, देश या दुनिया कुछ नहीं कर सकती? कड़वी सच्चाई यह है कि जो कुछ करेगा भूकम्प करेगा, हम उसका कुछ नहीं कर सकते। विज्ञान की मदद से हम अपना बचाव कर सकते हैं। पुराने समय में यह भी सम्भव नहीं था।
विज्ञान ने यह जानकारी उपलब्ध कराई है कि किन स्थानों पर भूकम्प और ज्वालामुखी आने की अधिक सम्भावना है - उसी प्रकार जैसे हमें पता हो शेर की माँद कहाँ है। इस जानकारी के आधार पर हम शेर की माँद से दूर रहेंगे और यदि पास जाना बेहद जरूरी होगा तो पूरी सावधानी और तैयारी के साथ जाएँगे। जिन देशों को भूकम्प और ज्वालामुखी का प्रायः सामना करना पड़ता है उन्होंने यह सावधानी बरती है।
क्या कारण है कि हमारा विज्ञान यह तो बता पाता है कि भूकम्प की सम्भावना कहाँ अधिक है और कहाँ कम, लेकिन यह नहीं बता पाता कि भूचाल कब आएगा? गाँव की भाषा में कहें तो यदि एक मैदान में जलते चूल्हों पर सैकड़ों पतीलियाँ चढ़ी हों जिनमें पानी हो और जिन पर ढक्कन रखा हो - यह बताना तो सम्भव हो सकता है कि किस पतीली के ढक्कन को भाप अस्थिर कर रही है परन्तु यह नहीं कि कौन सा ढक्कन कब भाप द्वारा उठा दिया जाएगा। दुनिया के जिन भागों में प्रायः भूकम्प और ज्वालामुखी की घटनाएँ होती रहती हैं उनमें प्रशान्त महासागर के तटीय भागों में बसे देश प्रमुख हैं। जापान, चीन, इण्डोनेशिया हमारे पूर्व में और अमेरिका, मेक्सिको, ब्राज़ील, चिली आदि हमारे पश्चिम में। इसके अलावा भारतीय भूभाग के उत्तर में म्यानमार से चलकर हिमालय श्रृंखला यूरोप के आल्प्स पर्वत में मिलती है और एक अस्थिर बेल्ट बनाती है।
भारत को स्थिरता के हिसाब से तीन भागों में बाँट सकते हैं - पहला तो दक्षिण का पठारी भाग जो मजबूत और स्थिर है; दूसरा उत्तर में हिमालय जो निरन्तर अस्थिर है और जिस भाग में नेपाल पड़ता है। इन दोनों के बीच में गंगा-यमुना का मैदान है जिसके नीचे हजारों फीट गहरी बालू है। अब यदि बड़े बाँध बनाने हों या नए शहर बसाने हों तो स्थिर भागों का ही चुनाव करना होगा। आजादी के बाद जब पंजाब के उत्तरी भाग में भाखड़ा नांगल बाँध का निर्माण कराया गया तब इतनी जानकारी नहीं थी कि यह अस्थिर क्षेत्र है; अन्यथा वैकल्पिक स्थान खोजा गया होता। दुर्भाग्यवश हमारे देश में अनेक बार राजनेताओं की जिद, अहंकार और स्वार्थ इतना हावी हो जाता है कि भूवैज्ञानिक सोच गौण हो जाती है। टिहरी बाँध का विवाद ऐसी ही सोचों के टकराव का परिणाम है।
प्रधानमंत्री मोदी की योजना है अनेक स्मार्ट शहर बसाना। तब राजनीति से ऊपर उठकर भूगर्भ की जानकारी को ध्यान में रखते हुए योजनाएँ बनानी होंगी। कभी-कभी स्थिर भागों में भी परियोजनाएँ भूगर्भीय कारणों से प्रभावित हो जाती हैं जैसे महाराष्ट्र के कोयनानगर बाँध के साथ 1968 में हुआ था। कुछ लोगों का मानना है कि कोयनानगर भूकम्प आया ही कोयना बाँध के कारण, परन्तु यह प्रमाणित नहीं है। फिर भी यदि छोटे बाँधों और जलाशयों से काम चल सके तो बड़े बाँध न बनाए जाएँ और अस्थिर पर्वतीय क्षेत्रों में तो कतई नहीं। यदि अस्थिर भागों में बड़ी इमारतें बनानी ही हों तो हल्की भवन सामग्री का प्रयोग करना होगा। जापान में लकड़ी के मकान बनाते हैं परन्तु हमारे यहाँ तो जंगल कटने से लकड़ी की भी कमी है। भूकम्प से निपटने के लिए अलग डिजाइन के मकान बनाने होते हैं; हमारे पूर्वजों को यह ज्ञान था। वे ऐसी तकनीक का प्रयोग करते थे जिससे बनी इमारत में जोड़ होते थे जो शॉक अब्जॉर्बर का काम करते थे। दुनिया के विकसित देशों ने भूगर्भ की विस्तृत जानकारी हासिल की है और भूकम्प से निपटने के उपाय खोजे हैं। भवन निर्माण सामग्री, कमजोर इलाकों के लिए भवन डिजाइन, और कभी-कभी भूकम्प का पूर्वानुमान - यह सब मानव जाति के हित में उन्हें विकासशील देशों के साथ बाँटना चाहिए। भारतीय सोच को मानते हुए “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से ज्ञान बाँटना ही मानव जाति की रक्षा कर सकेगा। यदि पेटेंट कानून बनाकर ज्ञान छुपाते रहेंगे तो अमेरिका, चीन, यूरोप और रूस के भी पर्यटक नेपाल में मरते रहेंगे।