आरक्षण से प्रतिस्पर्धा शक्ति होती है कुंठित, स्वाभिमान पर भी उठते हैं सवाल!

Dr SB Misra | Jun 29, 2026, 14:37 IST
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यह लेख भारत में आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करता है। लेखक का तर्क है कि लंबे समय तक आरक्षण मिलने के बावजूद लक्षित वर्गों का अपेक्षित बौद्धिक और सामाजिक विकास नहीं हो पाया है, बल्कि इससे प्रतिस्पर्धा की भावना और स्वाभिमान कुंठित हुआ है। लेख में महापुरुषों और वैश्विक प्रगति (जैसे चीन, जापान) का उदाहरण देकर जन्म के बजाय योग्यता, कर्म, आर्थिक स्थिति और वैज्ञानिक आधार पर समाज के उत्थान की वकालत की गई है, ताकि राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सके।

आरक्षण व्यवस्था पर फिर छिड़ी बहस
आरक्षण व्यवस्था पर फिर छिड़ी बहस
आजकल जब सीपीएमटी अथवा इंजीनियरिंग कॉलेज में भर्ती के लिए प्रतियोगात्मक परीक्षा होती है, तो आरक्षण कोटा वाले 35 से 40% अंक पाकर चुन लिए जाते हैं, जबकि सामान्य कोटा वाले 55 से 98% अंक लाकर भी कई बार नहीं चुने जाते। आज़ाद भारत में 80 साल तक आरक्षण व्यवस्था के बावजूद चुने जाने की जुझारू प्रवृत्ति नहीं विकसित हो पाई। उन्हें पता है कि जब 35% पर भी चुन लिए जाएंगे तो ज़्यादा मेहनत करने से क्या लाभ। सोच कर देखिए क्या डॉक्टर अंबेडकर को यह अंदाज़ नहीं था कि 80 साल के बाद भी उनका समाज यह कहेगा कि 'आरक्षण हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है'। यदि उन्हें ऐसा अंदाज़ होता तो वह आरक्षण के लिए 10 वर्ष की अवधि नहीं मांगते। कहते हैं प्रधानमंत्री नेहरू जी ने तो मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था और कहा था कि मैं हर प्रकार के आरक्षण का विरोधी हूँ।

अब सोचिए इस समाज में जिसमें 80 साल लगातार आरक्षण के बाद भी बौद्धिक स्तर का विकास नहीं हो सका और जन्म-जन्मांतर तक आरक्षण की बातें हो रही हैं, लेकिन यह वही समाज है जिसमें संत तुकाराम, संत रविदास, बाबू जगजीवन राम, सीतारमैया, कामराज, महर्षि वाल्मीकि, वल्लभभाई पटेल, कर्पूरी ठाकुर जैसे हजारों लोग आरक्षण के बलबूते पर इतने प्रतिष्ठित और महान नहीं बने थे। इतना ही नहीं, इन्हीं समाजों में कर्ण, एकलव्य और आधुनिक समय में बिजली पासी, मीरा पासी और न जाने कितने योद्धा भी पैदा हुए, वे लोग आरक्षण के मोहताज नहीं थे। उन सभी में एक ही विशेषता थी-प्रतिस्पर्धा में अग्रणी रहने की जुझारू प्रवृत्ति।

योग्यता बनाम अवसर: वर्तमान व्यवस्था और डॉ. अंबेडकर का दृष्टिकोण

आश्चर्य तो तब होता है जब भगवान कृष्ण के वंशज, भीष्म के वंशज तथा विदुर के वंशज आरक्षण की बैसाखी के मोहताज दिखाई पड़ते हैं। वे सभी लोग जिन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग के नाम से संबोधित किया जाता है, आर्थिक रूप से कमज़ोर नहीं हैं, उन्हें समाज में किसी ने पढ़ने-लिखने से वंचित नहीं किया है और वे लोग अपनी इच्छा से विद्यालय नहीं जाते। आश्चर्य तब भी होता है जब बिना फ़ीस, किताबें, कॉपियाँ, मुफ़्त ड्रेस भी दी जाती हो और दोपहर का भोजन भी मिलता हो, तब इन सभी वर्गों के विद्यार्थी या तो पढ़ने आते नहीं अथवा ड्रॉप आउट कर जाते हैं; तो फिर पिछड़ेपन का कारण क्या है, उसका निदान करना होगा। आरक्षण उसका निदान नहीं है, अन्यथा 80 वर्ष के लगातार आरक्षण मिलने के बावजूद समाज की यह दशा नहीं होती।

केवल अनुसूचित और पिछड़ी जातियों की बात नहीं है, मुस्लिम समाज को भी आरक्षण देने की वकालत की जाती है। उनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हालत के अध्ययन के लिए आज़ादी के लंबे अंतराल के बाद सच्चर कमीशन बिठाया जाता है, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती। शायद ठीक ही है, क्योंकि जिस समाज ने इस देश पर सैकड़ों साल तक हुकूमत की हो, उसे दलित, शोषित और पीड़ित वर्ग की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। राजनेताओं का तरीका यह है कि प्रजातंत्र में बच्चों को आरक्षण का झुनझुना दे दो और वोट ले लो, फिर चाहे राष्ट्र में मेधावी पैदा हों या कुंद दिमाग वाले। इन नेताओं ने जब देखा कि आरक्षण का झुनझुना कुछ जातियों को तो मोहित कर सकता है लेकिन सबको नहीं, तब उन्होंने सवर्णों को निर्धनता के आधार पर आरक्षण देने की बातें शुरू कर दीं। यदि आर्थिक पिछड़ेपन का आधार एक वर्ग के लिए प्रासंगिक हो सकता है, तो संपूर्ण समाज के लिए क्यों नहीं? हमारे देश में अनुसूचित जातियों को छोड़कर अन्य किसी को पढ़ने-लिखने से वंचित नहीं किया गया है, और पिछले 80 साल में तो उन्हें भी दूसरों से बेहतर अवसर प्रदान किए गए हैं, तब पिछड़ापन जन्म-जन्मांतर तक बना रहेगा, यह किसी हालत में तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। यह समझने की आवश्यकता है कि आरक्षण दिए जाने का प्रावधान डॉ. अंबेडकर ने किया ही क्यों था। उन्होंने जिस प्रकार का भेदभाव, पढ़ने-लिखने में व्यवधान, समाज में असमानता का जीवन आदि मिलने के कारण यह ज़रूरी समझा कि इस समाज को कुछ समय तक आरक्षण देकर सबके बराबर लाया जा सकेगा। शायद उनका सोचना काम नहीं कर सका और आज भी खुद अनुसूचित जातियों के बीच में रोटी-बेटी का संबंध नहीं है, तो अन्य जातियों की क्या बात करें। और जब हम यह सोचते हैं कि एक समाज के साथ अन्याय हुआ था, तो अब तो न अन्याय करने वाले बचे हैं ना अन्याय झेलने वाले, इसलिए सर्व समाज को ध्यान में रखते हुए 'सर्वे भवंतु सुखिनः' का लक्ष्य होना चाहिए। लेकिन यहाँ तो यह मानते हैं कि हमारी जो संतानें जन्म-जन्मांतर तक पैदा होंगी, वे भी वंचित ही पैदा होंगी, दलित और पीड़ित ही पैदा होंगी, तब फिर आरक्षण की दवाई ने 80 साल में क्या किया?

जातिगत राजनीति, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ

जातिवादी नेताओं को इस बात की चिंता है कि जातीय आरक्षण का प्रतिशत कैसे बढ़ाया जाए। उनका सोचना है कि नए सिरे से जातीय जनगणना होनी चाहिए, लेकिन साथ में ही वे सब यह भी चाहते हैं कि जातिसूचक शब्दों का प्रयोग न किया जाए। किसी ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की जाति पूछ दी, तब अन्य उनके साथी नेताओं ने सवाल उठाया कि जाति कैसे पूछ दी? अब जातिगत गणना जब होगी, तो बिना जाति पूछे वह कैसे हो जाएगी? माननीय उच्चतम न्यायालय ने पिछड़ी जातियों को आरक्षण देते समय 'क्रीमी लेयर' को अलग करने का सुझाव दिया है। यह सच है कि उत्तर भारत में यादव, कुर्मी और दक्षिण में रेड्डी जातियां पिछड़ी जातियों में गिनी जाती हैं, लेकिन इनमें से बहुत से लोग संपन्न हैं, किसी प्रकार से वंचित नहीं रहे हैं और न किए गए हैं। देश में करीब 4000 जातियां और उपजातियां मिलती हैं, जिनकी गणना एक कठिन कार्य होगा। किसी ने राहुल गांधी की जाति पूछ दी तो अनेक नेता नाराज़गी ज़ाहिर करने लगे कि जाति कैसे पूछ दी। वास्तव में जाति हमारे देश में पितृसत्तात्मक होती है न कि मातृसत्तात्मक, लेकिन दोनों ही हालतों में राहुल जी की जाति क्या बनेगी, थोड़ा जटिल प्रश्न है। वास्तव में यदि फ़िरोज़ जहाँगीर ख़ान से शुरू किया जाए तो पारसी, और यदि सोनिया जी को लेकर चलें तो ईसाई, लेकिन इन दोनों ही धर्मों में जाति प्रथा नहीं है। इसलिए अनेक बार जाति आधारित जनगणना सरल नहीं होगी, तब आरक्षण का प्रतिशत निर्धारण भी कठिन हो सकता है। एक तरफ़ हम में से बहुत लोग जातिविहीन समाज की रचना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ़ समाज को 4000 भागों में विभाजित करके देखना चाहते हैं। प्रजातंत्र की कीमत तो चुकानी ही होगी।

सेकुलर भारत में जाति और धर्म पर आधारित गणना का अकादमिक कारणों से तो प्रयोग हो सकता है, लेकिन यदि देश की संपत्ति और सुविधाओं को बांटने का सवाल हो, वह सेकुलर आधार पर ही होना चाहिए। जो लोग सनातन समाज को समझते हैं, उन्हें पता है कि जातियों की रचना कर्मानुसार हुई थी न कि जन्मानुसार। यह ज़रूरी नहीं था कि ब्राह्मण का बेटा हमेशा ब्राह्मण ही बनेगा अथवा शूद्र का बेटा शूद्र ही रहेगा। कर्मों के आधार पर जातियों के निचले पायदान से उठाकर ऊपर के पायदान में ले जाने की और ऊपर से नीचे लाने की परंपरा थी। अब जाति विभाजन कर्मानुसार नहीं रहा और देखा जा सकता है कि चमड़े की दुकान सवर्ण चलाते हैं और पुस्तकें बेचने के लिए तथा विद्यालयों में विद्यादान देने के लिए सभी जातियों के लोग कार्यरत हैं। इसलिए जातियों के साथ ऊंच-नीच की भावना को लेकर चलना अनर्थ होगा। देश में अनेक बार जातिविहीन समाज की रचना का प्रयास हुआ है-फिर चाहे आर्य समाज हो, ब्रह्म समाज, गायत्री समुदाय अथवा दूसरे अन्य लोग जो सनातन धर्म के अभिन्न अंग हैं लेकिन जातीय विभाजन में विश्वास नहीं रखते। समाज के प्रबुद्ध लोगों को बैठकर यह निश्चित करना चाहिए कि सामाजिक समरसता, समानता और सौहार्द बनाने के लिए यदि जातियां बाधक हों, तो उनसे छुटकारा कैसे पाया जाए। 80 वर्षों में यह तो निश्चित हो गया है कि आरक्षण के द्वारा यह संभव नहीं है, क्योंकि आरक्षण के मामले में 'दवा की, मर्ज़ बढ़ता ही गया'।

मुझे याद है गांव का जीवन एकात्म मानववाद जैसे रास्ते पर चलने वाला हुआ करता था। भारत विभाजन के समय भी शहरों की तरह गांवों में हिंदू-मुस्लिम कड़वाहट कभी नहीं देखी गई। जातीय विद्वेष तो होता ही नहीं था, क्योंकि गांव का जीवन एक परिवार की तरह होता था। लेकिन अब आरक्षण के बाद, चुनाव के समय-फिर चाहे पंचायत के चुनाव हों, विधानसभा या लोकसभा के-जाति के आधार पर वही ग्रामीण लामबंद हो जाते हैं जो परस्पर प्रेम से रहते थे। पुराने समय में जहाँ मिल-बैठकर गांव के लोग अपने फैसले कर लिया करते थे, वहीं आज बात-बात पर वैमनस्य बढ़ रहा है। और जातीय गणना के बाद जब 4000 जातियां बनकर सामने आएंगी, तो ईश्वर जाने क्या होगा। जातीय विद्वेष से बचने का एक ही उपाय है कि जन्मानुसार जाति प्रथा बदलकर या तो प्राचीन व्यवस्था के अनुसार कर्मानुसार जातीय वर्ग बनाए जाएं अथवा संपूर्ण समाज को अन्य आधारों पर बांटा जाए।

सामाजिक वर्गीकरण का वैज्ञानिक विकल्प: लैंगिक, आर्थिक और भौगोलिक असमानताएँ

हमारा पुरुष प्रधान समाज है और यहाँ पर परिवार में महिलाओं का स्थान पुरुषों के बाद रहता है। शायद मुस्लिम महिलाओं ने अब अंतर महसूस किया होगा कि तीन तलाक़ से छुटकारा मिलने के बाद दिमाग को सुकून मिलता है या नहीं। इसी तरह जो देश का धनी वर्ग है, उसकी सोच, रहन-सहन और जीवन-सुविधाएं सब पूरी तरह भिन्न हैं उनसे जो निर्धन हैं और कदम-कदम पर धन के अभाव के कारण कष्ट उठाते हैं। इस प्रकार जहाँ स्त्री और पुरुष के दो वर्ग हैं, वहीं पुरुषों में धनी और निर्धन लोगों के अलग वर्ग हैं। यदि तीसरा वर्ग करना ही हो, तो ग्रामीण और शहरी लोगों में बहुत अंतर है; गांव के लोग शहरों की तरफ़ सुविधाओं और अवसरों के लालच में भागते रहते हैं। इसलिए शायद आवश्यकता इस बात की है कि जन्मानुसार जातियों में समाज को विभाजित न करके कोई वैज्ञानिक तरीका ढूंढा जाए और समाज के उत्थान का रास्ता साफ़ हो। आरक्षण के माध्यम से न समानता आई है, न सद्भाव और न राष्ट्र निर्माण का रास्ता खुला है। आरक्षण व्यवस्था कुछ ऐसी ही है जैसे मधुमेह के मरीज़ को गुड़ खिलाने जाओ और सोचो कि उसका मर्ज़ ठीक हो जाएगा।

यदि हम दुनिया के कुछ दूसरे देशों की अपेक्षा अपने देश की प्रगति की तुलना करें, तो पाएंगे कि चीन हमसे एक साल बाद आज़ाद हुआ था लेकिन आज दुनिया के पहले स्थान पर पहुंचने ही वाला है। इसी प्रकार जापान, इंडोनेशिया, यूगोस्लाविया आदि अनेक देश लगभग इसी अवधि में हमसे आगे निकल चुके हैं। उनकी प्रगति में देश के सभी नागरिक समान रूप से भागीदार बने और ज़िम्मेदारी निभाई, न किसी से भेदभाव किया गया और न किसी को आरक्षण दिया गया। ऐसा लगता है कि कुछ लोगों की मान्यता है कि पिछड़े, दलित, शोषित समाज के लोगों की शारीरिक क्षमता और बौद्धिक योग्यता में कमी है और इसीलिए वे आजीवन आरक्षण की बात करते हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो डॉक्टर अंबेडकर के फैसले पर संदेह नहीं होना चाहिए था और 10 वर्ष का आरक्षण का समय उनकी मांग के अनुसार जब बीत गया, तो आरक्षण समाप्त हो जाना चाहिए था। वोटों के लालच में हर 5 साल पर आरक्षण को बढ़ाते रहे और शायद हम ज़्यादा कुछ प्रगति नहीं कर पाए। तथाकथित पिछड़ी जातियों के मामले में यह कहा जा सकता है कि न तो उन्हें वंचित किया गया और न उन्हें अभाव का जीवन बिताना पड़ा, तब यदि वे स्वयं ही शिक्षा प्राप्ति में जुटना न चाहें तो कोई उन्हें बाध्य नहीं कर सकता। हमारे नेताओं की सोच यह होनी चाहिए कि देश अधिक अनिवार्य है अथवा किसी जाति विशेष का हित? शांत दिमाग से सोचना चाहिए कि जो व्यक्ति आरक्षण के माध्यम से 30-35% अंकों के साथ डॉक्टर बना हो, तो क्या ये नेता ऐसे डॉक्टर से अपने पेट का ऑपरेशन कराना ठीक समझेंगे? तब तो ये लोग देश पर भी भरोसा नहीं करते और विदेशों में जाकर अपना इलाज कराते हैं। कहीं ऐसा न हो कि आरक्षण का लक्ष्य पूरा ही न हो पाए और दुनिया बहुत आगे बढ़ती जाए तथा हम पिछड़ते जाएं; यही है राष्ट्र बनाम जाति की सोच। भीख और खैरात का रास्ता अपनाकर हमारे लोगों में वही मानसिकता बनेगी, और प्रतिस्पर्धा का मार्ग अपनाकर स्वाभिमान जागृत होगा। चुनाव हमारे नेताओं के हाथ में है कि आख़िर वे क्या चाहते हैं।
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