मेघालय के खदान में फंसे मजदूर : ऐसी घटना जो टीआरपी नहीं बन पायी

पिछले पंद्रह दिनों की ख़बरों की पड़ताल कीजिए आपको पता चल जाएगा, न्यूज़ चैनल से लेकर, ट्वीटर, फ़ेसबुक और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर सिर्फ़ और सिर्फ़ सबरी माला छाया रहा। औरतों का मंदिर में जाने का मुद्दा, एक राजनीतिक दल का समर्थन तो दूसरे दलों का विरोध, मीलों लम्बी लाइन यही सब सुर्ख़ियां बटोरती रही हैं।

मेघालय के खदान में फंसे मजदूर : ऐसी घटना जो टीआरपी नहीं बन पायी

हम उस क़ौम से ताल्लुक़ रखते हैं, जो अपना फ़ायदा देख हुई मौतों का मातम मनाती हैं! शायद आप राज़ी न हों इससे मगर हक़ीक़त यही है। कहीं दूर जाने की भी दरकार नहीं है। अपने आस-पास नज़र घुमाइए और बताइए, कितने न्यूज़ चैनल या सोशल मीडिया के धुरंधरों ने मेघालय के खदानों में फंसें मज़दूरों (जो अब शायद ही ज़िंदा हों) लिए आवाज़ बुलंद किया? कितने लोगों ने इसके लिए कुछ लिखा या किसी इंटव्यू में कुछ कहा?

पिछले पंद्रह दिनों की ख़बरों की पड़ताल कीजिए आपको पता चल जाएगा, न्यूज़ चैनल से लेकर, ट्वीटर, फ़ेसबुक और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर सिर्फ़ और सिर्फ़ सबरी माला छाया रहा। औरतों का मंदिर में जाने का मुद्दा, एक राजनीतिक दल का समर्थन तो दूसरे दलों का विरोध, मीलों लम्बी लाइन यही सब सुर्ख़ियां बटोरती रही हैं।

न, न मुझे इन सुर्ख़ियो से शिकायत नहीं है। बननी ही चाहिए थी। आख़िर मंदिर जाना किसी के जान से चले जाने से बड़ी बात है। हमारे देश में धर्म और आस्था से बड़ी कोई भी चीज़ है क्या?

और फिर ऊपर से मरने वाले वो लोग हों जिनके जीने या मर जाने से हमारे सभ्य समाज को कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता हो.

इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक आर्टिकल की मानें तो, मोहम्मद शाहिर जो 33 साल के थे, (क्योंकि 15 दिन से ज़्यादा हो गए खदान को पानी से भरे) उन्होंने आख़िरी बार अपनी पत्नी को 12 दिसम्बर को कॉल की थी। उस आख़िरी कॉल में उन्होंने कहा कि वो जल्दी ही वापस आएंगे। फ़िलहाल वो कल-परसों में तीस हज़ार रुपए भेज देंगे। इस वक़्त वो 'Rat hole' एक संकरे से रास्ते से खदान में उतरने वाले हैं। उसके बाद आज तक उनकी कोई ख़बर नहीं आइ है उनकी पत्नी के पास।

ठीक ऐसे ही बीस साल की ओभिजान के पति ने आख़िरी बार 12 दिसम्बर को ही कॉल किया। तब से वो भी लापता हैं। और सिर्फ़ यही दो लोग नहीं आँकड़ों की माने तो पंद्रह लोग लापता हैं।

जानते हैं क्या कॉमन है इन पंद्रह लोगों में। ये उस तबके से सम्बंध रखते हैं जिन्हें दो वक़्त की रोटी के लिए हर दिन सोचना पड़ता है। ये वो लोग हैं जिनके पास न तो ज़मीन है खेती के लिए और न नौकरी। ऐसे में ये करे तो क्या करें। क्या रास्ता है इनके पास।


इसका जवाब तो सरकारों के पास भी नहीं है। ऐसे में ये बेचारे अपना और अपनों का पेट भरने के लिए इन रैट-होल के ज़रिए खदानों में उतर कर कोयला निकालते हैं, जिनके लिए इनको लगभग दिन के सौ से डेढ़ सौ रुपए मिलते हैं। ख़ैर, ये तो इनकी मजबूरी हुई जिसकी वजह से ये अपनी जान को ख़तरे में डाल उन खदानों में उतरते हैं। अब ज़रा ये सोचिए कि आख़िर ऐसी क्या वजह है कि मीडिया और राजनीतिक पार्टियां इसके बारे में चुप हैं?

याद है आपको पिछले साल जून में थाईलैंड की स्कूल-फूटबॉल टीम एक गुफा में घूमने गयी थी। जो अचानक आयी बाढ़ की वजह से वहाँ फँस गयी थी।

तब ग़ौर कीजिएगा, हमारे अपने देश भारत ने Kirloskar pumps भेजे थे और इस बात की सराहना भी हुई। मगर वही फुर्ति और वही एफ़र्ट्स उन पंद्रह मज़दूरों के लिए क्यों नहीं दिखाई गयी? क्यों नहीं जैसे ही पता चला कि मज़दूर फँसे हैं तो तुरंत उन्हीं Kirloskar पम्प्स को बुलाया गया? क्यों नहीं मीडिया ने ब्रेकिंग न्यूज़ में इसे चलाया? क्यों ये ट्रेंडिंग टॉपिक नहीं बना हैशटैग के साथ?

क्योंकि मेघालय के जितने भी खदान मालिक हैं, उनमें से अधिकतर अभी एमएलए हैं। तो ऐसे में खदान मालिकों के इस लापरवाही के ख़िलाफ़ आवाज़ कौन उठाएगा. पानी में रह कर भला मगरमच्छ से बैर कौन लेना चाहेगा. नहीं!

ऊपर से इन मज़दूरों की बात करके टीआरपी नहीं मिलेगी। जितनी टीआरपी मंदिर, स्त्री, शुद्धीकरण और पिरीयड पर बात करने से मिलेगी। वैसे एक और दिलचस्प बात तो रह ही गयी। नेशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल ने जहां 2014 में ही मेघालय के इन खदानों को बंद कर देने का आदेश दे दिया था, देखिए रैट-होल के ज़रिए कोयला निकालने का काम अब भी बदस्तूर जारी ही है। और तो और पिछले ही दिनों शिलोंग के एमपी विन्सेंट पाला ने शून्य-काल में इन अवैध रैट-होल को क़ानूनी रूप से मान्य कर देने माँग की।

अब बताइए आप कहेंगे इसे? बेशर्मी ही न! आख़िर में एक और बात जोड़ना चाहूंगी, कि सिर्फ़ 12 दिसम्बर 2018 को ही नहीं पंद्रह मज़दूर लापता हुए हैं। इसके पहले भी 1992 में तीस लोग फँसे थे गारो की पहाड़ियों में, जिनमें से आधे से अधिक मज़दूर आज तक लापता हैं। 2012 में भी ऐसी एक घटना घटी जिसमें पंद्रह और मज़दूर फँस कर मर गये थे।

और ये मौत का खेल आगे भी जारी रहेगा। क्योंकि ग़रीबों की मसीहाई करने वाला कोई भी नहीं है यहां मेघालय और उसके नज़दीक के गाँव से बेरोज़गार अपनी क़िस्मत को आज़माने के लिए आते रहेंगे। ज़िंदगी हर रोज़ मौत के कुएं में अपना करतब दिखाती रहेगी।

(ये लेखिका के अपने निजी विचार हैं)

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