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महिलाओं की समस्याएं लेकर बेधड़क थानों में घुसती हैं शाबरा अम्मा

Neetu SinghNeetu Singh   30 March 2017 7:24 PM GMT

महिलाओं की समस्याएं लेकर बेधड़क थानों में घुसती हैं शाबरा अम्मामहिलाओं को सशक्त बना रहीं शाबरा अम्मा।

अलीनगर(बहराइच)। गाँव की बहु हो या फिर किशोरियां किसी को कहीं भी जाना हो हर कोई शाबरा अम्मा को ढूंढ़ता है। 70 वर्षीय शाबरा अम्मा उम्र के इस पड़ाव में भी बुलन्द आवाज़ में अधिकारियों से बात करने में नहीं झिझकती हैं।

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बहराइच जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर शिवपुर ब्लॉक के अलीनगर गाँव की रहने वाली शाबरा अम्मा आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। शाबरा बताती हैं, “हमारे गाँव में मुस्लिम बहु-बेटियों को घर से निकलने की आजादी नहीं थी, उनको घर से बाहर निकालने के लिए कई बार लोगों के घर जाती उनके घर के पुरुषों को समझाती, तब कहीं जाकर मेरे विश्वास पर उन्हें घर से बाहर निकलने की आजादी मिली, पहले मैं अंगूठा लगाती थी अब हस्ताक्षर करने लगी हूं।” शाबरा अम्मा के जोर देने पर घर से निकली महिलाएं आज न सिर्फ अपना हक़ और कानून जानती हैं बल्कि अपनी बात कहने में भी सक्षम हैं। शाबरा अम्मा महिला सामाख्या से जुड़ी एक महिला हैं।

अलीनगर में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। इन परिवार की बहू-बेटियों को घर से निकलने की बहुत ज्यादा आजादी नहीं थी। जब भी गाँव में कोई मीटिंग होती हर कोई शाबरा अम्मा को ही खोजता क्योंकि शाबरा अम्मा ही घर-घर जाकर पूरे गाँव की बहुओं को इकट्ठा कर पातीं। शाबरा खुश होकर बताती हैं, “आठ साल से जबसे मैं एक समूह की बैठक में जाने लगी तबसे मैंने बहुत जानकारी हासिल की है।

अब अगर किसी के बाल-विवाह की सूचना मिल जाए या फिर किसी के यहां हो रही हिंसा की जानकारी हो जाए तो झट से मैं उस घर में पहुंच जाती हूं।” वो आगे बताती हैं, “उम्र में बड़ी हूं इसलिए सभी मेरी बात का लिहाज करते हैं, अब तो घर परिवार के आपसी मसले भी लोग सुलझाने के लिए मुझे ही बुला लेते हैं, खुली बैठकों में भी मेरी बात प्रधान जी गौर से सुनते हैं।”

खुद संभालती हैं घर की सारी जिम्मेदारी

अस्पताल थाना, तहसील, कचहरी कहीं भी जाने में कोई डर नहीं है। शाबरा अम्मा अकेले रहती हैं और अपना पूरा खर्चा खुद चलाती हैं, जरूरत पड़ने पर अपने लड़कों-बहुओं और पोतियों को भी खुद खर्चा दे देतीं हैं। पिछले 40 वर्षों से गाँव में किसी के घर में हो रही शादी विवाह हो या फिर बच्चे का जन्म हुआ हो हर कोई अपने घर में शाबरा अम्मा (जो नाउन का काम करती हैं) को ही बुलाता है।

कई लड़कियों की बचा चुकीं हैं जिंदगी

शाबरा ने बाल विवाह की रोकी एक घटना का जिक्र करते हुए बताया, “एक लड़की की शादी हो रही थी उसकी बरीछा की मिठाई बांटने के लिए मैं निकली तो पड़ोस के एक घर से पता चला कि जिस लड़के से लड़की की शादी हो रही है वो लड़की से बहुत बड़ा है जबिक लड़की की उम्र 17 साल थी। उस घर से बिना मिठाई बांटे मैं सीधे लड़की के घर गई और उसके घरवालों से बोला कोई तुम्हारे घर की मिठाई लेने को तैयार नहीं है सब कह रहे हैं बिटिया की शादी दोगुने उम्र के लड़के से हो रही है।”

जब लड़की से बात की तो उसने कहा उसे लड़का बिलकुल पसंद नहीं है घर वाले जबरजस्ती मेरी शादी कर रहे हैं। शाबरा अम्मा ने उनके घरवालों को बहुत समझाया कि अभी कुछ नहीं बिगड़ा है सिर्फ शादी ही तय हुई है बाद में पूरी जिन्दगी तुम्हारी बिटिया दुखी रहेगी। लड़की के घरवाले बहुत मुश्किल से माने लेकिन उसकी शादी रुक गई। शाबरा अम्मा द्वारा रुकवाई ये पहली शादी नहीं है ऐसी वो कई शादियां रुकवा चुकी हैं।

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