उत्पादों पर लेबल का खेल

उत्पादों पर लेबल का खेलखाद्य पदार्थों पर लेबल का खेल ।

भोपाल में एक बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर पर विदेशी उत्पादों से लदा एक स्टैंड देखते ही आयात होने वाली चॉकलेट और डेयरी प्रोडक्ट्स के पैकेट्स पर नज़र गई। सारे पैकेट्स पर वहां की स्थानीय भाषा में लेबल प्रदर्शित था। यानी विदेशी स्थानीय भाषाओं से लिखे लेबल्स वाले प्रोडक्ट्स भारतीय बाजार में धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर अरब देशों से आने वाली चॉकलेट पर ऊर्दू या अरबियन भाषा में जानकारियां लिखी हुई थी। ऐसे उत्पादों को खरीदते समय ग्राहक किसी भी सूरत में उत्पाद के पदार्थों और अन्य जानकारियों को समझ नहीं पाता है। इंडोनेशिया जैसे देश के एफडीए ने तो ऐसे उत्पादों को पूरी तरह से गैरकानूनी माना है और कानून के अनुसार इंडोनेशिया में बिकने वाले किसी भी पैकेज्ड फूड पर इंडोनेशिया की स्थानीय भाषा में ही जानकारी होना अनिवार्य है।

खाद्य पदार्थों पर दिए गए लेबल्स को देखकर हमें जानकारी मिलती है कि पदार्थ की क्या खूबियां हैं या गुणवत्ता कैसी है। लेबल को पढ़ा जाना ही मुश्किल हो जाए तो ऐसे में बाकी जानकारियों की बात ही करना बेमानी सा है। हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं में लिखे उत्पादों को समझ पाना आसान है। लेबल पर लिखे दावों की भी अपनी अलग कहानी है। प्रतिस्पर्धा के दौर में हर कम्पनी अपने उत्पादों को दूसरी कम्पनी के उत्पादों से बेहतर बताने की कोशिश में रहती है और इस कोशिश में प्रोडक्ट्स के लेबल महत्वपूर्ण रोल निभाते हैं।

खाद्य पदार्थों पर लेबल के संदर्भ में दो पहलू हैं एक तो यह कि लेबल पर सही जानकारियों को लिखकर उत्पाद के गुणों को कम शब्दों के जरिए लोगों तक पहुंचाने में मदद मिलती है वहीं दूसरा पहलू यह है कि कंपनियों को अपने उत्पादों को बाजार में ज्यादा से ज्यादा मात्रा में बेचने के लिए लेबल के तौर पर नए तरह के औजार मिल गए हैं। हिन्दुस्तान में उत्पादों पर लगने वाले लेबल या दावों को मुख्यतौर पर खाद्य अपमिश्रण अधिनियम- 1954 (प्रिवेन्शन ओफ फूड एडल्ट्रेशन) के तहत निगरानी में रखा जाता है।

इस अधिनियम के तहत मुख्यतौर पर उत्पादों के लेबल पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है जबकि उत्पाद के स्वास्थ्य और पोषक गुणों पर उतना गौर नहीं फरमाया जाता है। हलांकि इस अधिनियम में तार्किक परिवर्तन करके पैकेजिंग और लेबलिंग को खाद्य अपमिश्रण अधिनियम के सातवें हिस्से में तय किया गया कि उत्पादों की सामान्य जानकारी के अलावा इसके स्वास्थ्य और पोषक गुणों की जानकारी लेबल पर देना अनिवार्य किया गया है।

सन 2006 में पारित फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट (FSSA) के तहत भी इस तरह की जानकारियों को विधिवत उत्पाद के पैकेट पर देना अनिवार्य किया गया है। FSSA के चौथे अध्याय के 23वें पैराग्राफ पर स्पष्ट तरीके से लिखा गया है कि कोई भी व्यक्ति या कंपनी किसी भी खाद्य उत्पाद को बाजार में व्यापार करते हुए बेचती है तो उन्हें लेबल पर खाद्य सुरक्षा के हिसाब से उत्पाद की गुणवत्ता के हिसाब से सारी जानकारियों को लिखा जाना जरूरी है अन्यथा इसका पालन नहीं करना एक अपराध की श्रेणी में आता है।

नेचुरल और हेल्थी जैसी शब्दों का इस्तेमाल कर उपभोक्ताओं को बेवकूफ बनाने का सिलसिला आज भी जारी है जबकि अब तक किसी को भी इन शब्दों की सही परिभाषा या अर्थ पता ही नहीं। इस तरह के शब्दों अथवा लेबल को तुरंत नकारा जाना जरूरी है। यदि एक उत्पाद नेचुरल है या पूर्णरूपेण प्राकृतिक तो इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि उत्पाद में किसी भी तरह की धातु या अप्राकृतिक वस्तुओं की जरा भी मिलावट नहीं।

प्राकृतिक पदार्थों से उत्पाद को जरूर बनाया जा सकता है लेकिन दावा देकर इसे शत प्रतिशत प्राकृतिक कहना जल्दबाज़ी होगी। ध्यान रहे कि पदार्थ के उत्पादन के दौरान उसे पल्वेराईजर, पाश्चरायजर या होमोजिनायज़र जैसे मशीनी प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है और इन प्रक्रियाओं के दौरान उत्पाद में अन्य बाहरी पदार्थों की मिलने की जबरदस्त गुंजाइश होती है और उस स्थिति में उत्पाद को पूर्णरूपेण प्राकृतिक कहना कितना सही होगा?

इसी तरह उत्पादों के लेबल पर हेल्थी शब्द का इस्तमाल करना भी संशय पैदा करता है। हेल्दी और नेचुरल होने के दावों के साथ उत्पादों का बाजार में बिकना कई मायनों में गम्भीर मुद्दा है। खाद्य उत्पादों के पैकेट्स पर इस बात का जिक्र होना जरूरी है इनमें सम्मिलित पदार्थों के स्रोत कितने प्राकृतिक हैं?

(लेखक गाँव कनेक्शन के कंसल्टिंग एडिटर और हर्बल जानकार व वैज्ञानिक है।)

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