हड़ताल चक्का जाम और तोड़फोड़ से पीछे जाता है देश
Dr SB Misra | May 09, 2026, 11:50 IST
लोकतंत्र में विभिन्न तरीकों से अपनी आवाज उठाना आवश्यक है। हड़तालें और आंदोलन समाज की एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन जब ये हिंसा का रूप धर लेते हैं, तो इससे समाज को गंभीर नुकसान होता है। हाल ही में नोएडा में हुई श्रमिकों की हड़ताल और तोड़फोड़ ने व्यवसायों और रोजगार को प्रभावित किया है।
हड़ताल करते वर्कर और सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस
हड़ताल, चक्का जाम, तोड़फोड़ और आंदोलन किसी भी लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन जब ये हिंसा और अराजकता का रूप लेने लगें तो सबसे बड़ा नुकसान देश, समाज और आम लोगों को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ दशकों में देश ने कई ऐसे आंदोलन देखे हैं, जिन्होंने व्यवस्था को झकझोरा जरूर, लेकिन साथ ही अर्थव्यवस्था, उद्योगों और रोजगार पर भी गहरा असर डाला। श्रम और पूंजी के बीच संतुलन बिगड़ने का परिणाम अंततः पूरे समाज को भुगतना पड़ता है।
हाल ही दिनों में उत्तर प्रदेश के शहर नोएडा में भारी हंगामा तोड़फोड़ और श्रमिकों की हड़ताल हुई जिससे फैक्ट्री का काम बन रहा पूंजीपतियों की हानि हुई, सड़कों पर खड़े वाहन चकनाचूर हुए और हासिल क्या हुआ? शायद वह उपद्रवी भी जानते होंगे। उद्योगों और फैक्ट्रियों में काम कर रहे श्रमिकों को यह समझना होगा कि हर कंपनी भारी मुनाफे में नहीं चल रही होती। घाटे में चल रही इकाइयां वेतन में लगातार बढ़ोतरी नहीं कर सकतीं। यदि आंदोलन और अव्यवस्था लगातार बढ़ती रही तो नतीजा उद्योगों के बंद होने और रोजगार के संकट के रूप में सामने आएगा।
हड़तालों से भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि कई बार अराजक तत्व मजदूरों के बीच घुसकर आगजनी और तोड़फोड़ करने लगते हैं। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना किसी भी आंदोलन को कमजोर ही करता है। हालांकि अब सीसीटीवी और डिजिटल निगरानी के जरिए ऐसे लोगों की पहचान की जा रही है। श्रम और पूंजी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। पूंजी के बिना श्रम का सम्मान संभव नहीं और श्रम के बिना पूंजी का विस्तार नहीं हो सकता।
आजादी के शुरुआती दौर में देश में सार्वजनिक क्षेत्र का बोलबाला था। उद्योग-धंधे सरकार के हाथों में थे और मजदूर संगठनों पर साम्यवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव था। समय-समय पर चक्का जाम और हड़तालें होती रहीं, जिनका असर उद्योगों की उत्पादन क्षमता पर पड़ा। धीरे-धीरे कई सरकारी उद्योग घाटे में जाने लगे और कारखाने बंद होने लगे। उसी समय पश्चिमी देशों में पूंजी और उद्योगों का तेजी से विस्तार हो रहा था। एक समय ऐसा आया जब दुनिया भर में साम्यवादी मॉडल कमजोर पड़ने लगा। रूस और चीन जैसे देशों में भी निजी कंपनियों को जगह मिलने लगी। भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिला और औद्योगिक विकास ने नई रफ्तार पकड़ी। यह भी सच है कि सार्वजनिक क्षेत्र के कई उपक्रम लगातार हड़ताल और तालाबंदी की वजह से कमजोर हुए।
रेलवे की लंबी हड़ताल और गोरखपुर के यूरिया कारखाने जैसे उदाहरण बताते हैं कि आंदोलन का असर केवल सरकार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम जनता और किसानों तक पहुंचता है। उस दौर में “हर जोर-जुल्म के टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है” जैसे नारे लोकप्रिय थे, लेकिन इनके दुष्परिणाम देश की अर्थव्यवस्था ने भुगते। मजदूर वेतन बढ़ाने की मांग करते रहे, लेकिन उद्योग बंद होने के बाद वही लोग बेरोजगार भी हुए।
पश्चिमी देशों, खासकर उत्तरी अमेरिका की तुलना में भारत में श्रमिक और किसान आंदोलन अधिक दिखाई देते हैं। सबसे अधिक कठिनाई तब होती है, जब देश का अन्नदाता लंबे समय तक सड़क पर बैठ जाता है। आंदोलन का असर केवल सरकार पर नहीं पड़ता, बल्कि खेती-किसानी और उत्पादन पर भी पड़ता है। बुवाई और कटाई जैसे महत्वपूर्ण समय में आंदोलन किसानों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। यह भी सही है कि किसान अपनी उपज का न्यायसंगत दाम मांगते हैं, मजदूर बेहतर मजदूरी चाहते हैं और कर्मचारी उचित वेतन की मांग करते हैं। लेकिन “न्यायसंगत” की परिभाषा क्या हो, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। अर्थशास्त्र में मांग और पूर्ति का सिद्धांत इसी जगह काम करता है। मजदूर सोचता है कि उसके श्रम से पूंजी बनी है, जबकि पूंजीपति मानता है कि उसने श्रम खरीदा है। यही टकराव आगे चलकर संघर्ष का कारण बनता है। गांधी जी का सत्याग्रह भी एक प्रकार का आंदोलन था, लेकिन उसमें अहिंसा और अनुशासन था। आज के आंदोलनों में अक्सर हिंसा और उग्रता दिखाई देती है। जब आंदोलन में अराजक तत्व शामिल हो जाते हैं, तब उसका उद्देश्य पीछे छूट जाता है और नुकसान समाज को उठाना पड़ता है।
आज केवल मजदूर संगठन ही नहीं, बल्कि शिक्षक, डॉक्टर और दूसरे पेशेवर वर्ग भी समय-समय पर हड़ताल पर जाते हैं। भारतीय परंपरा में गुरु और वैद्य को विशेष स्थान दिया गया है। “विद्यादानं सर्वे दानेषु महानम्” जैसी सोच हमारी संस्कृति का हिस्सा रही है। लेकिन अब “काम और काम के बदले दाम” की मानसिकता ने कर्तव्यबोध को कमजोर कर दिया है। जब शिक्षक छात्रों को भगवान भरोसे छोड़कर हड़ताल पर चले जाते हैं या डॉक्टर मरीजों का इलाज रोक देते हैं, तब समाज पर गंभीर असर पड़ता है। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की हड़ताल से मरीजों की जान तक खतरे में पड़ जाती है। हालांकि यह राहत की बात है कि देश के सैनिक अब भी हड़ताल का रास्ता नहीं अपनाते, वरना स्थिति और गंभीर हो सकती थी। भारतीय परंपरा में अधिकारों के साथ कर्तव्य पर भी जोर दिया गया है। लेकिन आज अधिकारों की मांग अधिक दिखाई देती है और कर्तव्य पीछे छूटते जा रहे हैं। यही कारण है कि समाज में असंतुलन बढ़ रहा है।
इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं, जब सरकारों ने हड़तालों के सामने झुकने के बजाय नई व्यवस्थाएं खड़ी कर दीं। चौधरी चरण सिंह के समय पटवारियों के सामूहिक इस्तीफे के बाद लेखपाल व्यवस्था खड़ी की गई थी। इससे यह संदेश गया कि संवाद जरूरी है, लेकिन दबाव की राजनीति हमेशा सफल नहीं होती।समस्या का समाधान गांधी जी के “ट्रस्टीशिप” सिद्धांत में दिखाई देता है। पूंजीपति को यह नहीं मानना चाहिए कि सारी संपत्ति केवल उसकी है और श्रमिक को भी यह अहंकार नहीं होना चाहिए कि सारी संपत्ति केवल उसके श्रम से बनी है। दोनों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। देश को न तो अंध पूंजीवाद में स्थायी समाधान मिलेगा और न ही कट्टर साम्यवाद में। संस्कारयुक्त शिक्षा, सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और संतोष की भावना ही समाज को संतुलन दे सकती है। जब तक कर्तव्य और अधिकार का संतुलन नहीं बनेगा, तब तक हड़ताल, तालाबंदी, उपद्रव और तोड़फोड़ जैसी समस्याएं बार-बार सामने आती रहेंगी।
नोट: ये लेखक के निजी विचार हैं।
श्रम और पूंजी का संघर्ष नहीं, संतुलन जरूरी
हड़तालों से भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि कई बार अराजक तत्व मजदूरों के बीच घुसकर आगजनी और तोड़फोड़ करने लगते हैं। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना किसी भी आंदोलन को कमजोर ही करता है। हालांकि अब सीसीटीवी और डिजिटल निगरानी के जरिए ऐसे लोगों की पहचान की जा रही है। श्रम और पूंजी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। पूंजी के बिना श्रम का सम्मान संभव नहीं और श्रम के बिना पूंजी का विस्तार नहीं हो सकता।
यूनियनबाजी और सार्वजनिक क्षेत्र का पतन
रेलवे की लंबी हड़ताल और गोरखपुर के यूरिया कारखाने जैसे उदाहरण बताते हैं कि आंदोलन का असर केवल सरकार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम जनता और किसानों तक पहुंचता है। उस दौर में “हर जोर-जुल्म के टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है” जैसे नारे लोकप्रिय थे, लेकिन इनके दुष्परिणाम देश की अर्थव्यवस्था ने भुगते। मजदूर वेतन बढ़ाने की मांग करते रहे, लेकिन उद्योग बंद होने के बाद वही लोग बेरोजगार भी हुए।
किसान आंदोलन और न्यायसंगत मांग का सवाल
शिक्षा, चिकित्सा और कर्तव्यबोध का संकट
गांधी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत ही रास्ता
नोट: ये लेखक के निजी विचार हैं।