प्रजातंत्र में सरकार हर जगह मौजूद है लेकिन दिखाई नहीं देती भगवान की तरह

कोई भी सरकार उसे चलाने वाले व्यक्तियों से जानी जाती है और चौधरी चरण सिंह कहा करते थे ''वोट पार्टी को नहीं उम्मीदवारों को देख कर दो"

प्रजातंत्र में सरकार हर जगह मौजूद है लेकिन दिखाई नहीं देती भगवान की तरह

बात 1976 की है जब इन्दिरा जी ने देश में आपातकाल लगाया हुआ था और सभी लोग दहशत में थे। मैं मध्य प्रदेश के भौमिकी एवं खनिकर्म विभाग में भूवैज्ञानिक के रूप में काम करता था और मैं रीवा में पोस्टेड था। मेरा एक चपरासी था मुन्नालाल जिसने एक दिन ब़ड़े सरल ढंग से पूछा ''साहब, सरकार कहां रहती हैं" ।

मैं इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था। शायद वह सोचता था रानी विक्टोरिया अथवा क्वीन एलिजाबेथ की तरह हमारी सरकार का कोई घर होगा। यह तो उसने नहीं बताया कि वह फ़रियाद लेकर जाना चाहता था या यूंही पूछ रहा था। लेकिन उसने मेरे लिए उलझन पैदा कर दी कि इसे कैसे समझाऊं कि सरकार कहां रहती है। मैने उसे बताया कि कि सरकार कोई इंसान नहीं है, व्यवस्था है। मैंने कहा तुम जो एमएलए और एमपी चुनकर भेजते हो वे सब भोपाल और दिल्ली में रहते हैं और हुकूमत करते हैं । मैं उसे समझाने में कामयाब नहीं रहा।

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साभार: इंटरनेट

इतने साल बीत गए लेकिन मेरे पास मुन्नालाल के सवाल का सटीक जवाब नहीं है। जब याद आ जाती है तो बस मुस्कुरा देता हूं। मैं जानता हूं कि प्रजातंत्र में विभिन्न विभागों के अधिकारियों और कार्यरत कर्मचारियों के माध्यम से सरकार सर्वत्र मौजूद है लेकिन दिखाई नहीं देती भगवान की तरह। जब किसान को अनाज बेचना हेता है, पीड़ित को थाने में रिपोर्ट लिखानी होती है, मरते हुए मरीज को दवाई चाहिए होती है, मास्टर या सिपाही की नौकरी के लिए रिश्वत जुटानी होती है, भूख से तड़पते गांव वाले को राशन चाहिए होता है अथवा रोटी, कपड़ा और मकान की तलाश में भटकना पड़ता है तो भगवान तो फ़रिश्ता भेज सकता है लेकिन सरकार?। जब किसान की जमीन पर भूमाफिया कब्जा कर लेते हैं और सुनवाई की दरकार होती है, लूट, खसोट, यौन उत्पीड़न से पीड़ितों को मदद की जरूरत होती है तो फ़रियाद की चाह में वे भी मुन्नालाल वाला सवाल दुहराते होंगे।

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प्रजातंत्र में सरकार व्यक्तियों से बनती है और उन्हीं से सरकार की पहचान होती है । सात साल का मेरा पोता शिवांश तीन साल पहले जब प्रधानमंत्री मोदी को टीवी स्क्रीन पर देखता था और किसी ने पूछा यह कौन हैं तो उसका तुरन्त उत्तर होता था ''मोदी सरकार" । सच ही तो है कोई भी सरकार उसे चलाने वाले व्यक्तियों से जानी जाती है और चौधरी चरण सिंह कहा करते थे ''वोट पार्टी को नहीं उम्मीदवारों को देख कर दो" ।

आज सरकारें चलाने वालों के पूर्व निर्धारित सिद्धान्त और नीतियां नहीं हैं, जिसके पास समर्थकों का झुंड बड़ा है वहीं सरकार चलाएगा, जैसे कर्नाटक में हुआ है। यदि झुंड में से दो चार लोग इधर से उधर हो जाएं तो सरकार इधर से उधर हो गई। इस भीड़तंत्र में कौन बताएगा सरकार रहती कहां हैं।

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यदि हम मान भी लें सरकार हमारे एमपी और एमएलए लोगों में निहित हैं तो वे अपने चुनाव क्षेत्रों में कम ही दिखाई देते हैं और यदि मानें कि सरकार कर्मचारियों और अधिकारियों में रहती हैं तो उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं। यह कहा जा सकता है कि शासन-प्रशासन का विधानसम्मत तंत्र ही सरकार है और जब भी यह तंत्र मुस्तैदी से काम करता नहीं दिखेगा, हम मुन्नालाल की तरह सरकार ढूंढते रहेंगे।

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