सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाले देश में गांव के बच्चों के लिए फिल्मों का अकाल क्यों है

सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाले देश में गांव के बच्चों के लिए फिल्मों का अकाल क्यों है

एक ओर भारत एक साल में सबसे ज्यादा फिल्मों के निर्माण के लिये प्रसिद्ध है, हर साल अलग-अलग भाषाओं में लगभग 1000 फिल्में यहां बनती हैं। लेकिन हमारे बच्चे 8-10 अच्छी बाल फिल्मों के लिए भी तरस जाते हैं। शहरी बच्चे तो फिर भी पिक्चर हॉल में विदेशी बाल फिल्में या नेट फ्लिक्स पर एनिमेशन फिल्में देख लेते हैं। नगर कस्बाई और ग्रामीण बच्चों के लिए यह सुविधा उपलब्ध नहीं है।

चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी भी बाल फिल्मों के विकास में अपना कुछ खास योगदान नहीं दे सकी।

मुख्यधारा के फिल्मकार तो आजकल बच्चों की फिल्में बनाने में जरा भी रुचि नहीं रखते। पर 60 और 70 के दशक में ऐसा नहीं था‚ तब मुख्यधारा के फिल्मकार बाल फिल्में बनाते थे‚ और वे हिट भी हुआ करती थीं‚ जैसे 'बूटपॉलिश'‚ 'नन्हा फरिश्ता'‚ 'रानी और लाल परी'‚ 'दो कलियां' आदि। 'अंजली' की सफलता को भी नकारा नहीं जा सकता। बाद में राकेश रोशन ने बनाई 'जादू' अमिताभ बच्चन को लेकर बनी भूतनाथ। मगर आजकल जो गिनी चुनी ग्रामीण परिवेश वाली छोटी और कम बजट की बाल फिल्में फिल्म फेस्टिवल्स के लिए बनती हैं वितरक उनके प्रदर्शन का जोखिम तक नहीं उठाना चाहते। यही कारण है कि बनी बनाई कुछ अच्छी बाल फिल्में भी हमारे बच्चों तक पहुंच ही न सकीं। बाल फिल्म को बहुत अधिक उपदेशात्मक न होकर मनोरंजक और संगीतमय होना चाहिए तभी बच्चे फिल्म पसंद करेंगे।

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चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी भी बाल फिल्मों के विकास के आन्दोलन में अपना कुछ खास योगदान नहीं दे सकी। हालांकि भारत में हर दूसरे साल बाल फिल्मों का अंतर्राष्टीय समारोह भी आयोजित होता है किन्तु वह महज हैदराबाद के बच्चों तक ही सीमित होकर रह जाता है। भारत से बाहर जो रुचिकर बाल फिल्में बनती हैं उनसे हमारे देश के अधिकतर बच्चे वंचित रह जाते हैं। बेहतर हो विदेशी भाषा की अच्छी बाल फिल्मों की भारतीय भाषाओं में डबिंग हो।

इस बार मैं नेशनल फिल्म अवार्ड्स ( नॉन फीचर) की ज्यूरी में थी। जो 200 शॉर्ट फिल्में हमने देखीं उनमें अधिकतर बच्चों पर थीं। एक से एक कमाल और उस पर भी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर अलग-अलग अंदाज के साथ....श्रेष्ठ शॉर्ट फिल्म "पावसाचा निबंध" (बारिश का निबंध) ऐसी ही एक अद्भुत फिल्म थी। उसकी टक्कर में अनेक फिल्में थीं मगर उन फिल्मों का सार्थक उपयोग होना चाहिये। ये फिल्में टीवी पर दिखाई जाएं, इनमें से कुछ यूट्यूब पर होंगी मगर आज भी भारत के हर बच्चे की पहुंच यूट्यूब तक नहीं है।

'गूपी गाईन बाघा बाईन' सत्यजीत रे की एक उम्दा बाल फिल्म थी।

मेरे ख्याल से ग्रामीण इलाकों में भी फिल्म फेस्टिवल लगने चाहिए.... खासतौर से बाल फिल्म फेस्टिवल। मुझे याद है हम छोटे थे तो एक गाड़ी आया करती थी जो फिल्में दिखाती थी अब मुझे लगता है वह चलन बंद हो चुका है।

छोटे और क्षेत्रीय फिल्मकार अच्छी छोटी बाल फिल्में बना रहे हैं मगर वे दर्शकों तक पहुंच नहीं पा रही हैं। इस समस्या का समाधान होना चाहिए चाहिए। फिल्म बनी है तो उसे उसके दर्शक मिलें और बाल फिल्मों के लिए दर्शक हैं तो उन्हें देखने को फिल्में मिले।

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बाल फिल्मों के अतीत पर नज़र डालें तो पहले बनीं कुछ बाल फिल्मों ने अपनी सफलता के झंडे गाड़े हैं। 1956 में बनी चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी की पहली फिल्म 'जलदीप' को वेनिस के अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का अवार्ड मिला था। 'गूपी गाईन बाघा बाईन' सत्यजीत रे की एक उम्दा बाल फिल्म थी। यह एक अच्छी हिट बांग्ला फिल्म साबित हुई। अन्नू कपूर द्वारा निर्मित 'अभय' को 1994 में सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी के सहयोग से निर्मित फिल्म 'आज का रॉबिनहुड' को भी बच्चों ने खूब पसन्द किया था।

बाल फिल्में ज्यादातर हिट होती हैं फिर भी मुख्यधारा के फिल्मकार इन फिल्मों के निर्माण से क्यों दूर भागते हैं? वे क्यों कतराते हैं कम बजट की साधारण सी फिल्मों से? व्यवसायिक फिल्मों में उलझे वितरक अच्छी खासी बनी बाल फिल्म के प्रदर्शन में ज़रा दिलचस्पी नहीं लेते यही वजह है कि हमारे देश के बच्चे ऐसी कई उम्दा फिल्मों को देखने से वंचित रह जाते हैं।

पता नहीं कमी कहां है? जब बच्चों में रुचि कायम है और अच्छे फिल्मकारों की कमी नहीं और अच्छी बाल फिल्में व्यवसाय भी कर ही लेती हैं तब भी… दरअसल बाल फिल्म को बहुत अधिक उपदेशात्मक न होकर मनोरंजक और संगीतमय होना चाहिये तभी बच्चे फिल्म पसन्द करेंगे। माता पिता भी चाहते हैं कि बाल फिल्म ऐसी हो कि जिसे बच्चे और बड़े दोनों देख सकें ताकि उन्हें सिनेमा हॉल में बच्चों के साथ बोर न होना पड़े।

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वही बाल फिल्में सशक्त और सफल साबित होती हैं जिनमें अच्छी प्रवाहमय कहानी हो पात्र दिलचस्प हों‚ संगीत अगर हो तो मोहक और सरल हो‚ धुनें बच्चे पकड़ सकें। सन्देश और उपदेश अपने आप ही कहानी के माध्यम से उभरें, थोपा हुआ न लगे। सबसे ज़रूरी है कि इन फिल्मों को देश के लगभग सभी शहरों के दर्शकों तक पहुंचाने के सफल प्रयास हों, तभी अच्छी बाल फिल्में हमारे बालदर्शकों तक पहुंच सकेंगी और वे अच्छे स्वस्थ मनोरंजन और घटिया स्तरहीन मनोरंजन में फर्क जान सकेंगे।

(मनीषा कुलश्रेष्ठ हिंदी की लोकप्रिय कथाकार हैं। गांव कनेक्शन में उनका यह कॉलम अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने की उनकी कोशिश है। अपने इस कॉलम में वह गांवों की बातें, उत्सवधर्मिता, पर्यावरण, महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगी।)

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