हर दिन बेहतर स्वास्थ्य का दिन हो, सिर्फ 7 अप्रैल ही क्यों?       

Deepak AcharyaDeepak Acharya   7 April 2018 1:20 PM GMT

हर दिन बेहतर स्वास्थ्य का दिन हो, सिर्फ 7 अप्रैल ही क्यों?       बस रोगी निरोगी बनें रहने की जरुरत है।

सारी दुनिया 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाती है। जब जब स्वास्थ्य की बात हो, औषधि विज्ञान की हर शाखाओं में एक बहस अक्सर होते रहती है कि कौन सा विज्ञान ज्यादा असरकारक और प्रचलित है, आधुनिक औषधि विज्ञान या परंपरागत हर्बल औषधि ज्ञान? दरअसल औषधि विज्ञान की इन दोनों शाखाओं में मरीजों को परोसने के लिए बहुत कुछ है और सवाल यह महत्वपूर्ण नहीं कि कौन सा विज्ञान अति महत्वपूर्ण है।

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मेरे खयाल से सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कौन से औषधि विज्ञान से मरीज ठीक हो रहा है, रोगमुक्त हो रहा है। औषधि विज्ञान की इन दोनों शाखाओं में एक महत्वपूर्ण संबंध है, संबंध भी परंपरागत है। सदियों से पौधों को मनुष्य ने अपने रोगनिवारण के लिए उपयोग में लाया है और विज्ञान ने समय-समय पर इन पौधों पर शोध करके उसे आधुनिकता का जामा भी पहनाया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रपट के अनुसार विकासशील देशों के 80 से अधिक प्रतिशत लोग आज भी प्राकृतिक और हर्बल चिकित्सा के द्वारा अपने रोगों का निवारण करते है। दुनिया के इतने बड़े तबके के द्वारा हर्बल औषधियों को अपनाया जाना अपने आप में एक प्रमाण है कि ये दवाएं काफी कारगर हैं।

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मजे की बात तो ये भी है कि अब विकसित देशों में भी हर्बल ज्ञान पैर पसारना शुरू कर दिया है, और उसकी वजह यह है कि इस ज्ञान पर विज्ञान का ठप्पा लगना शुरु हो गया है। सच्चाई भी यही है कि आधुनिक औषधि विज्ञान को भी दिन-प्रतिदिन नई दवाओं की जरूरत है। आधुनिक औषधि विज्ञान को एक नई दवा को बाजार में लाने में 15 से अधिक साल और करोडों रुपयों की लागत लग जाती है और अब विज्ञान की इस शाखा को पारंपरिक हर्बल ज्ञान में आशा की किरण नज़र आ रही है।

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जहाँ अनेक वर्तमान औषधियों के प्रति रोगकारकों या वाहकों (सूक्ष्मजीवों/ कीट) में प्रतिरोध विकसित हो चुका है तो वहीं दूसरी तरफ निश्चित ही आधुनिक विज्ञान को इन सूक्ष्मजीवों/ कीटों के खात्मे के लिए नयी दवाओं की आवश्यकता है और ये आवश्यकता पूर्ति 15 साल तक के लंबे इंतजार के बाद पूरी हो तो विज्ञान के लिए शर्मिंदगी की बात है और ऐसी स्थिति में पारंपरिक हर्बल ज्ञान एक नयी दिशा और सोच को जन्म देने में कारगर साबित हो सकता है। ना सिर्फ वैज्ञानिकों में नयी कारगर दवाओं को लेकर खोज की प्रतिस्पर्धा है बल्कि अनेक फार्मा कंपनियों में भी इस बात को लेकर अच्छी खासी होड़ सी लगी पड़ी है कि कितने जल्दी नयी कारगर दवाओं को बाजार में लाया जाए।

आधुनिक औषधि विज्ञान के इतिहास पर नजर मारी जाए तो समझ पड़ता है कि धीमे-धीमे ही सही लेकिन इसने पारंपरिक हर्बल ज्ञान को तवज्जो जरूर दी है। सिनकोना की छाल से प्राप्त होने वाले क्वीनोन की बात की जाए या आर्टिमिशिया नामक पौधे से प्राप्त रसायन आर्टिमिसिन की, दवाओं की प्राथमिक जानकारी आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान से ही मिली। इन दोनों दवाओं को मलेरिया के उपचार के लिए सबसे बेहतर माना गया है।

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सन 1980 तक बाजार में सिर्फ सिनकोना पौधे से प्राप्त रसायन क्वीनोन की ही बिक्री होती थी, मलेरिया रोग के उपचार में कारगर इस दवा का वर्चस्व बाजार में काफी समय तक रहा, लेकिन चीन में पारंपरिक हर्बल जानकारों द्वारा सदियों से इस्तमाल में लाए जाने वाले आर्टिमिसिया पौधे की जानकारी जैसे ही आधुनिक विज्ञान को मिली, फटाफट इस पौधे से आर्टिमिसिन रसायन को प्राप्त किया गया और झट बाजार में क्वीनोन के अलावा आर्टिमिसिन भी उपलब्ध हो गयी।

सन 2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी आर्टिमिसिन को दुनिया भर में उपचार में लाने के लिए स्वीकृति दे दी। सदियों से अपनाए जाने वाले इस नुस्खे को बाजार में आने और आम चिकित्सकों द्वारा अपनाए जाने में देरी की वजह सिर्फ यही रही कि आधुनिक विज्ञान के तथाकथित पैरवी करने वालों ने इस पर इतना भरोसा नहीं जताया। यदि चीन के पारंपरिक हर्बल जानकारों से मिलकर इस दवा के प्रभावों की प्रामाणिकता पर खुलकर बात होती, भरोसे की नींव मजबूत होती तो शायद इतना वक्त ना लगता। क्वीनोन और आर्टिमिसिन बाजार में पूरी तरह से आ पाती, उससे पहले ही खबरें आने लगीं कि आफ्रिकन मच्छरों ने दोनों दवाओं के प्रति प्रतिरोधकता विकसित कर ली है, यानि मच्छरों पर इनका खासा असर होना बंद हो चुका है।

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अब चूँकि एक सफलता हाथ आयी, भले ही कम समय के लिए, लेकिन विज्ञान भी पारंपरिक हर्बल ज्ञान का लोहा मान बैठा। आज आधुनिक विज्ञान की मदद से पारंपरिक हर्बल ज्ञान को पहचान मिलना शुरू हो रही है लेकिन आज भी अनेक लोगों के बीच हर्बल ज्ञान को लेकर भरोसे की कमी है। हलाँकि इस भरोसे की कमी के पीछे अनेक तथ्य हैं, जिनमें हर्बल दवाओं की शुद्दता, मानक माप-दंड, नकली दवाओं का बाजार में पसारा हुआ पाँव, बगैर शोध और परिक्षण हुए दवाओं का बाजारीकरण प्रमुख हैं जिन पर चर्चा किसी और लेख में करी जाएगी। फिलहाल जानते हैं कुछ ऐसे आधुनिक औषधियों के बारे में जिनका स्रोत आदिवासी या पारंपरिक हर्बल ज्ञान रहा है।

वैसे तो सैकड़ों ऐसे रसायन हैं जिन्हें पौधों से प्राप्त किया गया है और जो आज भी आधुनिक औषधियों के नाम से जाने जाते हैं और मजे की बात ये भी है कि बहुत ही कम लोग हैं जानते हैं कि ये सभी किसी ना किसी देश के आदिवासियों या पारंपरिक हर्बल ज्ञान पर आधरित हैं। लेकिन सभी रसायनों का जिक्र इस लेख में करना संभव नहीं।

अब जब कि आधुनिक विज्ञान का एक तबका पारंपरिक हर्बल ज्ञान का लोहा मानने लगा है फिर भी इस जमात में ना जाने ऐसे कितने ही लोग हैं जो आज भी पारंपरिक हर्बल ज्ञान को दकियानुसी और बकवास मानते हैं। उन्हें यह ज्ञान गैर-वैज्ञानिक, पुराना, अप्रमाणित, बेअसर और खतरनाक है। ये बात मेरी समझ से परे है कि यदि परंपरागत हर्बल ज्ञान इतना बेअसर, गैर-वैज्ञानिक और खतरनाक है तो फिर आधुनिक विज्ञान को अपनी दुकान बंद कर देनी चाहिए क्योंकि आधे से ज्यादा आधुनिक औषधियों को पौधे से प्राप्त किया जा रहा है और इन सब औषधियों के पीछे पारंपरिक ज्ञान ही वजहें रही है।

पौधों के असरकारक गुणों और आदिवासियों के सटीक ज्ञान को समझे बिना कोई इसे प्राचीन या खतरनाक कह दे तो सिवाय मुस्कुराहट के मेरे चेहरे पर आपको कुछ और नहीं दिखेगा और मुझे उस व्यक्ति की नासमझी पर सिर्फ हँसी ही आएगी.... जब बात हमारे बेहतर स्वास्थ्य की है तो हमें अपने विचारों के दायरों से बाहर आकर सोचना होगा, जो सच है उसे अपनाने में हिचक नहीं होनी चाहिए। बस रोगी निरोगी बनें, हर दिन बेहतर स्वास्थ्य का दिन हो, सिर्फ 7 अप्रैल ही क्यों?

(लेखक गाँव कनेक्शन के कंसल्टिंग एडिटर हैं और हर्बल जानकार व वैज्ञानिक भी।)

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