दवाई और इलाज में गाँवों का दोयम दर्जा कब तक

दवाई और इलाज में गाँवों का दोयम दर्जा कब तकसरकार ने भले ही गाँवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोले हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर खुद बीमार हैं।

उत्तर प्रदेश में चुनाव का बिगुल बज चुका है और सभी दलों ने गरीबों का रहनुमा होने का एेलान कर दिया है। यह एेलान तो इन्दिरा गांधी के जमाने से हो रहा है जब 1971 में उन्होंने ‘‘गरीबी हटाओ'' का नारा बुलन्द किया था। आधी शताब्दी बीतने के बाद भी गाँवों में मूलभूत सुविधाएं रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और दवाई की व्यवस्था आधी अधूरी है। दवाई के मामले में गाँव के लोग या तो झाड़-फूंक या झोलाछाप डॉक्टर अथवा शहरी व्यवस्था के मोहताज हैं। समस्या के निदान के वादे चुनाव के समय हर बार होते हैं लेकिन समस्या जस की तस रहती है।

गाँवों में देश की 70 प्रतिशत आबादी रहती है लेकिन देश के केवल 26 प्रतिशत डॉक्टर वहां तैनात हैं। इसके विपरीत 30 प्रतिशत आबादी के साथ शहरों में 74 प्रतिशत डॉक्टर उपलब्ध हैं। गाँवों में नर्सों और अन्य स्टॉफ की हालत भी कोई बेहतर नहीं है। शहरों में 20,000 की आबादी पर जहां 12 डाक्टरों का औसत है वहीं गाँवों में इतनी ही आबादी के लिए तीन डॉक्टर हैं।

गाँवों में देश की 70 प्रतिशत आबादी रहती है लेकिन देश के केवल 26 प्रतिशत डॉक्टर वहां तैनात हैं। इसके विपरीत 30 प्रतिशत आबादी के साथ शहरों में 74 प्रतिशत डॉक्टर उपलब्ध हैं। गाँवों में नर्सों और अन्य स्टॉफ की हालत भी कोई बेहतर नहीं है। शहरों में 20,000 की आबादी पर जहां 12 डाक्टरों का औसत है वहीं गाँवों में इतनी ही आबादी के लिए तीन डॉक्टरों का। गाँव से आए मरीज़ों और उनके तीमारदारों की शहर के अस्पतालों में चीख पुकार बराबर सुनी जा सकती है। मेडिकल इंश्योरेंस या बैंक ऋण का लाभ नहीं उठा पाते तो कई बार रोटी-रोजी का साधन जमीन बेचनी पड़ती है।

शहरों में बुजुर्ग और बच्चों के लिए अलग विभाग होते हैं जबकि ग्रामीण बुजुर्गों की वृद्धावस्था पेंशन से भरण-पोषण के बाद दवाई इलाज के लिए पैसे नहीं बचते। बीमार होने पर किसी तरह पैसा इकट्ठा भी कर लें तो दूर-दूर तक अस्पताल नहीं। यदि संयुक्त परिवार है तो कोई उन्हें कस्बे या शहर तक इलाज के लिए पहुंचा देगा अन्यथा उन्हें मज़बूर होकर ऐसे लोगों से इलाज कराना पड़ता है जिन्हें झोलाछाप डॉक्टर कहा जाता है। यदि अंग्रेजी डॉक्टर देश की 70 प्रतिशत आबादी के बीच जाकर उनकी सेवा नहीं करना चाहते तो किस काम के ऐसे मेडिकल कालेज, अस्पताल, डॉक्टर और दवाएं।

गाँव का आदमी मरीज़ को लेकर मीलों पैदल या ठेला अथवा चारपाई पर, यदि सम्भव हुआ तो सार्वजनिक वाहन से शहर पहुंचता है। कई बार तो झाड़-फूंक में काफी समय बीत जाता हैं और शहर पहुंचने तक बहुत देर हो चुकती है। आजकल प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज गाँवों में खुल रहे हैं तो मेडिकल कालेज खोलने की भी अनुमति प्रदान की जानी चाहिए। ऐसे कालेजों से निकले डाक्टरों पर गाँवों में ही काम करने की बाध्यता हो परन्तु उनके रहने और काम करने की बेहतर सुविधाएं हों।

सरकार ने भले ही गाँवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोले हैं जिनकी हालत सरकारी प्राथमिक स्कूलों से बेहतर नहीं है। फिर भी गाँववालों को अपने इलाज के लिए इन्हीं प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों की नर्सों और दाइयों पर निर्भर रहना पड़ता है। एमबीबीएस डिग्री हासिल कर रहे डाक्टर तो गाँवों को जाने के इच्छुक नहीं। कुछ जाने-माने लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि अंग्रेजी डॉक्टरों को देहात भेजना ही नहीं चाहिए बल्कि आयुर्वेदिक और होम्योपैथी डाक्टरों को एलोपैथी दवाइयां देने का लाइसेंस दे दिया जाना चाहिए। सोचने की बात है कि आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक पद्धतियों में यह नहीं पढ़ाया जाता कि कौन सी अंग्रेजी दवाएं एक साथ दी जा सकती हैं और कौन सी रिएक्शन कर जाएंगी।

यदि गाँवों के लिए और कुछ नहीं कर सकते तो एलोपैथी, आयुर्वेद और होमोपैथी का बंटवारा समाप्त करके ऐसे डॉक्टर तैयार करें जो गाँवों में काम करने के इच्छुक हों। डॉक्टरों में गाँव और शहर के कैडर बना दिए जाएं जिनमें गाँव में काम करने वालों का वेतन अधिक हो और सुविधाएं भी अधिक हों। अनेक डॉक्टर पैसे के लालच में विदेशों में जाकर नौकरी करते हैं। यह सब देश हित में नहीं है।

यदि गाँवों के लिए और कुछ नहीं कर सकते तो एलोपैथी, आयुर्वेद और होमोपैथी का बंटवारा समाप्त करके ऐसे डॉक्टर तैयार करें जो गाँवों में काम करने के इच्छुक हों। डॉक्टरों में गाँव और शहर के कैडर बना दिए जाएं जिनमें गाँव में काम करने वालों का वेतन अधिक हो और सुविधाएं भी अधिक हों। अनेक डॉक्टर पैसे के लालच में विदेशों में जाकर नौकरी करते हैं। यह सब देश हित में नहीं है। दुर्भाग्यवश हमारी सरकारें प्रशिक्षित डॉक्टरों को देहात भेज नहीं पा रही और देहात की पुरानी पद्धतियों को विकसित करने के लिए कुछ कर भी नहीं रहीं।

किसी से छुपा नहीं है कि देश में मेडिकल कालेजों की कमी है, डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं, बजट की कमी है यानी गाँवों में डॉक्टरों के रहने और काम करने का खराब वातावरण है, उनके बच्वों के लिए अच्छे स्कूलों की कमी है और प्राइवेट प्रैक्टिस से उन्हें शहरों की अपेक्षा कम आमदनी है। डॉक्टरों को विदेश जाने से बचाने की जरूरत है दूसरे देशों में नौकरी करने से, दूसरे व्यवसाय में जाने से। जब तक विशेष आकर्षण नहीं होगा, गाँवों को डॉक्टर स्वतः नहीं जाएंगे और जब तक अच्छे डाक्टर वहां जाएंगे नहीं, गाँवों को दोयम दर्जे का इलाज मिलता रहेगा।

sbmisra@gaonconnection.com

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