"हमारे बारे में कोई जानने की कोशिश ही नहीं करता, इसलिए अब हम खुद बनेंगे अपने समुदाय की आवाज"

एलजीबीटी समुदाय के पास अपनी तमाम कहानियाँ हैं जिन्हें अब तक मीडिया में प्रमुखता से जगह नहीं मिली है। सामुदायिक पत्रकारिता के प्रशिक्षण के दौरान इस समुदाय ने समाज और पत्रकारों के दोहरे रवैये का जिक्र करते हुए नाराजगी जताई।

Neetu SinghNeetu Singh   16 May 2019 12:08 PM GMT

"हमारे बारे में कोई जानने की कोशिश ही नहीं करता, इसलिए अब हम खुद बनेंगे अपने समुदाय की आवाज"

जमशेदपुर(झारखंड)। गाँव कनेक्शन के सामुदायिक पत्रकारिता प्रशिक्षण के दौरान जमशेदपुर की बेबो साहिरा किन्नर (24 वर्ष) ने मीडिया के रवैये पर उदासी जताई, "हमारे समुदाय की खबर लिखने के लिए पत्रकार उतने संवेदनशील नहीं हैं जितना उन्हें होना चाहिए। कई बार वो हमसे बात भी नहीं करते और उन्हें हमारे बारे में जो समझ आता है वो लिख देते हैं।"

बेबो किन्नर की इस बात का वहाँ बैठे 15 समलैंगिक लोगों ने सहमति जताई। बेबो ने बताया, "कई बार पत्रकार गे और लेसबियन को भी किन्नर लिख देते हैं। एलजीबीटी समुदाय में किसको क्या लिखना पत्रकारों को इसमें समझ बढ़ाने की जरूरत है। जैसे वो सभी खबरें प्रमुखता से लिखते हैं वैसे ही एलजीबीटी की खबरें लिखा करें जिससे मीडिया पर हमारा भरोसा बढ़ सके।"


गाँव कनेक्शन के स्वयं प्रोजेक्ट के तहत उत्तरप्रदेश, झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश राज्यों में हर एक समुदाय के साथ सामुदायिक पत्रकारिता का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। गाँव कनेक्शन की सामुदायिक पत्रकार बनाने के पीछे की यही सोच है कि हर एक समुदाय के लोगों को प्रशिक्षित किया जाए जिससे वो अपने समुदाय और आस पास के मुद्दों को अपने नजरिये से बेहतर लिख सकें।

स्वयं प्रोजेक्ट के तहत पहली बार पिछले दिनों जमशेदपुर में एलजीबीटी समुदाय के 15 लोगों को पत्रकारिता की बारीकियां सिखाई गईं। एलजीबीटी समुदाय ने अपने साथ हो रहे भेदभाव और सामाजिक मुद्दों पर लिखने का भरोसा दिया है।


इस समुदाय के साथ बतौर पत्रकार हमने पहली बार चार-पांच घंटे का समय गुजारा। इनसे बात करके हमने ये पाया कि ये समुदाय समाज के भेदभाव से दुखी है। ये कभी अपनों से तिरस्कृत हुए हैं तो कभी समाज से। इन्होंने बातचीत के दौरान ये भी बताया कि इनका मीडिया पर भी भरोसा नहीं है। बेबो किन्नर वर्ष 2012 से उत्थान नाम के एक एनजीओ से जुड़ीं जिसमें वो अभी अध्यक्ष हैं। उत्थान एनजीओ जमशेदपुर में 1500 एलजीबीटी समुदाय के साथ सामाजिक मुद्दों और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर काम करता है।


समलैंगिक समुदाय से जुड़े संस्था के सचिव अमरजीत सिंह का कहना है, "हमारे समुदाय के पास लिखने के लिए सैकड़ों कहानियाँ हैं। लेकिन पढ़ाई-लिखाई की उम्र में समाज के लोग हमारे साथ भेदभाव करने लगते हैं जिसकी वजह से हम ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाते। इसलिए इस समुदाय के लिए अपनी आपबीती और आसपास की खबरें लिखना थोड़ा मुश्किल होगा गिने चुने लोग ही लिख सकते हैं।"

उन्होंने बताया, "गाँव कनेक्शन की ट्रेनिंग के बाद हमने अपने साथियों से कहा है कि वो लिखने की बजाए रिकॉर्ड करके खबर भेजें। हमें बहुत खुशी होगी जब समलैंगिक समुदाय की मुश्किलें और चुनौतियों को अख़बार में प्रमुखता से जगह मिलेगी। हमारे साथ अपनों ने और समाज ने इतना भेदभाव किया है कि अब हमें जल्दी किसी पर भरोसा नहीं होता कि कोई हमारी तकलीफ को समझेगा।"

प्रशिक्षण के दौरान इन लोगों ने अपने साथ समाज के दोहरे रवैये का बार-बार जिक्र किया। इस समलैंगिक समुदाय की सबसे बड़ी विशेषता ये थी कि सभी लोग तमाम मुश्किलों और चुनौतियों के बावजूद आज भी अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। ट्रेनिंग में शामिल हुई शिल्पी सिंह किन्नर (20 वर्ष) ने खुशी जताते हुए कहा, "पहली बार कोई ऐसा मीडिया संस्थान देखा जिसके पत्रकार ने हमारे साथ इतना वक़्त गुजारा। हमारे बारे में कोई जानने की कोशिश ही नहीं करता। हमें लोग अलग ही तरह का समझते हैं। हम जिस तरह से नहीं हैं हमें उस तरह दिखाया जाता है ।"


प्रशिक्षण के समापन के दौरान उन्होंने कहा, "हम सब अपनी खबरें जरुर लिखेंगे। जिससे समाज के जो लोग इन खबरों को पढ़ें उन्हें पता चल सके कि समाज के इस दोहरे रवैये से हमें कितनी तकलीफ पहुंचती हैं। हमें कभी पता नहीं होता है हम क्या हैं ये समाज के लोग ही हमें बताते हैं कि हम छक्का हैं।" ये बताते हुए शिल्पी की आँखे भर आयीं। शिल्पी ने ऐसी कई बातें बताई जिन्हें सुनकर तकलीफ हुई। शिल्पी जैसे यहाँ बैठे सभी लोगों ने अपनी तकलीफें बताई और ये भरोसा दिलाया कि वो गाँव कनेक्शन के लिए अगर लिख नहीं सकेंगे तो रिकॉर्ड करके अपनी कहानियाँ बतायेंगे।


यहाँ बैठे एक के बाद एक लोग अपनी-अपनी तकलीफें बताने लगे। ट्रेन में रोज पैसे मांगने वाली पायल किन्नर (28 वर्ष) ने अपनी पीड़ा जताते हुए कहा, "हमें भी शौक नहीं है कि हम समाज में हंसी का पात्र बने। ट्रेन में हम पैसे मांगे और लोग हमारा मजाक बनाये ये किसे अच्छा लगेगा। ट्रेन में कई बार हमें वो हरकते करनी पड़ती हैं जो हम करना ही नहीं चाहते हैं। अगर हम ऐसा न करें तो लोग हमें जीने ही न दें।" वो आगे कहती हैं, "हम भी पढ़ाई करके नौकरी करना चाहते हैं लेकिन हमें समाज से अलग कर दिया जाता है। हमें दोस्ती नहीं मिलती है इसलिए हम अलग हो जाते हैं। लोग बिना जाने समझे हमारे बारे में कई तरह की धारणाएं बना लेते हैं जबकि हकीकत में हम वैसे नहीं होते हैं।"


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