कृषि विश्वविद्यालयों में शिक्षक नहीं, कैसे हो खेती में सुधार ?

Devanshu Mani TiwariDevanshu Mani Tiwari   26 Jun 2017 1:06 PM GMT

कृषि विश्वविद्यालयों में शिक्षक नहीं, कैसे हो खेती में सुधार ?चंद्रशेखर आज़ाद कृषि विश्वविद्यालय, कानपुर

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। भले ही देश की 70 फीसदी जनसंख्या की कमाई का ज़रिया कृषि हो, लेकिन बात की जाए देश में कृषि विश्वविद्यालयों की मौजूदा हालत की तो यहां रिक्त पदों की संख्या अपने आप में शिक्षकों की कमी झेल रहे कृषि संस्थानों की कहानी बयां कर रही है।

भारत में कृषि विषय संबंधित छात्रों के हक के लिए काम कर रही संस्था अखिल भारतीय कृषि छात्र संघ के मुताबिक, भारत में मौजूदा समय में कृषि विश्वविद्यालयों में अलग-अलग तरह के विषयों में 10,000 से अधिक प्रोफेसरों और असिस्टेंट प्रोफेसरों के पद पिछले दस वर्षों से खाली पड़े हैं। देश के कृषि संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी झेल रहे प्रदेशों में सबसे ऊपर उत्तर प्रदेश (2,000 से अधिक पद रिक्त) है। इसके बाद राजस्थान और बिहार राज्यों में कृषि विषयों के शिक्षकों के सबसे अधिक कमी है।

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देश में कृषि विश्वविद्यालयों में कृषि शिक्षकों की कमी के बारे में अखिल भारतीय कृषि छात्रसंघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिका प्रियदर्शनी बताती हैं, “देश में आज भी कृषि संस्थानों में हज़ारों की संख्या में कृषि विशेषज्ञों और अध्यापकों के पद खाली पड़े हैं। हालत यह है कि अगर कृषि विद्यालयों में कोई शिक्षक रिटायर होता है, तो उसके पद पर दूसरी नियुक्ति होने में औसतन तीन से चार साल लग जाते हैं।’’

कृषि संस्थानों में शिक्षकों की कमी से सबसे ज़्यादा नुकसान छात्रों का हुआ है। “कृषि विद्यालयों में शिक्षकों की कमी के कारण अध्यापकों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। हालत यह है कि कम शिक्षकों के कारण चार-चार कृषि संबंधी विषयों के लिए एक शिक्षक ही नियुक्त है। उदाहरण के तौर पर क्रॉप फिजियोलॉजी और क्रॉप जेनेटिक्स दो बड़े कृषि विषय हैं, लेकिन अधिकतर कॉलेज़ों में दोनों ही विषय किसी एक शिक्षक द्वारा ही पढ़ाए जाते हैं। बोझ के चलते शिक्षक एक संस्थान को ज़्यादा समय नहीं दे पाते हैं।’’ सोनिका प्रियदर्शनी आगे बताती हैं।

पिछले महीने ऑल इंडिया एग्रीकल्चर स्टूडेंट्स एसोसिएशन द्वारा उत्तरप्रदेश में कृषि शिक्षकों के रिक्त पदों को भरे जाने को लेकर कृषि मंत्री उत्तर प्रदेश सूर्य प्रताप शाही को पत्र सौंपा गया है, लेकिन इस पर अभी तक कोई भी जवाब नहीं आया है। कृषि उत्पादन आयुक्त, उत्तरप्रदेश चंद्र प्रकाश बताते हैं, ‘’अखिल भारतीय कृषि छात्रसंघ की तरफ से भेजे गए पत्र में रखी गई उनकी मांगे जायज़ हैं।

हमने उनकी मांगों को लेकर नए शिक्षकों की भर्ती पर बजट आवंटन करने के लिए वित्त विभाग को रिपोर्ट भेज दी है, जल्दी ही नए शिक्षकों की भर्तियां की जाएंगी।’’ कानपुर स्थित चंद्रशेखर आज़ाद कृषि विश्वविद्यालय के फिज़ियोलॉजी विषय से स्नातक कर रहे एक छात्र ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, “कॉलेज में ऐसे कई टीचर हैं, जो एक से अधिक विषय पढ़ाते हैं। बहुत सारे टीचर ऐसे हैं जो पढ़ाने के साथ-साथ मैनेजमेंट का भी काम देखते हैं। इसके अलावा हमें समर ट्रेनिंग पर दूसरे जिलों के केवीके भी भेजा जाता है, पर वहां भी टूटे-फूटे हॉस्टल मिलते हैं और विशेषज्ञ भी कम समय दे पाते हैं।’’

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पिछले दो वर्षों में घटे कृषि संस्थान

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार, देश में हर साल उच्च शिक्षा में विश्व विद्यालयों में दाखिला लेने वाले औसतन दो करोड़ छात्र हैं, जिनमें से कृषि संबंधी विषयों में स्नातक और परास्नातक करने वाले छात्रों की संख्या कुल संख्या की एक फीसदी (डेढ़ लाख) भी नहीं है।

उत्तर प्रदेश में कम हो रही कृषि शिक्षकों की संख्या को गंभीर मानते हुए गौतम वीर सिंह अखिल भारतीय कृषि छात्रसंघ के प्रदेश अध्यक्ष ( यूपी) बताते हैं, ‘’उत्तर प्रदेश में पिछले दो वर्षों में निजी और सरकारी स्तर के कृषि संस्थानों की संख्या कम हुई है। इसका मुख्य कारण तेज़ी से कम हो रही शिक्षकों की संख्या और खुद छात्रों को कृषि को एक विषय के रूप में अपने करियर के तौर पर चुनने की कम होती प्रवृत्ति भी है।’’

कृषि उत्पादन आयुक्त चंद्र प्रकाश ने बताया अखिल भारतीय कृषि छात्रसंघ की तरफ से भेजे गए पत्र में रखी गई उनकी मांगे जायज़ हैं। हमने उनकी मांगों को लेकर नए शिक्षकों की भर्ती पर बजट आवंटन करने के लिए वित्त विभाग को रिपोर्ट भेज दी है, जल्दी ही नए शिक्षकों की भर्तियां की जाएंगी।

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