चिंता : पक्ष और विपक्ष की बेलगाम भाषा, कैसे लगे लगाम ?
Dr SB Misra | Oct 09, 2026, 15:49 IST
भारतीय संसद में आजकल सांसदों के आचरण और बयानों में गिरावट साफ देखी जा रही है। विपक्ष सत्ता पक्ष की तीव्र आलोचना कर रहा है, लेकिन यह सब संसदीय चर्चा को प्रभावित कर रहा है। नेताओं के बीच असहमति और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों को खतरा है। संसद में सभी सांसदों को अपनी जिम्मेदारी का ध्यान रखते हुए जनता का भला करना चाहिए।
सांसदों द्वारा अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल चिंता का विषय बन गया है।
आजाद भारत के 80 साल के अंतराल में शायद ही कोई ऐसा समयआया हो जब पक्ष और विपक्ष की तू-तू, मैं-मैं का स्तर इतना गिरा हो। लोकसभा में सांसदों के व्यवहार से तो लगता है,‘आए थे हरि भजन को, ओटनलगे कपास’। कई बार तो ऐसा लगता है कि विपक्ष डिक्टेट करना चाहता है सत्ता पक्ष को,कि किस विषय पर चर्चा हो और किस प्रकार की चर्चा हो? उसे इससे कोई मतलब नहीं कि सत्ता पक्ष को जनता ने किस काम के लिए भेजा है और विपक्ष को किस काम के लिए? हमारा विपक्ष विधायी कार्य अपने हाथ में नहीं ले सकता, उसमें सुझाव और सुधार कर सकता है, यदि संसद को चलने दिया जाए।
एक जमाना था जब संसद कीकार्यवाही का स्तर इतना ऊंचा होता था कि सत्ता पक्ष और विपक्ष परस्पर सम्मान भाव से काम करते थे। एक बार संसद में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत की जनता की प्रतिव्यक्ति रोजानाआमदनी तीन आना है, जिस पर सत्ता पक्ष विफर गया, और अगले दिन सत्ता पक्ष ने कहा, तेरह आना प्रतिदिन की है। लोहिया फिर भी नहीं माने और कहा कि हम इसे प्रमाणित कर सकते हैं। अगले दिन सत्ता पक्ष ने पांच आने प्रतिदिन की आय स्वीकार की। इसके बाद लोहिया ने इस विषय को आगे नहीं बढ़ाया, क्योंकि पांच आना और तीन आना में बहुत अंतर नहीं था। इसी तरह, अटल बिहारी बाजपेई ने विदेश नीति पर चर्चा के दौरान तर्कपूर्ण ढंग से भारत की विदेश नीति पर अनेक सवाल उठाए थे और नेहरू के साथ एक प्रकार से तीखी बहस भी हुई थी, लेकिन सत्र के बाद किसी कार्यक्रम में जब अटल बिहारी बाजपेई नेहरू से मिले, तो नेहरू ने न केवल उनके भाषण की प्रशंसा की, बल्कि किसी अतिथि से परिचय कराते हुए उन्हें भावी प्रधानमंत्री भी कह दिया था।
उस समय संसद में और संसद के बाहर भी, नेताओं की भाषा संतुलित और संयमित हुआ करती थी।एक दूसरे का सम्मान होता था, और कभी भी तू-तू, मैं-मैं नहीं होती थी। भले ही तीखी बहस जरूर होती थी। आजकल जब हम सुनते हैं विपक्षी नेता कहते हैं,Òमोदी अगली बारप्रधानमंत्री नहीं रहेगा" मानो घर के चपरासी के बारे में बात हो रही हो। किसी व्यक्ति की भाषा उसके संस्कारों की अभिव्यक्ति होती है, और तब में और अब में संस्कारों का अंतरदेखा जा सकता है।
आज संसद में सांसद बच्चों की तरह से झगड़ते हैं, एक सांसद ने दूसरे की जात पूछ दी, तो तीसरा बोला,"तुमने जाति कैसे पूछी?"। यह तिरस्कारपूर्ण बहस का मुद्दा बन गया। अब सोने की बात है कि जब जातीय मतगणना होनी है तो बिना जाति पूछे गड़ना कैसे होगी? उस पर यदि चर्चा हो रही हो, तो एक उदाहरण यह बनता है कि कभी-कभी हर परिस्थिति में जाति बताना संभव ही नहीं होगा और यदि ऐसा है तो अनावश्यक रूप से झगड़ना नहीं चाहिए। जिस सांसद से जाति पूछी गई थी, उसको एक बार किसी कार्यक्रम में कपड़ों के ऊपर जनेऊ पहने हुए घूमते देखा गया था, संभवत वह अपने को सवर्ण घोषित करना चाहते हों।उदाहरण के लिए यदि किसी की माता ईसाई हैं, और पिता के पूर्वज पारसी थे, तो उसकी जाति क्या बताई जाएगी? क्योंकि न तो ईसाई धर्म में जाति प्रथा होती है, और न पारसियों में। अतः संतान की जाति बताना संभव नहीं होगा। कई बार वरिष्ठ सांसद अपने को भविष्यवक्ता बताने का प्रयास करते हैं, जब वह कहते हैं, "अगली बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेगाÓ या फिर Òयह सरकार अगले साल नहीं रहेगीÓ मानो वह कोई भविष्य दृष्टा हों, लेकिन उनसे कोई मीडियाकर्मी यह नहीं पूछता कि आपके पास क्या सबूत है? आपको कैसे पता चला कि अगले साल यह सरकार नहीं रहेगी? कई बार विपक्षीयह कहते सुने गए कि जल्दी ही आर्थिक परेशानियों की सुनामी आने वाली है, या फिर वह कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने देश को डोनाल्ड ट्रंप के हाथ बेच दिया है। मैंने सुना था एक चिड़िया टिड्डी अपने पैर ऊपर उठा कर सोती है, जब दूसरी चिड़िया ने पूछा तुम ऐसा क्यों करती हो, तो उसने कहा आसमान गिरने वाला है, मेरे अंडे फूट जायेंगे। अब आप सोचिए कि ऐसे भविष्य वक्ता की भविष्यवाणी का क्या करना चाहिए?
एक बार एक सांसद महंगाई पर बात कर रहे थे, और उनका कहना था कि वर्तमान सरकार के आने के बाद विदेशी कर्ज़ का बोझ बढ़ा है, लेकिन विकास दर और सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ाने के लिए अनेक बार छोटे बड़े सभी देशों को कर्ज़ लेना पड़ता है। महंगाई का विषय मांग और पूर्ति पर निर्भर है, और मुझे याद है 1952 में रफी अहमद किदवई जब रसद मंत्री थे, तो मेरे घर से ₹1 का चार शेर गेहूं बेचा गया था। बाद के वर्षों में नेहरुवीयन अर्थव्यवस्था के कारण 60 के दशक में देश भुखमरी की कगार पर पहुंच गया था।1971-72 में ₹1 का दो शेर गेहूं बिकता था और आज की तारीख में ₹26 का 1 किलो बिकता है। इससे यह नतीजा नहीं निकलता कि महंगाई के लिए तत्कालीन सरकार जिम्मेदार थी।
संसदीय चर्चा तथ्यात्मक होनी चाहिए और पढ़े लिखे लोगों के स्तर की होनी चाहिए, लेकिन आज की संसद में कोई भी तर्क अपने विरोधी को असहज करता है तो उसका प्रयोग जरूर किया जाता है।सबसे नकारात्मक दृश्य तो तब देखने को मिलता है जब दिन प्रति दिन और सप्ताह प्रति सप्ताह, बीतते चले जाते हैं, सांसदों की हाज़िरी लगती है, उनकी तनख्वाह और पेंशन बनती है, लेकिन काम कुछ नहीं करते। क्या सरकारी नौकर ऐसा कर सकते हैं? ऊपर से यह तर्क दिया जाता है कि संसद चलाना सत्ता पक्ष का काम है, शायद उन लोगों को एक ही तरीका मालूम है जो इंदिरा गांधी ने 1975 में संसद चलाने के लिए अपनाया था। मैं नहीं समझता कि वह तरीका देशवासियों को पसंद आएगा। आज का विपक्ष यह कहता है कि वर्तमान सरकार तानाशाही कर रही है, लेकिन उन सांसदों ने शायद अपने देश में, न विदेश में तानाशाही देखी। यदि सचमुच तानाशाही होती तो संसद में या संसद के बाहर उच्छृंखल व्यवहार देखने को न मिलता। आज कल ऐसा व्यवहार देखने को मिलता है जिसमे प्रधानमंत्री को मौत का सौदागर कहा जाता है और उसकी माँ को अपशब्द तथा उसकी डिग्रियों को फर्ज़ी बताया जाता है, तो शायद तानाशाही में यह सब कहना संभव नहीं होता। हमे ध्यान रहना चाहिए कि डिग्री और प्रसाशनिक क्षमता में कोई सीधा संबंध नहीं है, और न तो एमएलए,एमपी,मंत्री अथवा प्रधानमंत्री बनने के लिए कोई न्यूनतम शिक्षा रखी गई है।उस समय तो नेहरू ने वोटिंग के लिए भी शैक्षिक योग्यता की आवश्यकता को नहीं माना था। देश के जाने माने नेता और कांग्रेस अध्यक्ष कामराज नादर केवल कक्षा सात पास थे और कुशल प्रशाशक थे। यदि किसी प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में चुनाव को वोट चोरी, चुनाव आयुक्तों को सत्ता का पक्षधर, इडी और सीवीआई को पक्षपाती तथा न्यायालय पर अविश्वास किया जाए तो संसदीय प्रणाली और प्रजातंत्र पर भरोसा कैसे बचेगा?
एक बार 60 के दशक में कनाडा में चुनाव हो रहे थे पियर एलियट ट्रूडो, जो प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे, वह भी चुनाव लड़ रहे थे। वोटरों में बहुत उत्साह था और देशी-विदेशी पत्रकार रिपोर्टिंग कर रहे थे। एक कनेडियन पत्रकार ने रुसी पत्रकार से पूछा था, क्या आपके यहां प्रजातंत्र है? उसने कहा, हां हैं। कनेडियन पत्रकार ने फिर पूछा, आपके यहां कैसा प्रजातंत्र है? तो रुसी पत्रकार ने कहा, "नाइस एंड पीस फुल" तो क्या हमारे देश के नेता रूस जैसा प्रजातंत्र चाहेंगे?
सांसदों द्वारा गैर-जिम्मेदार बयान तब आता है, जब वह ईवीएम मशीन को दोषी ठहराते हुए बैलट पेपर द्वारा चुनाव कराने की वकालत करते हैं और भूल जाते हैं कि आखिर बैलट पेपर द्वारा चुनाव होते थे बैलेट लूटे जाते थे, बूथ कैप्चरिंग होती थी, कब्जा करके पर्चियों पर ठप्पे लगा दिए जाते थे। जो आज विपक्ष में हैं, उन्हीं के द्वारा वैलेट पेपर समाप्त करके ईवीएम मशीन लाई गई थीं। क्या हमारे सांसद उसी प्रकार का लठ्ठमार प्रजातंत्र फिर से चाहते हैं? ईवीएम मशीन को ही दोष नहीं दिया जाता, बल्कि चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव अधिकारी, सीबीआई, पुलिस आयकर विभाग, अदालत, सब के सब दोषी बताए जाते हैं। आखिर ना तो कोई सबूत है, और ना कोई प्रमाण। पता नहीं यह सांसद और संसदीय पार्टियां किस प्रकार का प्रजातंत्र चाहते हैं?
जब तक पक्ष और विपक्ष एक दूसरे का सम्मान करना नहीं सीखेगा, जब तक यह भाव नहीं आएगा, उन्हें संसद भेजने वाली जनता उनसे कुछ अपेक्षाएं रखती है और उनको पूरा करने का यह तरीका नहीं है, तब तक प्रजातंत्र स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। सांसद और संसदीय प्रणाली के लिए कोई बाहरी आदर्श नहीं पेश किया जा सकता,80 साल के बाद भी यदि हम संसदीय प्रणाली के लिए आदर्श खोजें, तो उसे खोज पाना संभव नहीं होगा। हमारे देश के अपने पुराने सत्ताधारी नेता विपक्ष के मूर्धन्य नेता और विपक्षी पार्टियां हमारा आदर्श होनी चाहिए, लेकिन यह समझ से परे है कि अपने ही दलों के पुराने नेताओं और सिद्धांतों का हम सम्मान और आदर नहीं कर पा रहे हैं। आशा की जानी चाहिए कि आज के शेखचिल्ली नेता मुंगेरीलाल के सपने न देखकर धरातल की सच्चाई को स्वीकारते हुए व्यवहारिक नजरिया अपनाएंगे।संसद को बाधित करके गरीब जनता का पैसा बर्बाद नहीं करेंगे।
एक जमाना था जब संसद कीकार्यवाही का स्तर इतना ऊंचा होता था कि सत्ता पक्ष और विपक्ष परस्पर सम्मान भाव से काम करते थे। एक बार संसद में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत की जनता की प्रतिव्यक्ति रोजानाआमदनी तीन आना है, जिस पर सत्ता पक्ष विफर गया, और अगले दिन सत्ता पक्ष ने कहा, तेरह आना प्रतिदिन की है। लोहिया फिर भी नहीं माने और कहा कि हम इसे प्रमाणित कर सकते हैं। अगले दिन सत्ता पक्ष ने पांच आने प्रतिदिन की आय स्वीकार की। इसके बाद लोहिया ने इस विषय को आगे नहीं बढ़ाया, क्योंकि पांच आना और तीन आना में बहुत अंतर नहीं था। इसी तरह, अटल बिहारी बाजपेई ने विदेश नीति पर चर्चा के दौरान तर्कपूर्ण ढंग से भारत की विदेश नीति पर अनेक सवाल उठाए थे और नेहरू के साथ एक प्रकार से तीखी बहस भी हुई थी, लेकिन सत्र के बाद किसी कार्यक्रम में जब अटल बिहारी बाजपेई नेहरू से मिले, तो नेहरू ने न केवल उनके भाषण की प्रशंसा की, बल्कि किसी अतिथि से परिचय कराते हुए उन्हें भावी प्रधानमंत्री भी कह दिया था।
उस समय संसद में और संसद के बाहर भी, नेताओं की भाषा संतुलित और संयमित हुआ करती थी।एक दूसरे का सम्मान होता था, और कभी भी तू-तू, मैं-मैं नहीं होती थी। भले ही तीखी बहस जरूर होती थी। आजकल जब हम सुनते हैं विपक्षी नेता कहते हैं,Òमोदी अगली बारप्रधानमंत्री नहीं रहेगा" मानो घर के चपरासी के बारे में बात हो रही हो। किसी व्यक्ति की भाषा उसके संस्कारों की अभिव्यक्ति होती है, और तब में और अब में संस्कारों का अंतरदेखा जा सकता है।
आज संसद में सांसद बच्चों की तरह से झगड़ते हैं, एक सांसद ने दूसरे की जात पूछ दी, तो तीसरा बोला,"तुमने जाति कैसे पूछी?"। यह तिरस्कारपूर्ण बहस का मुद्दा बन गया। अब सोने की बात है कि जब जातीय मतगणना होनी है तो बिना जाति पूछे गड़ना कैसे होगी? उस पर यदि चर्चा हो रही हो, तो एक उदाहरण यह बनता है कि कभी-कभी हर परिस्थिति में जाति बताना संभव ही नहीं होगा और यदि ऐसा है तो अनावश्यक रूप से झगड़ना नहीं चाहिए। जिस सांसद से जाति पूछी गई थी, उसको एक बार किसी कार्यक्रम में कपड़ों के ऊपर जनेऊ पहने हुए घूमते देखा गया था, संभवत वह अपने को सवर्ण घोषित करना चाहते हों।उदाहरण के लिए यदि किसी की माता ईसाई हैं, और पिता के पूर्वज पारसी थे, तो उसकी जाति क्या बताई जाएगी? क्योंकि न तो ईसाई धर्म में जाति प्रथा होती है, और न पारसियों में। अतः संतान की जाति बताना संभव नहीं होगा। कई बार वरिष्ठ सांसद अपने को भविष्यवक्ता बताने का प्रयास करते हैं, जब वह कहते हैं, "अगली बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेगाÓ या फिर Òयह सरकार अगले साल नहीं रहेगीÓ मानो वह कोई भविष्य दृष्टा हों, लेकिन उनसे कोई मीडियाकर्मी यह नहीं पूछता कि आपके पास क्या सबूत है? आपको कैसे पता चला कि अगले साल यह सरकार नहीं रहेगी? कई बार विपक्षीयह कहते सुने गए कि जल्दी ही आर्थिक परेशानियों की सुनामी आने वाली है, या फिर वह कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने देश को डोनाल्ड ट्रंप के हाथ बेच दिया है। मैंने सुना था एक चिड़िया टिड्डी अपने पैर ऊपर उठा कर सोती है, जब दूसरी चिड़िया ने पूछा तुम ऐसा क्यों करती हो, तो उसने कहा आसमान गिरने वाला है, मेरे अंडे फूट जायेंगे। अब आप सोचिए कि ऐसे भविष्य वक्ता की भविष्यवाणी का क्या करना चाहिए?
एक बार एक सांसद महंगाई पर बात कर रहे थे, और उनका कहना था कि वर्तमान सरकार के आने के बाद विदेशी कर्ज़ का बोझ बढ़ा है, लेकिन विकास दर और सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ाने के लिए अनेक बार छोटे बड़े सभी देशों को कर्ज़ लेना पड़ता है। महंगाई का विषय मांग और पूर्ति पर निर्भर है, और मुझे याद है 1952 में रफी अहमद किदवई जब रसद मंत्री थे, तो मेरे घर से ₹1 का चार शेर गेहूं बेचा गया था। बाद के वर्षों में नेहरुवीयन अर्थव्यवस्था के कारण 60 के दशक में देश भुखमरी की कगार पर पहुंच गया था।1971-72 में ₹1 का दो शेर गेहूं बिकता था और आज की तारीख में ₹26 का 1 किलो बिकता है। इससे यह नतीजा नहीं निकलता कि महंगाई के लिए तत्कालीन सरकार जिम्मेदार थी।
संसदीय चर्चा तथ्यात्मक होनी चाहिए और पढ़े लिखे लोगों के स्तर की होनी चाहिए, लेकिन आज की संसद में कोई भी तर्क अपने विरोधी को असहज करता है तो उसका प्रयोग जरूर किया जाता है।सबसे नकारात्मक दृश्य तो तब देखने को मिलता है जब दिन प्रति दिन और सप्ताह प्रति सप्ताह, बीतते चले जाते हैं, सांसदों की हाज़िरी लगती है, उनकी तनख्वाह और पेंशन बनती है, लेकिन काम कुछ नहीं करते। क्या सरकारी नौकर ऐसा कर सकते हैं? ऊपर से यह तर्क दिया जाता है कि संसद चलाना सत्ता पक्ष का काम है, शायद उन लोगों को एक ही तरीका मालूम है जो इंदिरा गांधी ने 1975 में संसद चलाने के लिए अपनाया था। मैं नहीं समझता कि वह तरीका देशवासियों को पसंद आएगा। आज का विपक्ष यह कहता है कि वर्तमान सरकार तानाशाही कर रही है, लेकिन उन सांसदों ने शायद अपने देश में, न विदेश में तानाशाही देखी। यदि सचमुच तानाशाही होती तो संसद में या संसद के बाहर उच्छृंखल व्यवहार देखने को न मिलता। आज कल ऐसा व्यवहार देखने को मिलता है जिसमे प्रधानमंत्री को मौत का सौदागर कहा जाता है और उसकी माँ को अपशब्द तथा उसकी डिग्रियों को फर्ज़ी बताया जाता है, तो शायद तानाशाही में यह सब कहना संभव नहीं होता। हमे ध्यान रहना चाहिए कि डिग्री और प्रसाशनिक क्षमता में कोई सीधा संबंध नहीं है, और न तो एमएलए,एमपी,मंत्री अथवा प्रधानमंत्री बनने के लिए कोई न्यूनतम शिक्षा रखी गई है।उस समय तो नेहरू ने वोटिंग के लिए भी शैक्षिक योग्यता की आवश्यकता को नहीं माना था। देश के जाने माने नेता और कांग्रेस अध्यक्ष कामराज नादर केवल कक्षा सात पास थे और कुशल प्रशाशक थे। यदि किसी प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में चुनाव को वोट चोरी, चुनाव आयुक्तों को सत्ता का पक्षधर, इडी और सीवीआई को पक्षपाती तथा न्यायालय पर अविश्वास किया जाए तो संसदीय प्रणाली और प्रजातंत्र पर भरोसा कैसे बचेगा?
एक बार 60 के दशक में कनाडा में चुनाव हो रहे थे पियर एलियट ट्रूडो, जो प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे, वह भी चुनाव लड़ रहे थे। वोटरों में बहुत उत्साह था और देशी-विदेशी पत्रकार रिपोर्टिंग कर रहे थे। एक कनेडियन पत्रकार ने रुसी पत्रकार से पूछा था, क्या आपके यहां प्रजातंत्र है? उसने कहा, हां हैं। कनेडियन पत्रकार ने फिर पूछा, आपके यहां कैसा प्रजातंत्र है? तो रुसी पत्रकार ने कहा, "नाइस एंड पीस फुल" तो क्या हमारे देश के नेता रूस जैसा प्रजातंत्र चाहेंगे?
सांसदों द्वारा गैर-जिम्मेदार बयान तब आता है, जब वह ईवीएम मशीन को दोषी ठहराते हुए बैलट पेपर द्वारा चुनाव कराने की वकालत करते हैं और भूल जाते हैं कि आखिर बैलट पेपर द्वारा चुनाव होते थे बैलेट लूटे जाते थे, बूथ कैप्चरिंग होती थी, कब्जा करके पर्चियों पर ठप्पे लगा दिए जाते थे। जो आज विपक्ष में हैं, उन्हीं के द्वारा वैलेट पेपर समाप्त करके ईवीएम मशीन लाई गई थीं। क्या हमारे सांसद उसी प्रकार का लठ्ठमार प्रजातंत्र फिर से चाहते हैं? ईवीएम मशीन को ही दोष नहीं दिया जाता, बल्कि चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव अधिकारी, सीबीआई, पुलिस आयकर विभाग, अदालत, सब के सब दोषी बताए जाते हैं। आखिर ना तो कोई सबूत है, और ना कोई प्रमाण। पता नहीं यह सांसद और संसदीय पार्टियां किस प्रकार का प्रजातंत्र चाहते हैं?
जब तक पक्ष और विपक्ष एक दूसरे का सम्मान करना नहीं सीखेगा, जब तक यह भाव नहीं आएगा, उन्हें संसद भेजने वाली जनता उनसे कुछ अपेक्षाएं रखती है और उनको पूरा करने का यह तरीका नहीं है, तब तक प्रजातंत्र स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। सांसद और संसदीय प्रणाली के लिए कोई बाहरी आदर्श नहीं पेश किया जा सकता,80 साल के बाद भी यदि हम संसदीय प्रणाली के लिए आदर्श खोजें, तो उसे खोज पाना संभव नहीं होगा। हमारे देश के अपने पुराने सत्ताधारी नेता विपक्ष के मूर्धन्य नेता और विपक्षी पार्टियां हमारा आदर्श होनी चाहिए, लेकिन यह समझ से परे है कि अपने ही दलों के पुराने नेताओं और सिद्धांतों का हम सम्मान और आदर नहीं कर पा रहे हैं। आशा की जानी चाहिए कि आज के शेखचिल्ली नेता मुंगेरीलाल के सपने न देखकर धरातल की सच्चाई को स्वीकारते हुए व्यवहारिक नजरिया अपनाएंगे।संसद को बाधित करके गरीब जनता का पैसा बर्बाद नहीं करेंगे।