'बस एक और रील...' की आदत पड़ सकती है भारी, आपके दिमाग का संतुलन बिगाड़ रही Doomscrolling, जानिए बचाव के तरीके
Gaon Connection | Jun 08, 2026, 17:11 IST
डूमस्क्रॉलिंग यानी देर रात तक सोशल मीडिया पर लगातार नकारात्मक खबरें, रील्स और वीडियो देखते रहना, मानसिक स्वास्थ्य और नींद पर बुरा असर डाल सकता है। विशेषज्ञ के अनुसार यह आदत तनाव, एंग्जायटी, डिप्रेशन और एकाग्रता में कमी का कारण बन सकती है। इससे बचने के लिए सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करना और सकारात्मक दिनचर्या अपनाना जरूरी है।
Doomscrolling का दिमाग पर पड़ रहा गहरा असर
"बस एक और स्क्रॉल, बस एक और रील, बस एक और वीडियो..." - अगर यह वाक्य आपको अपना-सा लगता है, तो आप अकेले नहीं हैं। आज के डिजिटल दौर में लाखों लोग रात को सोने से पहले कुछ मिनट के लिए फोन उठाते हैं लेकिन देखते ही देखते ये कुछ मिनट घंटों में बदल जाते हैं। सोशल मीडिया की अंतहीन फीड, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, वायरल वीडियो और हर पल बदलती खबरें हमें स्क्रीन से बांधे रखती हैं। नतीजा यह होता है कि नींद का समय पीछे खिसकता जाता है और हमारा दिमाग देर रात तक सक्रिय बना रहता है।
हम जानते हैं कि देर रात तक फोन चलाने से नींद प्रभावित होती है, लेकिन बहुत कम लोग यह समझते हैं कि लगातार स्क्रॉल करते रहना, खासकर नकारात्मक खबरें और तनाव बढ़ाने वाला कंटेंट देखना, हमारे दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर कितना गहरा असर डाल सकता है। यह आदत न केवल हमारी नींद खराब करती है, बल्कि दिमाग में मौजूद महत्वपूर्ण हार्मोन्स और रसायनों के संतुलन को भी बिगाड़ सकती है, जिससे तनाव, चिंता और मानसिक थकान बढ़ने लगती है। इसी आदत को आजकल डूमस्क्रॉलिंग (Doomscrolling) कहा जाता है। आइए समझते हैं कि डूमस्क्रॉलिंग आखिर है क्या, यह हमारे दिमाग पर कैसे असर डालती है और इससे बचने के लिए हम क्या कर सकते हैं।
इसका मतलब है इंटरनेट पर लगातार नकारात्मक या परेशान करने वाली चीज़ें देखते रहना, खासकर रात के समय। सोचिए — डराने वाली खबरें, दुखद घटनाएँ, तीखी बहसें, और चिंता बढ़ाने वाले अपडेट्स, सब कुछ एक ऐसी फीड में भरा हुआ है जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। इंस्टाग्राम, ट्विटर, टिकटॉक जैसे ऐप्स की बनावट ही ऐसी है कि वे आपको घंटों तक अपने से चिपकाकर रखना चाहते हैं। इससे आपको समय का पता भी नहीं चलता।
रात में देर तक फ़ोन का इस्तेमाल करने से हमारे दिमाग के इन महत्वपूर्ण हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है:
मेलाटोनिन (Melatonin) – जो नींद लाने में मदद करता है।
सेरोटोनिन (Serotonin) – जो मूड और मानसिक संतुलन बनाए रखता है।
डोपामाइन (Dopamine) – जो खुशी और अच्छा महसूस कराने से जुड़ा होता है।
कोर्टिसोल (Cortisol) – जिसे तनाव का हार्मोन भी कहा जाता है।
NIMHANS बेंगलुरु के जूनियर रेजिडेंट (साइकाइट्री) डॉ. अर्जुन सारस्वत (MBBS) ने बताया, "रात को देर तक फोन चलाने से हमारी आँखों के पर्दे पर रोशनी देर तक पड़ती रहती है जिस कारण हमारे दिमाग का वो भाग जो नींद पर नियंत्रण रखता है, दिन और रात के बीच का अंतर नहीं समझ पाता। रात को देर से नींद आने के कारण Anxiety, Depression जैसे मानसिक रोगों का रिस्क बढ़ सकता है। नई रिसर्च में यह भी पाया जा रहा है कि टिकटॉक या इंस्टाग्राम रील बार-बार देखने से दिमाग की एकाग्रता करने की क्षमता घटती है, और इस कारण बच्चों को पढ़ने में भी दिक्कत आ सकती है।"
अगर आपने कभी खुद से कहा है, "बस एक और स्क्रॉल...", तो आप अकेले नहीं हैं। रात में फ़ोन चलाने की लत लगने के बहुत सारे कारण हैं, जैसे कि:
1. अगला क्या मिलेगा, इसकी उत्सुकता (Variable Rewards): आपको कभी नहीं पता होता कि अगली पोस्ट या वीडियो में क्या मिलने वाला है, और यही उत्सुकता आपको स्क्रॉल करते रहने पर मजबूर करती है।
2. कुछ छूट जाने का डर (FOMO): आपको लगता है कि अगर आप स्क्रॉल करना बंद कर देंगे, तो कोई ज़रूरी खबर या अपडेट मिस हो जाएगा।
3. भावनात्मक उत्तेजना: नकारात्मक या चौंकाने वाली खबरें हमारे दिमाग पर सामान्य कंटेंट की तुलना में ज़्यादा असर डालती हैं और हमारी भावनाओं को अधिक उकसाती हैं। धीरे-धीरे आपका दिमाग इसी तरह तैयार हो जाता है कि वह बार-बार नई जानकारी की तलाश में स्क्रॉल करता रहे।
अच्छी बात यह है कि इसका समाधान कोई बहुत बड़ा या मुश्किल बदलाव नहीं है। बस अपनी कुछ आदतों में ये छोटे-छोटे बदलाव करने की ज़रूरत है:
अच्छी बात यह है कि डूमस्क्रॉलिंग से बचने के लिए किसी बड़े बदलाव की जरूरत नहीं होती। अपनी दिनचर्या में कुछ छोटी-छोटी आदतें शामिल करके आप अपनी नींद, मानसिक स्वास्थ्य और एकाग्रता में बड़ा सुधार ला सकते हैं। सोने से पहले डूमस्क्रॉलिंग भले ही एक मामूली आदत लगे, लेकिन यह चुपचाप आपकी नींद, मानसिक स्वास्थ्य और दिमागी कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। यह तनाव बढ़ाने के साथ-साथ उन हार्मोन्स के संतुलन को भी बिगाड़ देती है जो अच्छी नींद और मानसिक शांति के लिए जरूरी होते हैं। इसलिए अपने फोन के इस्तेमाल की कुछ सीमाएं तय कीजिए, अपनी आदतों के प्रति सजग बनिए और अपने दिमाग को वह आराम दीजिए जिसकी उसे वास्तव में जरूरत है। क्योंकि कई बार अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छा काम बहुत सरल होता है—फोन को एक तरफ रख दीजिए और खुद को आराम करने दीजिए।
इनपुट: गौरी सारस्वत (इंटर्न)
हम जानते हैं कि देर रात तक फोन चलाने से नींद प्रभावित होती है, लेकिन बहुत कम लोग यह समझते हैं कि लगातार स्क्रॉल करते रहना, खासकर नकारात्मक खबरें और तनाव बढ़ाने वाला कंटेंट देखना, हमारे दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर कितना गहरा असर डाल सकता है। यह आदत न केवल हमारी नींद खराब करती है, बल्कि दिमाग में मौजूद महत्वपूर्ण हार्मोन्स और रसायनों के संतुलन को भी बिगाड़ सकती है, जिससे तनाव, चिंता और मानसिक थकान बढ़ने लगती है। इसी आदत को आजकल डूमस्क्रॉलिंग (Doomscrolling) कहा जाता है। आइए समझते हैं कि डूमस्क्रॉलिंग आखिर है क्या, यह हमारे दिमाग पर कैसे असर डालती है और इससे बचने के लिए हम क्या कर सकते हैं।
आखिर ये Doomscrolling है क्या?
हमारे दिमाग के महत्वपूर्ण हार्मोन्स पर असर:
मेलाटोनिन (Melatonin) – जो नींद लाने में मदद करता है।
सेरोटोनिन (Serotonin) – जो मूड और मानसिक संतुलन बनाए रखता है।
डोपामाइन (Dopamine) – जो खुशी और अच्छा महसूस कराने से जुड़ा होता है।
कोर्टिसोल (Cortisol) – जिसे तनाव का हार्मोन भी कहा जाता है।
Doomscrolling का असर
क्यों है Doomscrolling रोकना इतना मुश्किल?
1. अगला क्या मिलेगा, इसकी उत्सुकता (Variable Rewards): आपको कभी नहीं पता होता कि अगली पोस्ट या वीडियो में क्या मिलने वाला है, और यही उत्सुकता आपको स्क्रॉल करते रहने पर मजबूर करती है।
2. कुछ छूट जाने का डर (FOMO): आपको लगता है कि अगर आप स्क्रॉल करना बंद कर देंगे, तो कोई ज़रूरी खबर या अपडेट मिस हो जाएगा।
3. भावनात्मक उत्तेजना: नकारात्मक या चौंकाने वाली खबरें हमारे दिमाग पर सामान्य कंटेंट की तुलना में ज़्यादा असर डालती हैं और हमारी भावनाओं को अधिक उकसाती हैं। धीरे-धीरे आपका दिमाग इसी तरह तैयार हो जाता है कि वह बार-बार नई जानकारी की तलाश में स्क्रॉल करता रहे।
फ़ोन को दूर रखिए, अच्छी नींद को करीब लाइए
- रात को सोने से करीब 30-60 मिनट पहले अपने फोन और सोशल मीडिया से दूरी बना लें। उसका इस्तेमाल करने का लालच न आए, इसके लिए फ़ोन को खुद से दूर चार्ज करें।
- अगर आप फोन चला भी रहे हैं, तो बुरी या डरावनी खबरों के बजाय कुछ हल्का-फुल्का, मजेदार या पॉजिटिव कंटेंट देखें।
- सोने से पहले स्क्रीन देखने की जगह कोई अच्छी किताब पढ़ें, धीमा और शांत म्यूज़िक सुनें, या फिर थोड़ी स्ट्रेचिंग और गहरी सांसें लें। इससे आपके दिमाग को सुकून मिलेगा।
- रोज़ सोने और जागने का एक पक्का समय तय करें। रात को सोने से एक घंटा पहले कमरे की लाइट्स धीमी कर दें।
- देर रात भारी खाना खाने से बचें, ताकि आपको एक गहरी और अच्छी नींद आ सके।
छोटे बदलाव, बड़ा फायदा
इनपुट: गौरी सारस्वत (इंटर्न)