नजरअंदाज नहीं करें: बदलते मौसम में पशुओं को हो सकता है त्वचा रोग

नजरअंदाज नहीं करें: बदलते मौसम में पशुओं को हो सकता है त्वचा रोगपशु।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। ज्यादातर पशुपालक दुधारु पशुओं के त्वचा रोगों को नजरअदाज़ कर देते हैं जो आगे चलकर घातक रूप ले सकता है। त्वचा रोग दिखने में बहुत साधारण होते हैं, लेकिन कई बार यह गंभीर बीमारी बन जाती हैं। दुधारु पशुओं में कई तरह के त्वचा रोग होते हैं। इन रोगों से पशुओं की त्वचा पूरी तरह से खराब भी हो जाती है। पशुओं को स्वस्थ रखना है तो गर्मियों व बरसात के मौसम में उनके शरीर पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरुरत होती है। गाय-भैंसों में ही त्वचा रोग सबसे ज्यादा होती है।

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पशुचिकित्सक डॉ. रुहेला बताते हैं कि त्वचा रोग से बचाने के लिए मौसम का ख्याल रखना होता है। साथ ही मौसम के अनुरूप पशुओं की देखभाल भी आवश्यक होती है। वे बताते हैं कि जीवाणु समेत कई प्रकार के कृमि पशुओं में त्वचा रोगों के लिए कारण होते हैं। खासकर जीवाणु से होने वाले त्वचा रोगों में पशुओं के शरीर में मवाद या पस पड़ जाता है। आमतौर पर त्वचा के रोगों के लक्षण दिखाई देने पर इनके में काफी लम्बा समय लग जाता है। इसलिए पशुओं को त्वचा रोग से बचाने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

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1. जीवाणु जनित रोगों के लक्षण: प्रभावित स्थान गर्म हो जाता है, त्वचा लाल हो जाती है और मवाद निकलने लगता है।

उपचार: पशुओं में त्वचा रोग के उपचार के लिए एंटीबायोटिक शैम्पू का प्रयोग करे और पशुचिकित्सक की सलाह से प्रभावित स्थान की सर्जरी करवाए।

2. कृमि द्वारा होने वाले त्वचा रोग के लक्षण: खुजली की जगह पर बाल का गिर जाना (गंजापन)। कान की खुजली में पशु सिर हिलाता है, कान फैल जाता है और उसमें भूरे काले रंग का वैक्स जमा हो जाता है। इसके उपचार के लिए पशु के कान को हल्के गर्म पानी में धोने वाला सोडा मिलाकर उसकी सफाई करनी चाहिए।

उपचार: ओलिनाल और प्रेडनीसोलॉन दवा का प्रयोग करें।

3. स्केबिस पशुओं में फैलने वाला बाह्य त्वचा रोग: यह कृमियों द्वारा उत्पन्न होता है, जो मनुष्यों में भी फैलता है। इसमें त्वचा मोटी होने के साथ ही अत्यधिक खुजली होती है।

उपचार-प्रभावित स्थान के बाल काट कर ब्यूटोक्स (2-3 मिलीलीटर /लीटर पानी)में या ऐमीट्राज(2-3 मिलीलीटर /एक लीटर पानी) दवाओं के घोल से स्प्रे करे या उससे पशु को नहलाए। इसके अलावा जैटरोफा का तेल भी उपयोग में ला सकते है।

4. फफूंद जनित त्चवा रोग-इसमें पशु के त्वचा, बाल और नाखून प्रभावित होते हैं।

उपचार- प्रभावित स्थान के बाल को काट दें। ग्रिसियोफल्वीन दवा 5 से 20 मिलीग्राम प्रति कि.ग्रा शरीर की दर से रोज एक महीने तक खिलाए। इसके साथ-साथ मिकोनाजोल या ऐम्फोटेरिसिन-बी मरहमों को लगाना चाहिए।

5. विषाणु जनित त्वचा रोग के लक्षण- पशुओं की नाक और खुर की त्वचा मोटी हो जाती है पेट में फुंसी हो जाती है।

उपचार- इस रोग के लिए टीका उपलब्ध है। इस रोग में एंटीबायोटिक का प्रयोग पशुचिकित्सक की राय से लेनी चाहिए।

6. जहर द्वारा त्वचा रोग के लक्षण- सांप के काटने से त्वचा में दांत के निशान होते हैं और त्वचा मोटी हो जाती है।

उपचार-पशु के बाल काट दे। एंटीबायोटिक दवा भी दे सकते हैं।

पहले से करें देखभाल

  1. पशुओं को स्वच्छ व साफ रखें, इसलिए उन्हें गॢमयों में प्रतिदिन दिन नहलाना चाहिए।
  2. आस-पास की गंदगी (गोबर इत्यादि) को नियमित रुप से साफ करें।
  3. बरसात में पशुओं के इर्द-गिर्द पानी जमा नहीं होना चाहिए वरना मच्छर, मक्खी व कीड़ें मकोड़े वहां अपना घर बना सकते है।
  4. प्रत्येक तीन महीनों के अंतर पर पशुओं को आंतरिक परजीवी नाशक दवा का सेवन कराना चाहिए।
  5. सभी प्रकार के त्वचा रोगों में पशु को अच्छा खान-पान, विटामिन व खनिज लवण देने चाहिए। इसके साथ ही लिवर टॉनिक व बालों के लिए कंडीशनर का प्रयोग करना चाहिए।

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