जल्लीकट्टू प्रथा बन्द करने की वजह क्या है, स्पष्ट नहीं

जल्लीकट्टू प्रथा बन्द करने की वजह क्या है, स्पष्ट नहींजलीकट्टू की परम्परा दो हजार साल से भी पुरानी है। इसमें सांड़ को हम्प यानी कूबड़ पकड़ कर काबू में लेना होता है।

जल्लीकट्टू परम्परा एक खेल प्रतियोगिता होती है पोंगल त्योहार के बाद जिसमें दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु के लोग सांड़ को नन्दी के रूप में पूजते हैं, खिला-पिलाकर बलिष्ट बनाते हैं और फिर स्पर्धा के लिए मैदान में उतारते हैं। दूसरे तमाम उत्सवों की भांति इसमें अनेक विकृतियां आ गई हैं जैसे जल्लीकट्टू को शराब पिलाना, लाल कपड़ा दिखाना, मिर्च डालना या फिर पूंछ मरोड़ना आदि जिससे वह उत्तेजित हो जाए। इस प्रथा के खिलाफ़ पशु अधिकार संगठन ने उच्चतम अदालत से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया है इसलिए मद्रास के मरीना बीच पर पिछले चार दिन से आन्दोलन हो रहा है।

स्थगन आदेश के बाद अन्तिम निर्णय आना बाकी है जो केन्द्र सरकार के अनुरोध पर एक सप्ताह के लिए रोक दिया है अदालत ने। निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि स्थगन किस आधार पर मिला है, हिंसा, क्रूरता, जीव हानि या मनुष्यों को खतरा। इस आयोजन का उद्देश्य होता है सांड़ को काबू में करना और यदि काबू हो गया तो उसे खेती के काम में लगा देते हैं और वह नन्दी का रूप नहीं रहता। यदि हमारी अदालतें पशु अधिकारों के प्रति संवेदनशील हो जाएं तो विषय अनेक हैं।

जलीकट्टू की परम्परा दो हजार साल से भी पुरानी है। इसमें सांड़ को हम्प यानी कूबड़ पकड़ कर काबू में लेना होता है। उसकी सींग, मूंछ या गर्दन नहीं पकड़ सकते वर्ना नियम विरुद्ध होगा। यह स्पोर्ट पौरुष दिखाने के लिए होता है। मनुष्य का और बैल का भी पौरुष। यदि बैल जीता तो उसे बच्चे पैदा करने के लिए गायों के पीछे छोड़ा जाएगा अन्यथा नहीं। बैल पर सवारी करके सींग पर लगा झंडा हटाना ही मनुष्य के लिए चुनौती होती है। जीतने वाले को इनाम भी दिया जाता है।

हमारे देश में जानवरों के प्रति हिंसा और क्रूरता हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धर्मो में देखने को मिलतीं है। मुस्लिम समाज जानवरों की कुर्बानी स्वीकार हो इसलिए उन्हें ज़िबा करता है यानी पहले थोड़ा गला काट दिया जाता है और जब सारा खून शरीर से निकल जाए तब पूरा गला काटते हैं। इसके विपरीत सिख समुदाय में जानवर का गला एक झटके में काट दिया जाता है और इसे झटका गोश्त कहते हैं। मुस्लिम लोग झटका गोश्त नहीं खाते और सिख हलाल नहीं खाते। हिंसा तो दोनों ही हैं।

बोझा और सवारियां ढोने के लिए याक, घोड़े, ऊंट, बैल आदि का प्रयोग हमेशा से होता रहा है और अब भी होता है। सरकस में जानवरों पर अत्याचार होते हैं और गाँवों में भालू तथा बन्दर के नाच कराए जाते हैं। पहले तो बैलों से खेती के सभी काम होते थे लेकिन मशीनों ने उनका कुछ काम हल्का कर दिया है।

अपने शरीर को कष्ट देने की परम्परा बहुत पुरानी है। हठयोगी अपने शरीर को तरह तरह से कष्ट देते हैं। लेकिन सबसे अधिक पीड़ादायक दृश्य होता है जब मुस्लिम समाज के लोग मातम मनाते हैं, सीना पीटते हुए शरीर पर छुरी तलवार से घाव करते हैं और आग पर चलते हैं। इसके विपरीत जल्लीकट्टू उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है और सांड़ को काबू करते समय कितने ही लोगों की जान जाती है। फिर भी मद्रास के मरीना बीच पर जो लाखों की भीड़ इकट्ठी हुई है उसमें युवा पीढ़ी के लोग बहुतायत में हैं जो दकियानूसी विचारों का विरोध करते हैं।

तमिलनाडु सरकार के एक अध्यादेश के मसौदे को केन्द्र सरकार और तमिलनाडु के राज्यपाल विद्यासागर राव की मंजूरी के बाद रविवार को पूरे तमिलनाडु में जल्लीकट्टू का आयोजन किया जाएगा। पर यदि जल्लीकट्टू का विरोध हिंसा और क्रूरता के कारण हो रहा था तो यह सब भी बन्द होना चाहिए।

sbmisra@gaonconnection.com

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