जानिए आयुर्वेद में क्यों कहा गया है चैत्र माह में नीम का सेवन अमृत है

जानिए आयुर्वेद में क्यों कहा गया है चैत्र माह में नीम का सेवन अमृत हैनीम के फायदे जानिए।

हिन्दू नववर्ष और चैत्र माह की शुरुआत होने जा रही है और चैत्र माह का हिन्दू कैलेण्डर में विशेष महत्व तो है, लेकिन ग्रामीण अंचलों में इसे कई मायनों में बेहद खास माना जाता है। मौसम अपनी करवट बदलता है और साथ ही गर्मियों के आगमन की खनक लगनी शुरू हो जाती है। मौसम के इस बदलाव के दौर में स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी जरूरी होता है।

हिन्दुस्तान के अनेक ग्रामीण हिस्सों में नीम वृक्ष की बहुआयामी प्रकृति, और इस मौसम में इसके महत्व को लेकर कई जानकारियां सुनने मिलती हैं। नीम की औषधीय महत्ता को कौन नहीं जानता ? संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो इसे बाकायदा ``इक्कीसवीं शताब्दी का वृक्ष`` घोषित किया है। चलिए इस लेख के जरिए आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में चैत्र माह के दौरान नीम के खास उपयोग का जिक्र और इसके कई अन्य औषधीय गुणों का जिक्र कर लिया जाए।

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चैत्र माह की शुरुआत और इसी दौरान नवरात्रि पर्व में लोग माता की भक्ति के साथ-साथ साल भर निरोगी रहने व रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए नीम के ताजे कोमल पत्तों का इस्तमाल करते हैं। ग्रामीणों के द्वारा नीम की पत्तियों का रस (1 गिलास) का सेवन प्रतिदिन पूरे चैत्र मास के दौरान किया जाता है। ऐसा करना परंपरा का हिस्सा भी है।

गुजरात प्रांत में लगभग हर कस्बे और गांव में लोग नीम की पत्तियों का रस चैत्र माह में रोज सुबह करते हैं, इन लोगों की मान्यतानुसार नीम साल भर के लिए शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के अलावा कई तरह के शारीरिक विकारों को दूर करने में मदद करता है। मौसम बदलाव के इन दिनों में सूक्ष्मजीवी संक्रमण के गुंजाइश ज्यादा होती है और नीम के एंटीबैक्टिरियल गुणों की जानकारी सदियों से हम भारतीयों को ही नहीं अपितु पूरी दुनिया को है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि नीम की पत्तियों को जोर-जोर से कुछ देर के लिए हथेली पर रगड़ लिया जाए और साफ़ पानी से हथेली धो लिया जाए, हथेली से सूक्ष्मजीवों का नाश हो जाता है यानि नीम एक हैंडवाश की तरह भी काम करता है और मजे की बात ये भी है कि इसके परिणाम बाजार में बिकने वाले किसी भी हैंडवाश से ज्यादा बेहतर हैं। नीम की निंबोलियों को सुखा लिया जाए, चूर्ण बनाकर रख लिया जाए और दाढी बनाने या हेयर रिमूव करने के बाद एक चम्मच पानी में आधा चम्मच चूर्ण/ पाउडर मिलाकर त्वचा पर रगड़ लिया जाए, आपको किसी भी एंटीसेप्टिक उत्पाद की जरूरत नहीं।

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प्राचीन आर्य ऋषियों से लेकर आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान नीम के औषधीय गुणों को मानता चला आया है। नीम व्यापक स्तर पर संपूर्ण भारत में दिखाई देता है। नीम का वानस्पतिक नाम अजाडिरक्टा इंडिका है। नीम में मार्गोसीन, निम्बिडिन, निम्बोस्टेरोल, निम्बिनिन, स्टियरिक एसिड, ओलिव एसिड, पामिटिक एसिड, एल्केलाइड, ग्लूकोसाइड और वसा अम्ल आदि पाए जाते हैं। अपने अनुभवों के आधार पर कहूँ तो आदिवासियों के दैनिक जीवन में नीम एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आदिवासियों के अनुसार नीम के पत्ते और मकोय के फ़लों का रस समान मात्रा में लेकर पलकों पर लगाने से आंखों का लालपन दूर हो जाता है।

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नीम की निबौलियों को पीसकर रस तैयार कर लिया जाए और इसे बालों पर लगाया जाए तो जूएं मर जाते हैं। गर्मियों में होने वाली घमौरियों से छुटकारा पाने के लिए नीम की छाल को घिसकर लेप तैयार कर लिया जाए और उन हिस्सों पर लगाया जाए जहाँ घमौरियां और फुंसिया हो, आराम मिल जाता है। पानी में थोड़ी सी नीम की पत्तियां डालकर नहाने से भी घमौरियां दूर हो जाती है। गले की सूजन दूर करने के लिए पातालकोट के आदिवासी नीम की पत्तियां (5 ग्राम), 4 कालीमिर्च,2 लौंग और चुटकी भर नमक को मिलाकर काढ़ा बना लेते है और रोगी को दिन में तीन बार सेवन की सलाह देते हैं। डाँग- गुजरात के आदिवासियों के अनुसार नीम के गुलाबी कोमल पत्तों को चबाकर रस चूसने से मधुमेह रोग मे आराम मिलता है। डाँग में आदिवासी लगभग 200 ग्राम नीम की पत्तियों को २ लीटर पानी में उबालते हैं और जब पानी का रंग हरा हो जाता तब उस पानी को बोतल में छान कर रख लेते है। नहाने के वक्‍त बाल्टी में 75 से 100 मिलीलीटर इस नीम के पानी को डाल दिया जाता है। इन जानकारों के अनुसार नहाने का पानी संक्रमण, मुँहासे और शरीर से पुराने दाग- धब्बों से छुटकारा दिलाता है।

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कुछ 2 बरस पहले न्युजीलैंड के माओरी आदिवासियों से चर्चा के दौरान मुझे जानने मिला कि ये आदिवासी नीम की पत्तियों के रस में दालचीनी का चूर्ण मिलाकर मधुमेह के रोगियों को देते हैं और उसके परिणाम भी काफ़ी चौंकाने वाले हैं हलाँकि इसके कोई भी क्लीनिकल और वैज्ञानिक प्रमाण अब तक मुझे देखने नहीं मिले, फिर भी इस पारंपरिक नुस्खे को आजमाने में कोई बुराई नहीं। बुंदेलखंड में आदिवासी हर्बल जानकार बवासीर जैसे कष्टकारी रोग के इलाज के लिए नीम तथा कनेर के पत्ते की समान मात्रा लेकर प्रभावित अंग में लेप की सलाह देते हैं, इनका मानना है कि ये लेप लगातार एक हप्ते तक लगाने से कष्ट कम होता जाता है।

झारखंड में जड़ी-बूटी जानकार नीम के पत्तों तथा मूंग दाल को मिलाकर पीसने की सलाह देते है और इसे हल्के से तेल के साथ तलकर बवासीर के रोगी को खिलाया जाता है जिससे अतिशीघ्र आराम मिलने लगता है। इस दौरान रोगी को भोजन में छाछ व चावल देने की बात भी की जाती है। इलाज के दौरान मसालों का प्रयोग बहुत कम किया जाए या सम्भव हो तो बिल्कुल न करें। रोज सुबह निबौलियों का सेवन करने से भी आराम मिलता है। प्रभावित अंग पर नीम का तेल भी लगाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के कोरकु आदिवासी मलेरिया में नीम के तने की अन्दर की छाल को कूटकर कांसे के बर्तन में पानी के साथ कुछ देर के लिए खौलाते हैं और फिर इसे एक कपड़े से छान लेते हैं। इन आदिवासियों के अनुसार इस पानी को यदि दिन में तीन बार मलेरिया से ग्रस्त रोगी को दिया जाए तो मलेरिया दूर हो जाता है।

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जब हमारे इर्द-गिर्द ही हमारी स्वास्थ्य समस्याओं या बेहतरी के लिए उपाय उपलब्ध हैं तो हमें अपनी जेबें ढीली करने की जरूरत क्या है? "गाँव कनेक्शन" के साथ मिलकर मेरा यही प्रयास है कि पाठकों को प्रकृति के नजदीक लाया जाए और उन्हें हिन्दुस्तानी आदिवासियों के सस्ते, सुलभ और ईको-फ़्रेंडली हर्बल फ़ार्मुलों से अवगत कराया जाए। प्रकृति से जुड़िये, स्वस्थ रहिए और मस्त रहिए..।

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