स्वयं प्रोजेक्ट

सखियों को अब नहीं बुलाते सावन के झूले 

साक्षी, स्वयं कम्यूनिटी जर्नलिस्ट

मवाना (मेरठ)। एक समय था जब सावन आने पर आंगन से खेत-खलिहान तक सखियां सावन गीत गाती थीं। कजरी और मल्हार भी खूब सुनने को मिलती थी। मगर अब समय के साथ सावन गाँवों से उठकर शहर के क्लबों में डीजे की थाप पर ज्यादा दिखाई पड़ता है।

पहले सावन आने के इंतजार में नवविवाहिताएं मायके जाने की खुशी में फूली नहीं समाती थीं। नवविवाहिताएं झूले झूलती थीं। अब मस्ती से सराबोर न वो झूले नजर आते हैं, न ही कजरी और पिया मिलन की ठुमरी। आधुनिकता की चकाचौंध में सावन का महत्व धूमिल होता जा रहा है।

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हस्तिनापुर ब्लॉक के गाँव पाली निवासी हरवती (65 वर्ष) बताती हैं, “पहले कोई बाग और घर का पेड़ ऐसा नहीं दिखता था, जिस पर सावन माह में झूला न पड़ा हो, लेकिन अब तो सावन कब आया, कब चला गया, पता ही नहीं चलता।”

दरियापुर गाँव निवासी श्यामो (63 वर्ष) बताती हैं, “हमारे समय में सावन महिलाओं के लिए सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता था, लेकिन अब वो सब बस यादें ही है।”इसी गाँव के (47 वर्ष) दिलेर सिंह बताते हैं, “सावन के माह में गाँव का हर घर बेटियों से भरा होता था, लेकिन आधुनिकता की दौड़ ने सबकुछ छीन लिया।”

क्लबों में जी रहीं परम्पराएं

सावन के झूले की परम्परा शहर के क्लबों में अभी जिंदा दिखाई देती है। महिला क्लब की सदस्या रजनी बताती हैं, “हम हर साल सावन के माह में थीम पार्टी का आयोजन करते हैं। जिसमें सावन के झूलों को फूलों से सजाया जाता है। जगह कम होने की वजह से एक या दो झूले ही लगाए जाते हैं, ताकि सावन की रस्म बची रहे।”

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शगुन माना जाता है झूला झूलना

फलावदा ब्लॉक के गाँव गगसोना निवासी वृद्वा मुनेश देवी बताती हैं,“ सावन आने का उन्हें आज भी बेसब्री से इंतजार रहता था। सावन आते ही पेड़ पर झूला डालकर दिनभर झूला करते थे। शाम ढलते ही नई-नवेली दुल्हनें घरों से निकलकर सावन के गीतों और मल्हारों पर जमकर थिरकती थी, लेकिन आज के बदलते युग ने सबकुछ छीन लिया। जबकि पुरानी परम्पराओं के हिसाब से झूला झूलना शगुन माना जाता है।”

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