मेहरबानी ट्रंप की, परेशानी सारी दुनिया की
Dr SB Misra | May 23, 2026, 18:54 IST
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की शांति की कोशिशें विफल रहीं। उन्होंने दुनिया भर में तनाव बढ़ाया है। भारत अपनी पुरानी तटस्थ विदेश नीति पर चल रहा है। यह नीति भारत को सुरक्षित रख रही है। दुनिया के देश अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं। भारत सरकार स्वतंत्र निर्णय ले रही है।
डोनाल्ड ट्रंप
दुनिया के सबसे ताकतवर और शायद सबसे धनी देश अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने लिए शांति का नोबेल पुरस्कार जितना चाहा था, लेकिन हासिल हो रहा है खुराफात का तमगा। जब डोनाल्ड ट्रंप यूक्रेन के साथ वर्षों से चल रहे युद्ध की समाप्ति कराने का दम भर रहे थे और नोबेल पुरस्कार की कामना कर रहे थे, तब वह असफल रहे। उधर जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव तथा संघर्ष आरंभ हुआ और भारत ने अपना काम पूरा करके पाकिस्तान के निवेदन के बाद युद्ध समाप्त कर दिया, तो फिर डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी डफली बजानी आरंभ की कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता कराया है। ट्रंप को ढिंढोरा पीटने का कोई लाभ नहीं मिला और शांति पुरस्कार मिलने की कोई उम्मीद नहीं रही। इसी प्रकार चीन और ताइवान के बीच तनाव को समाप्त कर शांति कायम करने की कोशिश में भी कोई कामयाबी नहीं मिली। अब उन्होंने अभियान चलाया “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” अर्थात अमेरिका को फिर से महान बनाओ, और उसी अभियान में जुट गए। तमाम देशों पर टैरिफ लगाकर उन्हें लाइन में लगाना चाहा। भारत पर भी टैरिफ लगाया, परंतु भारत ने कोई तू-तू मैं-मैं नहीं की। भारत ने विकल्प ढूंढते हुए दुनिया के दूसरे देशों से व्यापार आरंभ करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
ट्रंप ने यह कहा कि जो कोई रूस से तेल खरीदेगा, वह रूस की आर्थिक मदद कर रहा होगा। फिर भारत से यह कहा कि एक महीने के लिए आप खरीद सकते हो, मानो वह दुनिया के मॉनिटर हों। भारत ने कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय जब ट्रंप ने मना किया था तब भी तेल खरीदना बंद नहीं किया, लेकिन किसी विवाद में पड़ने की आवश्यकता शायद नहीं समझी। कहा जाता है कि वर्तमान में भारत 42 देशों से तेल की आपूर्ति करने का प्रयास कर रहा है। जब शांति दूत बनने की कोशिश भी नाकाम रही तो ट्रंप ने ताकत के बल पर शांति स्थापित करने का प्रयास किया और कर रहे हैं। मध्य पूर्व के देशों में आपसी तालमेल नहीं था, तनावपूर्ण और युद्ध जैसी हालत थी। ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष चल रहा था। ईरान अमेरिका से कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं कर रहा था, केवल इजरायल के साथ संघर्ष हो रहा था, लेकिन ट्रंप ने इस संघर्ष को ताकत के बल पर समाप्त करना चाहा। उन्होंने जिस तरह वेनेजुएला को शांत किया था, उस पर कब्जा कर लिया था, तो उसी तरह ईरान पर भी कब्जा कर लेंगे, ऐसा सोचा। लेकिन इस प्रयास का कोई अंत दिखाई नहीं पड़ रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप दुनिया में शांति तो नहीं कायम कर पाए, लेकिन हर देश में अशांति, तनाव और परेशानी पैदा कर दी है। समुद्री यातायात बाधित होने से पचासी देशों में तेल और गैस के दाम बढ़ गए हैं। अब तो लग रहा है कि जंगल में आग लग चुकी है और जब ऐसा होता है तो कोई जानवर, कोई पक्षी और कोई वनस्पति बचती नहीं है। इसी प्रकार दुनिया के सभी देश तकलीफ महसूस कर रहे हैं और अपने-अपने तरीके से उससे निपट रहे हैं। चाहे अमेरिका के पक्षधर हों या ईरान के पक्षधर, सभी बमबारी की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में भारत ने अपनी पुरानी परिचित तटस्थ अंतरराष्ट्रीय नीति का पालन करते हुए कबीर दास का रास्ता अपनाया, यानी “ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर”। पीड़ादायक स्थिति तब होती है जब हमारे देश के विपक्ष के नेता कहते हैं कि सरकार को या तो अमेरिका का पक्ष लेना चाहिए या ईरान का। यह तटस्थ विदेश नीति को त्याग कर युद्ध में शामिल होने जैसा होगा। इसलिए एक पक्ष का पक्षधर होकर कोई आराम नहीं मिलेगा, बल्कि तकलीफ ही बढ़ेगी।
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने तटस्थ विदेश नीति के कारण कष्ट उठाया है। 1962 में चीन के साथ जब भारत का युद्ध हुआ, तब नेहरू जी की तटस्थ विदेश नीति के कारण रूस या अमेरिका दोनों पक्षों में से कोई भी मदद करने के लिए नहीं आया। देश की शर्मनाक पराजय के बावजूद विदेश नीति की आलोचना नहीं की गई। इसी तरह 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में शास्त्री जी तटस्थ विदेश नीति के परिणामस्वरूप न तो दुनिया के किसी देश से मदद मांगने गए और ना किसी ने अपने आप आगे बढ़कर मदद का आश्वासन दिया। फिर भी भारत “इकला चलो” की नीति पर चलते हुए जोखिम उठाता रहा, लेकिन विदेश नीति जहां तक संभव हुआ तटस्थ रही। तटस्थ विदेश नीति के लाभ भी होते हैं और जोखिम भी।
जब 1967 में देश में अकाल पड़ा था और भुखमरी की नौबत थी, तब दुनिया के किसी देश ने मदद नहीं की। केवल अमेरिका ने वह गेहूं दिया था जिसे वह अटलांटिक महासागर में फेंकने वाला था। इंदिरा जी को मजबूर होकर वह गेहूं स्वीकार करना पड़ा था। सरकार को रुपए का अवमूल्यन करना पड़ा था और संकटों से जूझना पड़ा था। इसी प्रकार जब 1971 में फिर से पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ, तो सरकार ने पाकिस्तान के दो खंड कर दिए थे, जैसे एक राक्षस के दो खंड हुए हों और एक राक्षस की जगह दो पैदा हुए हों — राहु और केतु। आज भी पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ कोई मित्रवत व्यवहार नहीं है। मुझे याद है कि युद्ध में इतना खर्च हुआ था कि सरकार को विवश होकर अलग से टैक्स लगाना पड़ा था। तत्कालीन सरकार ने रूस के साथ एक संधि कर ली थी, जैसा अखबारों में छपा था। जब अमेरिका तथा इंग्लैंड ने पाकिस्तान के पक्ष में अपने को खड़ा किया, तब रूस ने भारत की बड़ी मदद की थी। समय और परिस्थिति के अनुसार सरकारों को फैसले करने होते हैं और उस सरकार ने भी किए थे। किसी ने आलोचना नहीं की थी।
जब कभी भी दो पक्षों में संधि या समझौता होता है, तो उसमें “गिव एंड टेक” का नजरिया तो रहता ही है। भारत ने अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौता किया है, उसमें कुछ बातें जनहित में न हों, लेकिन अभी उसका खुलासा नहीं हुआ है। दुनिया की जब ऐसी विषम परिस्थिति है, तो उसको लेकर कड़वी बहस की आवश्यकता न होती तो अच्छा था। यह कहना कि अमेरिका ने भारत की गर्दन पकड़ रखी है अथवा यह कि वर्तमान सरकार ने भारत को अमेरिका के हाथ बेच दिया है, ऐसे वक्तव्य न हों तो विषाक्त वातावरण नहीं होगा। कहते हैं कि टिड्डी अपने अंडों की रक्षा के लिए ऊपर को पैर करके लेटी हुई थी। जब किसी चिड़िया ने उससे पूछा कि तुम ऊपर को पैर करके क्यों लेटी हो, तो उसने कहा कि आसमान गिर जाएगा और हमारे अंडे फूट जाएंगे। इसी तरह यह सोचना कि संधि-समझौते के परिणामस्वरूप देश बर्बाद हो जाएगा, समाप्त हो जाएगा, शायद उचित नहीं है।
जब 1965 के युद्ध के बाद ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ और भारत ने जीती हुई जमीन पाकिस्तान को वापस कर दी। इसी प्रकार 1971 में शिमला समझौते के अंतर्गत पाकिस्तान की जीती हुई जमीन सरकार ने वापस कर दी थी। सत्ता पक्ष समय और परिस्थिति के अनुसार निर्णय करता है। कभी वह निर्णय भविष्य में लाभकारी सिद्ध होते हैं तो कभी हानिकारक भी। उचित यह होगा कि वर्तमान कठिनाइयों को झेलते हुए यदि पक्ष और विपक्ष में तू-तू मैं-मैं न हो और वातावरण विषाक्त न बने तो अच्छा होगा।
आजाद भारत की पहली सरकार ने कुछ दूरगामी निर्णय लिए थे, जिनमें तटस्थ विदेश नीति एक थी। वयस्क मताधिकार और सेकुलर व्यवस्था दूसरी नीतियां थीं। यह चर्चा और बहस का विषय हो सकता है कि कितने वर्षों में इनमें से कितनी नीतियां सफलतापूर्वक लागू की जा सकीं। यह बात सच है कि डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के सामने विषम परिस्थितियां पैदा कर दी हैं और संसार के देश उन परिस्थितियों का मुकाबला भी अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। कुछ देश एक पक्ष या दूसरे पक्ष के साथ खड़े हैं और बमबारी का शिकार भी हो रहे हैं। लेकिन भारत में शांत और सुरक्षित जीवन मिल रहा है, बम की आशंका के सायरन नहीं बज रहे हैं। यदि हम वर्तमान नीतियों से सहमत न हों, तो हमें यह देखना चाहिए कि दुनिया का कौन-सा देश है जिसकी नीतियों के अनुसार हम भी चल सकते थे। वर्तमान सत्ता पक्ष को भी स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार जनता ने दिया है और वह अपने विवेक के अनुसार निर्णय लेता रहेगा। विपक्ष की सोच के अनुसार काम नहीं करेगा।
वास्तव में डोनाल्ड ट्रंप की हालत यह है कि शायद वह स्वयं नहीं जानते कि उनका लक्ष्य क्या है। उन्होंने विश्व शांति का नारा दिया, रूस और यूक्रेन का युद्ध समाप्त करने का दम भरा और उसके बाद वेनेजुएला पर हमला करके वहां के राष्ट्रपति को बंधक बनाकर अपने देश में ले आए और मुकदमा चला रहे हैं। अब उन्हें शांति चाहिए या तानाशाही? ट्रंप दुनिया के ऐसे देश के राष्ट्रपति हैं जो असीमित ताकत और धन रखता है और उनके हालात ऐसे हैं कि जैसे कहा जाए कि बंदर के हाथ में उस्तरा आ गया हो, न जाने किसकी गर्दन काट देगा। अमेरिका एक बार पहले भी वियतनाम से युद्ध करते हुए युद्ध के दलदल में फंस चुका है और अब अफगानिस्तान से किसी तरह बाहर निकला है। अब ईरान के साथ युद्ध करके दोबारा उसी हालत में पहुंच रहा है। जब कथनी और करनी में बड़ा अंतर हो जाता है, तो विश्वसनीयता स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाती है।
जब जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर ने घोषित किया था कि वह आर्य है, जिसका मतलब होता है श्रेष्ठ और उत्तम, तो दुनिया में किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था। भारत के लोग अपने को आर्य मानते हैं और उनके संस्कारों में कहीं भी रक्तपात नहीं है, तानाशाही नहीं है और मनमाना व्यवहार किसी शासक में नहीं देखा गया। 70 के दशक में यदि देखा भी गया तो वह अल्पकालिक था। इस देश में हिटलर, मुसोलिनी, माओत्से तुंग और ट्रंप नहीं पैदा हो सकते।
यदि कोई शासक अथवा राष्ट्रपति विश्व शांति की सचमुच कामना करता है, तो वह स्वतः भारतीय संस्कृति के अनुरूप बातें और काम दोनों करेगा। एक ऐसी संस्कृति जो कहती है “वसुधैव कुटुंबकम” यानी सारी दुनिया हमारा परिवार है, या फिर “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः” यानी सब लोग सुखी हों और सब निडर हों, अथवा “आत्मवत सर्वभूतेषु” यानी सभी लोगों को अपने जैसा समझना। भारत के लोग अतीत काल से सारी दुनिया में गए, लेकिन बंदूक और तलवार लेकर नहीं, बल्कि हाथ में शांति का संदेश और पुस्तक लेकर सारी दुनिया में घूमते रहे। कभी भी उन पर शासन करने की नहीं सोची। सम्राट अशोक तक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को श्रीलंका भेजा जरूर था, लेकिन बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए। हमारे यहां एक से एक पराक्रमी योद्धा पैदा हुए, लेकिन किसी ने दूसरे देशों पर आक्रांता बनकर कब्जा नहीं किया। लेकिन महान शक्तिशाली शासक डोनाल्ड ट्रंप को यह बातें कौन बताए। वह तो शक्ति के द्वारा शांति लाना चाहते हैं, परंतु हमारे मनीषियों ने कहा है — “संघर्षेण संघर्षो भवति” अर्थात लड़ाई से लड़ाई ही पैदा होगी, शांति नहीं आ सकती।
इस युद्ध में केवल अमेरिका और ईरान ही शामिल नहीं हैं, बल्कि इजरायल में रहने वाले वे यहूदी भी शामिल हैं जिन्हें तानाशाह हिटलर ने बेघर बना दिया था। वे दर-दर भटकते रहे थे और अंततः इजरायल में उन्हें ठिकाना मिला था। इस लड़ाई से लाभ किसका होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है। आशा की जानी चाहिए कि युद्ध करने वालों को सद्बुद्धि आएगी और दुनिया की परेशानी दूर होगी।
ट्रंप ने यह कहा कि जो कोई रूस से तेल खरीदेगा, वह रूस की आर्थिक मदद कर रहा होगा। फिर भारत से यह कहा कि एक महीने के लिए आप खरीद सकते हो, मानो वह दुनिया के मॉनिटर हों। भारत ने कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय जब ट्रंप ने मना किया था तब भी तेल खरीदना बंद नहीं किया, लेकिन किसी विवाद में पड़ने की आवश्यकता शायद नहीं समझी। कहा जाता है कि वर्तमान में भारत 42 देशों से तेल की आपूर्ति करने का प्रयास कर रहा है। जब शांति दूत बनने की कोशिश भी नाकाम रही तो ट्रंप ने ताकत के बल पर शांति स्थापित करने का प्रयास किया और कर रहे हैं। मध्य पूर्व के देशों में आपसी तालमेल नहीं था, तनावपूर्ण और युद्ध जैसी हालत थी। ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष चल रहा था। ईरान अमेरिका से कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं कर रहा था, केवल इजरायल के साथ संघर्ष हो रहा था, लेकिन ट्रंप ने इस संघर्ष को ताकत के बल पर समाप्त करना चाहा। उन्होंने जिस तरह वेनेजुएला को शांत किया था, उस पर कब्जा कर लिया था, तो उसी तरह ईरान पर भी कब्जा कर लेंगे, ऐसा सोचा। लेकिन इस प्रयास का कोई अंत दिखाई नहीं पड़ रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप दुनिया में शांति तो नहीं कायम कर पाए, लेकिन हर देश में अशांति, तनाव और परेशानी पैदा कर दी है। समुद्री यातायात बाधित होने से पचासी देशों में तेल और गैस के दाम बढ़ गए हैं। अब तो लग रहा है कि जंगल में आग लग चुकी है और जब ऐसा होता है तो कोई जानवर, कोई पक्षी और कोई वनस्पति बचती नहीं है। इसी प्रकार दुनिया के सभी देश तकलीफ महसूस कर रहे हैं और अपने-अपने तरीके से उससे निपट रहे हैं। चाहे अमेरिका के पक्षधर हों या ईरान के पक्षधर, सभी बमबारी की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में भारत ने अपनी पुरानी परिचित तटस्थ अंतरराष्ट्रीय नीति का पालन करते हुए कबीर दास का रास्ता अपनाया, यानी “ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर”। पीड़ादायक स्थिति तब होती है जब हमारे देश के विपक्ष के नेता कहते हैं कि सरकार को या तो अमेरिका का पक्ष लेना चाहिए या ईरान का। यह तटस्थ विदेश नीति को त्याग कर युद्ध में शामिल होने जैसा होगा। इसलिए एक पक्ष का पक्षधर होकर कोई आराम नहीं मिलेगा, बल्कि तकलीफ ही बढ़ेगी।
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने तटस्थ विदेश नीति के कारण कष्ट उठाया है। 1962 में चीन के साथ जब भारत का युद्ध हुआ, तब नेहरू जी की तटस्थ विदेश नीति के कारण रूस या अमेरिका दोनों पक्षों में से कोई भी मदद करने के लिए नहीं आया। देश की शर्मनाक पराजय के बावजूद विदेश नीति की आलोचना नहीं की गई। इसी तरह 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में शास्त्री जी तटस्थ विदेश नीति के परिणामस्वरूप न तो दुनिया के किसी देश से मदद मांगने गए और ना किसी ने अपने आप आगे बढ़कर मदद का आश्वासन दिया। फिर भी भारत “इकला चलो” की नीति पर चलते हुए जोखिम उठाता रहा, लेकिन विदेश नीति जहां तक संभव हुआ तटस्थ रही। तटस्थ विदेश नीति के लाभ भी होते हैं और जोखिम भी।
जब 1967 में देश में अकाल पड़ा था और भुखमरी की नौबत थी, तब दुनिया के किसी देश ने मदद नहीं की। केवल अमेरिका ने वह गेहूं दिया था जिसे वह अटलांटिक महासागर में फेंकने वाला था। इंदिरा जी को मजबूर होकर वह गेहूं स्वीकार करना पड़ा था। सरकार को रुपए का अवमूल्यन करना पड़ा था और संकटों से जूझना पड़ा था। इसी प्रकार जब 1971 में फिर से पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ, तो सरकार ने पाकिस्तान के दो खंड कर दिए थे, जैसे एक राक्षस के दो खंड हुए हों और एक राक्षस की जगह दो पैदा हुए हों — राहु और केतु। आज भी पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ कोई मित्रवत व्यवहार नहीं है। मुझे याद है कि युद्ध में इतना खर्च हुआ था कि सरकार को विवश होकर अलग से टैक्स लगाना पड़ा था। तत्कालीन सरकार ने रूस के साथ एक संधि कर ली थी, जैसा अखबारों में छपा था। जब अमेरिका तथा इंग्लैंड ने पाकिस्तान के पक्ष में अपने को खड़ा किया, तब रूस ने भारत की बड़ी मदद की थी। समय और परिस्थिति के अनुसार सरकारों को फैसले करने होते हैं और उस सरकार ने भी किए थे। किसी ने आलोचना नहीं की थी।
जब कभी भी दो पक्षों में संधि या समझौता होता है, तो उसमें “गिव एंड टेक” का नजरिया तो रहता ही है। भारत ने अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौता किया है, उसमें कुछ बातें जनहित में न हों, लेकिन अभी उसका खुलासा नहीं हुआ है। दुनिया की जब ऐसी विषम परिस्थिति है, तो उसको लेकर कड़वी बहस की आवश्यकता न होती तो अच्छा था। यह कहना कि अमेरिका ने भारत की गर्दन पकड़ रखी है अथवा यह कि वर्तमान सरकार ने भारत को अमेरिका के हाथ बेच दिया है, ऐसे वक्तव्य न हों तो विषाक्त वातावरण नहीं होगा। कहते हैं कि टिड्डी अपने अंडों की रक्षा के लिए ऊपर को पैर करके लेटी हुई थी। जब किसी चिड़िया ने उससे पूछा कि तुम ऊपर को पैर करके क्यों लेटी हो, तो उसने कहा कि आसमान गिर जाएगा और हमारे अंडे फूट जाएंगे। इसी तरह यह सोचना कि संधि-समझौते के परिणामस्वरूप देश बर्बाद हो जाएगा, समाप्त हो जाएगा, शायद उचित नहीं है।
जब 1965 के युद्ध के बाद ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ और भारत ने जीती हुई जमीन पाकिस्तान को वापस कर दी। इसी प्रकार 1971 में शिमला समझौते के अंतर्गत पाकिस्तान की जीती हुई जमीन सरकार ने वापस कर दी थी। सत्ता पक्ष समय और परिस्थिति के अनुसार निर्णय करता है। कभी वह निर्णय भविष्य में लाभकारी सिद्ध होते हैं तो कभी हानिकारक भी। उचित यह होगा कि वर्तमान कठिनाइयों को झेलते हुए यदि पक्ष और विपक्ष में तू-तू मैं-मैं न हो और वातावरण विषाक्त न बने तो अच्छा होगा।
आजाद भारत की पहली सरकार ने कुछ दूरगामी निर्णय लिए थे, जिनमें तटस्थ विदेश नीति एक थी। वयस्क मताधिकार और सेकुलर व्यवस्था दूसरी नीतियां थीं। यह चर्चा और बहस का विषय हो सकता है कि कितने वर्षों में इनमें से कितनी नीतियां सफलतापूर्वक लागू की जा सकीं। यह बात सच है कि डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के सामने विषम परिस्थितियां पैदा कर दी हैं और संसार के देश उन परिस्थितियों का मुकाबला भी अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। कुछ देश एक पक्ष या दूसरे पक्ष के साथ खड़े हैं और बमबारी का शिकार भी हो रहे हैं। लेकिन भारत में शांत और सुरक्षित जीवन मिल रहा है, बम की आशंका के सायरन नहीं बज रहे हैं। यदि हम वर्तमान नीतियों से सहमत न हों, तो हमें यह देखना चाहिए कि दुनिया का कौन-सा देश है जिसकी नीतियों के अनुसार हम भी चल सकते थे। वर्तमान सत्ता पक्ष को भी स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार जनता ने दिया है और वह अपने विवेक के अनुसार निर्णय लेता रहेगा। विपक्ष की सोच के अनुसार काम नहीं करेगा।
वास्तव में डोनाल्ड ट्रंप की हालत यह है कि शायद वह स्वयं नहीं जानते कि उनका लक्ष्य क्या है। उन्होंने विश्व शांति का नारा दिया, रूस और यूक्रेन का युद्ध समाप्त करने का दम भरा और उसके बाद वेनेजुएला पर हमला करके वहां के राष्ट्रपति को बंधक बनाकर अपने देश में ले आए और मुकदमा चला रहे हैं। अब उन्हें शांति चाहिए या तानाशाही? ट्रंप दुनिया के ऐसे देश के राष्ट्रपति हैं जो असीमित ताकत और धन रखता है और उनके हालात ऐसे हैं कि जैसे कहा जाए कि बंदर के हाथ में उस्तरा आ गया हो, न जाने किसकी गर्दन काट देगा। अमेरिका एक बार पहले भी वियतनाम से युद्ध करते हुए युद्ध के दलदल में फंस चुका है और अब अफगानिस्तान से किसी तरह बाहर निकला है। अब ईरान के साथ युद्ध करके दोबारा उसी हालत में पहुंच रहा है। जब कथनी और करनी में बड़ा अंतर हो जाता है, तो विश्वसनीयता स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाती है।
जब जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर ने घोषित किया था कि वह आर्य है, जिसका मतलब होता है श्रेष्ठ और उत्तम, तो दुनिया में किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था। भारत के लोग अपने को आर्य मानते हैं और उनके संस्कारों में कहीं भी रक्तपात नहीं है, तानाशाही नहीं है और मनमाना व्यवहार किसी शासक में नहीं देखा गया। 70 के दशक में यदि देखा भी गया तो वह अल्पकालिक था। इस देश में हिटलर, मुसोलिनी, माओत्से तुंग और ट्रंप नहीं पैदा हो सकते।
यदि कोई शासक अथवा राष्ट्रपति विश्व शांति की सचमुच कामना करता है, तो वह स्वतः भारतीय संस्कृति के अनुरूप बातें और काम दोनों करेगा। एक ऐसी संस्कृति जो कहती है “वसुधैव कुटुंबकम” यानी सारी दुनिया हमारा परिवार है, या फिर “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः” यानी सब लोग सुखी हों और सब निडर हों, अथवा “आत्मवत सर्वभूतेषु” यानी सभी लोगों को अपने जैसा समझना। भारत के लोग अतीत काल से सारी दुनिया में गए, लेकिन बंदूक और तलवार लेकर नहीं, बल्कि हाथ में शांति का संदेश और पुस्तक लेकर सारी दुनिया में घूमते रहे। कभी भी उन पर शासन करने की नहीं सोची। सम्राट अशोक तक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को श्रीलंका भेजा जरूर था, लेकिन बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए। हमारे यहां एक से एक पराक्रमी योद्धा पैदा हुए, लेकिन किसी ने दूसरे देशों पर आक्रांता बनकर कब्जा नहीं किया। लेकिन महान शक्तिशाली शासक डोनाल्ड ट्रंप को यह बातें कौन बताए। वह तो शक्ति के द्वारा शांति लाना चाहते हैं, परंतु हमारे मनीषियों ने कहा है — “संघर्षेण संघर्षो भवति” अर्थात लड़ाई से लड़ाई ही पैदा होगी, शांति नहीं आ सकती।
इस युद्ध में केवल अमेरिका और ईरान ही शामिल नहीं हैं, बल्कि इजरायल में रहने वाले वे यहूदी भी शामिल हैं जिन्हें तानाशाह हिटलर ने बेघर बना दिया था। वे दर-दर भटकते रहे थे और अंततः इजरायल में उन्हें ठिकाना मिला था। इस लड़ाई से लाभ किसका होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है। आशा की जानी चाहिए कि युद्ध करने वालों को सद्बुद्धि आएगी और दुनिया की परेशानी दूर होगी।