नीलेश मिसरा के मंडली के सदस्य रॉबिन कुमार सिंह की कहानी पढ़िए: ‘खट्टा मीठा’  

नीलेश मिसरा के मंडली के सदस्य रॉबिन कुमार सिंह की कहानी पढ़िए: ‘खट्टा मीठा’  कहानी का पन्ना में पढ़िए खट्टा मीठा

वो कहानियां तो आज तक आप किस्सागो नीलेश मिसरा की आवाज़ में रेडियो और ऐप पर सुनते थे अब गांव कनेक्शन में पढ़ भी सकेंगे। #कहानीकापन्ना में इस बार पढ़िए नीलेश मिसरा की मंडली की सदस्य रॉबिन कुमार सिंह की लिखी कहानी ‘खट्टा मीठा’

फत्ते भाई, मेई लेमन बना दो..”

“फत्ते भाई, पहले हमारा मैंगो बना दीजिए, हमारा रिक्शा खड़ा है।”

“फत्ते भाई, बड़े वकील साब के ल्य्याँ कोला बना दीयौं नैक.”

सात साल के बच्चे-बच्चियों से लेकर सत्तर साल के बुजुर्गों तक का तांता लगा रहता था “फत्ते कोल ड्रिंक्स कार्नर” पर अलीगढ़ की कचेहरी और यूनिवर्सिटी के बीच किसी रोड पर एक बरगद की छांव में रखा था ये खोखा। कस्टमर्स के बैठने के लिए बाहर ही लाल सफ़ेद कुर्सियां पड़ी रहती थीं और काउंटर के पास नीम की लकड़ी से बना हरे रंग में पुता एक पुराना तखत पड़ा होता जिस पर लाल, नारंगी, नीली, पीली, कत्थई, सफ़ेद रंगों की बोतल सजी रहतीं। हर बोतल का एक अलहदा रंग और उसी रंग से जुड़ा उस का ज़ायका भी होता। कत्थई मतलब कोला, नारंगी के मायने ऑरेंज, लाल कहें तो ग़ुलाब, सफ़ेद होती थी लेमन और इसी तरह बाकी भी कई रंग और उनके मुख़तलिफ़ ज़ायके भी।

पढ़िए कहानी खट्टा मीठा

मैं उन दिनों स्कूल में था जब मैंने फत्ते कोल्ड ड्रिंक पर जाना शुरू किया था। हम स्कूल वक्त पर पहुँचने में डिसिप्लिन फ़ॉलो किया करते या न करते लेकिन मैं और मेरे दोस्त स्कूल से लौटते वक्त एक सांस फत्ते कोल्डड्रिंक पर लेने का नियम कभी न तोड़ते, शुरू-शुरू में फत्ते भाई हमें घास भी नहीं डालते थे, हम थे भी तो महज़ दस-बारह साल के अठन्नी-चव्वन्नी से बच्चे और फिर फत्ते भाई रहते ही इतना busy थे कि नज़र उठाने की फुर्सत ना पाते थे।

ये लेमन उठाया, ये गिलास में डाला, ये बरफ मारी, फिस्स फिस्स फिस्स... मशीन से सोडा-पानी मार दिया.. ऊपर से मसाला छिड़का, और लो, ये हो गयी कोल्ड ड्रिंक तैयार। सच बता रहा हूँ, मैं उनकी स्पीड का ऐसा मुरीद था कि उनके जैकी चैन type फ़ास्ट- फ़ास्ट actions में मैं तो खो ही जाता था कहीं, और फिर वो अपनी पैनी आवाज़ में टोकते - “ला भैय्या एक रुपिया निकाल जल्दी, इत्तौ टेम नाए हम पै कि तोये बैठ के टुकुर टुकुर देखें...”

धीरे-धीरे हम बड़े होते गए, एक क्लास से दूसरी क्लास में आते रहे, साइकिल से मोटरसाइकिल पर आ गए, स्कूल के बदले यूनिवर्सिटी में आने जाने लगे। हम यूनिवर्सिटी में क्या पहुंचे, उम्र में हमारे बाप- दादा जितने फत्ते भाई ने न जाने क्यूँ उल्टा हम ही से ‘भाई’ कहना शुरू कर दिया। पहले अजीब लगता... फिर थोड़ा अच्छा भी लगता.. रौब सा आ जाता था। अच्छा ये रौब तब और भी बढ़ जाता था जब लॉ फैकल्टी वाली रुकैय्या फत्ते कोल्ड ड्रिंक पर अपनी स्कूटी रोक लेती थी. अरे.. मैं बताना ही भूल गया... मैं और रुकैय्या स्कूल से ही साथ में थे और मैं उसे बहुत पसंद करता था.. “फत्ते कोल्ड ड्रिंक” अच्छा बहाना होता, शाम के कुछ पल रुकैय्या के साथ गुज़ारने का...

मैं उन दिनों स्कूल में था जब मैंने फत्ते कोल्ड ड्रिंक पर जाना शुरू किया था। हम स्कूल वक्त पर पहुँचने में डिसिप्लिन फ़ॉलो किया करते या न करते लेकिन मैं और मेरे दोस्त स्कूल से लौटते वक्त एक सांस फत्ते कोल्डड्रिंक पर लेने का नियम कभी न तोड़ते, शुरू-शुरू में फत्ते भाई हमें घास भी नहीं डालते थे, हम थे भी तो महज़ दस-बारह साल के अठन्नी-चव्वन्नी से बच्चे और फिर फत्ते भाई रहते ही इतना busy थे कि नज़र उठाने की फुर्सत ना पाते थे।

स्कूल में चार साल तक मैं और रुकैय्या एक ही क्लास में पढ़े थे पर हमने classwork-homework की copies लेते देते hi hello से ज्यादा कभी कोई बात ही नहीं की...अब मैं क्या बताऊँ ..एक तो हमारे स्कूल का माहौल भी ऐसा कान्वेंट type नहीं था... लड़का बात क्या कर ले लड़की से, सारे स्कूल में शादी के कार्ड बंट जाते थे इसलिए मैं जान के ज्यादा बात नहीं करता था उससे... वो क्यूँ नहीं करती थी ये उसने कभी नहीं बताया मुझे।

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ख़ैर,स्कूल खत्म हुआ तो उसकी देखा देखी मैंने दिल्ली में एडमिशन ले लिया, पर फिर मालूम हुआ लॉ डिपार्टमेंट की सेकंड लिस्ट में रुकैय्या का नाम क्लियर हो गया और उसने दिल्ली छोड़ वापस यहीं एडमिशन ले लिया। बताइए साहब, वो अलीगढ़ में पढ़ें और हम दिल्ली.. ये भी कोई बात होती है? मैं भी आख़िर नुक्कड़ नाटक टीम का लीडर था, घर पर बोल दिया दिल्ली में रैगिंग बहुत होती है, hostels में लड़के बहुत परेशान करते हैं। जनाब.. मेरे चार आंसू गिरने की देर थी कि मेरी मम्मी बोली- “हमें ना भेजना अपना लड़का कहीं दिल्ली फिल्ली, यहीं पढ़ लेगा..जो पढ़ेगा...”.

भला हो यूनिवर्सिटी वालों का कि स्पोर्ट्स कोटा से मुझे economics honours में जैसे-तैसे एडमिशन मिल गया वर्ना साल बर्बाद हो जाती।

जब यूनिवर्सिटी पहुंचे तो थोड़ी आज़ादी ये मिली कि अब हम जब जी चाहे लॉ फैकल्टी के चक्कर काट सकते थे, पर बात हमारी फिर भी ना हो पाती, वो जब भी दिखती रिक्शे में अकेली ही न होती कभी, एक सहेली हमेशा अपने संग लटकाए रहती, ऐसे में कोई शरीफ आदमी कैसे बात करे उस से? लेकिन फिर एक दिन रुकैय्या स्कूटी चलाती दिखी, मैं लाइब्रेरी के सामने वाली सड़क पर खड़ा था, मैं तो यूँ ही देख रहा था कि ये स्कूटी पे इत्ती- ख़ूबसूरत सी लड़की कौन जा रही है, हकीकत बात है खासकर उस दिन मेरे मन में कोई ऐसी वैसी बात नहीं थी ,और देखो उसी दिन उसने मुझे देख लिया खुद को ताड़ते हुए...वो स्कूटी u-turn घुमा कर इधर ही ले आई और मेरे पास रोक खड़ी की।

भाई मेरी सिट्टी पिट्टी ग़ुम कि अब क्या हो? कित्ता ख़राब इम्प्रैशन पड़ा होगा- “रोहन लड़की ताड़ता है!! छी!!” मैं पानी पानी था, उसने इसी पानी में पत्थर मारा- “कहाँ हो आजकल ?”

मैं अभी शर्मिंदगी में मिमिया ही रहा था कि वो फिर बोली.. “कहीं बैठकर बात करें ?”

मैं यूनिवर्सिटी की भीड़-भाड़ वाली तमाम canteens और tea-shops को छोड़कर उसे “फत्ते कोल्ड ड्रिंक्स कार्नर” पर ले पहुँचा। भीड़ से अलग ले जाकर मैं कुछ पल नज़र भर देख लेना चाहता था उसे। रुकैय्या मेरे स्कूटर के पीछे-पीछे अपनी स्कूटी चलाती ले आई और हम “फत्ते कोल्ड डि्रंक कार्नर” पहुँच गए, मैं स्कूटर को अभी ऊंची नीची कच्ची ज़मीन पर टिकाने की मशक्कत ही कर रहा था कि हवा में फत्ते भाई का सलाम तैरता हुआ आ पहुंचा। मैंने फत्ते भाई को जवाब देने से पहले एक बार रुकैय्या को देखा कि उसने सुना या नहीं सुना। उसने सुन लिया था कि फत्ते भाई मुझे ही सलाम ठोंक रहे हैं, चेहरे पे बड़प्पन वाली मुसकराहट के साथ मैंने सलाम का जवाब दिया और पूछा- “और फत्ते भाई! क्या हाल हैं ?”

“ब...रोहन भाई... आपकी दुआएं हैं... सब ख़ैरियत है...लाओ कुर्सी लगवा दऊँ तुमाये लयं... चल्ले!! छोटू दो कुर्सी लगा। ”

फत्ते भाई ने भी देख लिया था कि आज रुकैय्या साथ में है, इसीलिए कुर्सी सामने के बजाये पीछे अकेले में लगवा दी, उधर उस बड़े बरगद के नीचे जिसकी डालियों से लम्बी लम्बी जड़ें type कुछ लटकी रहती थीं। हम दोनों अभी बैठे ही थे कि फिर फत्ते भाई की पैनी आवाज़ आई-

“रोहन भाई.. तुमाओ एक कोला? और?”

भाईसाहब, ऐसी वैसी बात नहीं है... रुकैय्या पे तगड़ा इम्प्रैशन जम गया.. पूछती है-

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“क्या बात है! बड़ी चलती है तुम्हारी..!! उन्हें पहले से ही पता है तुम कोला पीते हो। ” मैंने फिर वही बड़प्पन वाली स्माइल मारी और ऐसे ज़ाहिर कर दिया कि ये तो कुछ भी नहीं, मेरे ठाठ ही ऐसे हैं।

“मैं हमेशा कोला ही पीता हूँ... तुम बताओ...क्या लोगी...? लेमन, ऑरेंज, मैंगो, या कुछ और ?”

“मैं भी कोला ही लूंगी.. हम भी तो देखें ज़रा..ऐसा क्या ख़ास है कोला में” हालांकि उसका सवाल फत्ते भाई के कोला की ख़ासियत के लिए था, पर लगा ऐसा जैसे मेरी ख़ासियत पर सवाल कर रही हो। मैंने भी फिर मिनट से पहले अपनी सारी पॉजिटिव पॉजिटिव बातें बातों में बता डालीं। पता नहीं उसे मेरी तारीफ़ कैसी लगी, उसने कुछ ना बोला, बस मुस्कुराते हुए अपने हैण्ड बैग की तनियों को adjust करती रही और मेरी हर शेखी को ऐसे संयम से सुनती रही कि मानो मैं उसे सत्यनारायण की कथा सुना रहा हूँ।

फत्ते भाई ने भी देख लिया था कि आज रुकैय्या साथ में है, इसीलिए कुर्सी सामने के बजाये पीछे अकेले में लगवा दी, उधर उस बड़े बरगद के नीचे जिसकी डालियों से लम्बी लम्बी जड़ें type कुछ लटकी रहती थीं। हम दोनों अभी बैठे ही थे कि फिर फत्ते भाई की पैनी आवाज़ आई-

इतने में फत्ते भाई का लड़का दो ग्लास कोला ले आया.. मैंने दोनों ग्लास अपने हाथों में ले लिए और लड़के को चलता किया। फिर कोला का एक ग्लास रुकैय्या को देते हुए बोला-

“लो रुक्कैया!! try करो...”

रुकैय्या ने थोड़ा शिफ्ट होकर अपना हैण्ड बैग उस ही कुर्सी पर रख लिया और कोल्ड ड्रिंक का ग्लास मुझसे ले लिया। इतनी देर से मेरे किस्से सुन रही रुकैय्या ने जब एक घूँट कोला पीकर कोला की बड़ाई की तो सच मानिए मुझे तो वो भी खुद ही की बड़ाई महसूस हुई। फिर जब कुछ देर इधर उधर की बातें हो लीं तो उसने अपना हैण्ड बैग दोनों बाज़ुओं में समेटा और कुर्सी से उठते हुए पूछती है- “तुम डेली आते हो यहाँ...?” रुकैय्या के इस सवाल के जवाब में एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि फिर तो हर रोज़ क्लासेस के बाद मैं और रुकैय्या कुछ पल साथ गुज़ारने लगे। मुझे आज भी याद है रुकैय्या का वो प्यार भरे अंदाज़ में अपने बैग को समेटना। मैंने उस रात रुकैय्या का बैग बन जाने का ख्व़ाब भी देखा था।

दिन पे दिन रुकैय्या से बढ़ती नज़दीकियों ने एक ऐसे रिश्ते का नाम ले लिया जो यकीनन दोस्ती से आगे था, मगर इसे मुहब्बत के रिश्ते का दर्जा देना तब तक मुनासिब न था जब तक दोनों तरफ़ से इज़हार होकर बात पाक़-साफ़ ना हो जाए, लेकिन इज़हार तो तब हो न जब ये दिल दिमाग़ ख़राब करना बंद करे। मेरी मानें तो दिल हमारे जिस्म का सबसे शरारती पुर्जा है। हमेशा confuse करता है, मेरी एक धड़कन मुस्तक्किल मुझे उकसाती कि रुकैय्या से दिल की बात कह दूं और अपनी मुहब्बत मुक़म्मल करूँ, मगर इसी दिल की दूसरी धड़कन मुझे डराती कि अगर रुकैय्या भड़क गयी तो क्या होगा? अब बताइए ऐसे में इंसान आखि़र करे तो क्या करे, धडकनें तो जोड़े से ही आएंगी न जनाब।

लिहाज़ा मैं अपने मौजूदा हालात में ख़ुश रहता कि चलो जिनसे मुहब्बत है उन से मिल पाता हूँ, बोल बतला पाता हूँ, और फिर इस रिश्ते के मुस्तक़बिल का ख़याल भर भी तो मुझे डरा देता था। कहीं न कहीं हकीकत मैं भी जानता था, वो रुकैय्या, मैं रोहन, हमारी शादी कैसे मुमकिन थी लेकिन ता-उम्र यूँहीं मिलते रहने का ख़याल भी तो बेतुका ही था।

रुकैय्या के साथ बिताए इन्हीं खूबसूरत पलों के बीच न जाने कब मेरी ग्रेजुएशन और फिर मास्टर्स भी पूरी हो गई, उसने भी अपनी वक़ालत पूरी कर ली और judiciary की तैयारी करने लगी। अब सिर्फ लाइब्रेरी एक बहाना रहता हम दोनों के यूनिवर्सिटी आने जाने का, घर वालों को इसके सिवाय और समझा भी क्या सकते थे भला हम?

जो भी हो, मुझे एक बात पता थी उस बड़े बरगद की छांव के नीचे लाल सफ़ेद कुर्सियों पर बैठकर रुकैय्या से बातें करना ही मेरे लिए romance की परिभाषा थी। वो जगह और रुकैय्या की बातें.. ये सब मुझे इतना अच्छा लगता कि हम दोनों कभी किसी कॉफ़ी शॉप या restaurent में भी न मिलते और ना जाने क्यूँ मुझे यकीन होता कि रुकैय्या को भी ये सब उतना ही पसंद था जितना मुझे मैं मान लेता कि इज़हार ही तो सब कुछ नहीं होता। मुहब्बत के और भी कई रूप हैं।

वैसे आजकल के माहौल के चलते मेरे और रुकैय्या के इस रिश्ते में एक बात बड़ी ख़ास थी। हमने कभी एक दूसरे का फ़ोन नंबर नहीं लिया था। हम बस फत्ते कोल्ड ड्रिंक कार्नर पर मिलते और बस वहीं से टाटा बाय बाय हो जाती, और तो और अगले दिन का प्लान भी ना पूछा करता कोई किसी से हर रोज़ क्लासेस के बाद जो भी पहले फत्ते कोल्ड डि्रंक पर पहुँचता महज़ इंतज़ार ही करता दूसरे के आने का कभी कोई कॉल या sms ना किया जाता कि कहाँ हो, कितनी देर में आना है.. शायद एक भरोसा हमें हमेशा बांधे रखता कि जो भी होगा मिलेंगे ज़रूर।

रुकैय्या के साथ बिताए इन्हीं खूबसूरत पलों के बीच न जाने कब मेरी ग्रेजुएशन और फिर मास्टर्स भी पूरी हो गई, उसने भी अपनी वक़ालत पूरी कर ली और judiciary की तैयारी करने लगी। अब सिर्फ लाइब्रेरी एक बहाना रहता हम दोनों के यूनिवर्सिटी आने जाने का, घर वालों को इसके सिवाय और समझा भी क्या सकते थे भला हम? सो इस तरह सुबह से शाम तक लाइब्रेरी में पढ़ाई करने के बाद हमें कुछ लम्हे फत्ते कोल्ड ड्रिंक पर साथ गुज़ारने का मौका मिल जाता।

मगर ये बहाना भी कितना लम्बा चलता.. एक रोज़ लाइब्रेरी जाने का मकसद भी पूरा हुआ।

रुकैय्या का judiciary में सिलेक्शन हो गया, उसे उसकी पहली नीली बत्ती वाली सरकारी गाड़ी मुरादाबाद के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट जाने के लिए मिली और उसकी जोइनिंग वाले दिन ही मुझे भी फिरोजाबाद में ADM नियुक्त कर दिया गया।

अजीब विडंबना थी। इतने वर्षों से हम इन मनचाही नौकरियों के लिए ही तो पढ़ते आ रहे थे और अब जबकि अपने अपने मन की नौकरियां मिलीं भी तो भी उदासी थी, पर ये उदासी क्यूँ थी ? रुकैय्या ने तो कभी नहीं कहा था कि वो मुझे चाहती है और मैंने भी तो नहीं बताया था उसे कभी कुछ, फिर ये उदासी क्यूँ थी। शायद इसलिए कि हमारा फत्ते कोल्ड ड्रिंक्स कार्नर छूट रहा था हमसे ? उदासी की वजह टटोलना किसी को अच्छा नहीं लगता ख़ासकर कि तब जब उसका कोई उपाय पास ना हो।

“आज अम्मी ने बताया....मेरे लिए शादी का रिश्ता आया है” उसने सीधा मेरी आँखों में देखकर बोला, मेरे हाथ की पकड़ ढीली पड़ गयी, मेरा चेहरा तमतमाने लगा। मैं सन्न था, हम दोनों के बीच ख़ामोशी छा गयी। बड़ी हिम्मत सी जुटा कर मैंने पूछा- “तुम.... सीरियस हो...या...?”

नौकरी मिली तो घर छूट गया, हम दोनों घर से जितना दूर थे, एक दूसरे से उसकी दो गुनी दूरी पर थे, हर शनिवार रुकैय्या मुरादाबाद से और मैं फिरोज़ाबाद से अलीगढ़ के लिए ऐसे भागते जैसे हमें किसी सांप ने काट खाया हो और इसकी दवा हमें फत्ते कोल्ड ड्रिंक कार्नर पर ही मिलनी हो, ज्यादा देर के लिए मिल भी कहाँ पाते थे हम एक ही दिन की तो छुट्टी मिलती थी सरकारी जिम्मेदारी से, बस मिले, बैठे, एक-एक कोला पिया, अपने-अपने departments और सीनियर्स की थोड़ी-थोड़ी चुगली की और देखो कि दिन ढल आता।

बस मुझ ही को पता है मैं उस पल कैसे रोकता खुद को जब वो अपनी कार से उतरती और सिर पर दुपट्टा रखे मुस्कुराती हुई मेरी तरफ़ आती थी। सोमवार से शनीचर तक हर रात के ख्वाब में जिस लड़की को मैं अपनी बाहों में भरता था... इतवार को उसके यूं सामने होते हुए भी मैं उसे छू तक ना पाता था। ऐसा तरसता सा रह जाता। मैं हर हफ्ते की तरह इस इतवार भी फत्ते कोल्ड ड्रिंक कार्नर पहुंचा। रुकैय्या अभी नहीं पहुँची थी, मैंने वहीं, बड़े बरगद के नीचे दो कुर्सियां डलवा लीं, लाल वाली पर मैं बैठ गया, सफ़ेद वाली कुर्सी रुकैय्या का इंतज़ार करने लगी, कुछ भूख सी महसूस हुई तो मैंने फत्ते भाई को आवाज़ मार दी-

“फत्ते भाई..! एक कोला कर दीयों मेरा”

मेरी आवाज़ सुनते ही फत्ते भाई ने भीड़ भरे काउंटर से अदब भरा जवाब दिया- “हाँ रोहन भाई... बस करा हूँ अभी..” इतने में रुकैय्या भी आ पहुँची, उसने खद्दर का पीला कुर्ता पहना था जीन्स के साथ... रुकैय्या को देखकर मैं अपनी कुर्सी के रंग में रंग गया, मुहब्बत के लाल रंग में... लेकिन रुकैय्या का रंग आज उड़ा हुआ था। कुछ ख़ामोश सी थी, उदास भी, बरगद के कुछ पत्ते ज़मीन पर गिरे हुए थे, रुकैय्या ने एक पत्ता उठा लिया और उस ही से ज़मीन पर कुछ डिज़ाईन सी काढ़ने लगी। मुझे बड़ा अजीब लगा कि बताओ मैं बैठा हूँ, मुझसे बात करने के बजाये ये पता नहीं किस धुन में है, पर फिर जब उसने कोला मंगवाने के लिए भी मना कर दिया तो मैंने पूछा- “क्या हुआ? क्या, कोई... i mean सब ठीक है न रुकैय्या?”

“हाँ” उसने बिना ऊपर देखे जवाब दिया.

मुझे और अजीब लगा, मैंने फिर पूछा- “क्या हाँ...? क्या बात है रुकैय्या?”

वो कुछ ना बोली... बरगद के पत्ते से खेलने में ना जाने कौन सा स्वाद आ रहा था उसे, मैंने चिड़चिड़ाते हुआ उसका हाथ पकड़ लिया और अबकी कड़ाई से पूछा, “कोई तो बात है...... साफ़ साफ़ बोलो”

“आज अम्मी ने बताया....मेरे लिए शादी का रिश्ता आया है” उसने सीधा मेरी आँखों में देखकर बोला, मेरे हाथ की पकड़ ढीली पड़ गयी, मेरा चेहरा तमतमाने लगा। मैं सन्न था, हम दोनों के बीच ख़ामोशी छा गयी। बड़ी हिम्मत सी जुटा कर मैंने पूछा- “तुम.... सीरियस हो...या...?” रुकैय्या ने बरगद का वही पत्ता मुझे फेंक कर मारा और खड़े होकर बोली- “मैं जा रही हूँ, मैं शादी करके चली जाऊंगी आज़मगढ़। बैठे रहना तुम अकेले अपने इस फत्ते कोल्ड ड्रिंक पर...कभी मिलने नहीं आऊंगी....”

मैंने रुकैय्या का हाथ पकड़ लिया। “मुझसे शादी करोगी?”

तुनकदार लहज़े भरा जवाब आया- “किस ख़ुशी में?”

“रुकैय्या... i love you... मुझसे शादी करोगी?”

“कर लूंगी”

“शादी कर रही हो या एहसान कर रही हो?”

“propose कर रहे हो या एफिडेविट दे रहे हो ?” मैंने पता नहीं कैसे रुकैय्या को अपने गले से लगा लिया। फत्ते भाई बिना मंगवाए खुद ही आज हमारे लिए दो काला खट्टा ले आये।

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