अब तो देशी फ्रिज बीते ज़माने की बात, कुम्हारों के लिए रोजी रोटी का संकट  

अब तो देशी फ्रिज बीते ज़माने की बात, कुम्हारों के लिए रोजी रोटी का संकट   प्रतीकात्मक तस्वीर

नवनीत अवस्थी, स्वयं कम्युनटी जर्नलिस्ट

उन्नाव। कुछ साल पहले तक गर्मियों के मौसम में ग्रामीण क्षेत्र का फ्रिज कही जाने वाली सुराही एवं मिट्टी के बने घड़ों से बाजार पट जाता था। लेकिन आधुनिकता की दौड़ ने सुराही व घड़ा बनाने वाले इन कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है। आज इन कारीगरों को सरकार की ओर से भी कोई मदद नहीं मिलती है।

नवाबगंज में मिट्टी के बर्तन बनाने वाले रामशंकर (74 वर्ष) बताते हैं, “पहले आसानी से मिट्टी मिल जाती थी, जिससे काम आसान था। बाजार में बर्तनों के दाम भी मिल जाते थे, लेकिन समय बदलने के साथ सब बदल गया। अब न तो मिट्टी आसानी से मिलती है और न ही कोई इसे खरीदना चाहता है।” नवाबगंज विकास खण्ड के मानपुर गाँव निवासी रामबली लल्ला (45 वर्ष) ने बताया, “कुछ साल पहले तक गर्मी के महीनों में हर घर में घड़ा व सुराही का प्रयोग होता था। आज इन घड़ों की जगह फ्रिज ने ले ली है, जिससे हमारे सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।”

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वहीं इसी गाँव के रहने वाले कुम्हार राजू (40 वर्ष) ने बताया, “इस कारोबार में सबसे बड़ी दिक्कत मिट्टी की हो रही है। सुराही बनाने के लिए गंगा नदी के किनारे की बलुई मिट्टी की जरूरत पड़ती है। ट्रैक्टरों से मिट्टी लाने में खनन व पुलिस विभाग दोनों ही बहुत परेशान करते हैं।”

प्लास्टिक के बर्तन ने ले ली जगह

वहीं इन मिट्टी के बर्तनों से कहीं सस्ते प्लास्टिक के सामान बाजार में आ गए, उससे भी यह कारोबार प्रभावित हुआ। जबकि प्लास्टिक के डिस्पोजल गिलास जिनमें लोगों को चाय लस्सी व अन्य पेय पदार्थ परोसे जा रहे है वह पूर्णतया स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यह जानते हुए भी लोग इन प्लास्टिक से बने गिलास व कटोरी आदि का उपयोग कर मिट्टी के बर्तन बनाने वाले इन कारीगरों के हुनर की अनदेखी कर रहे हैं।

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