कला और शिल्प का मेल है ‘तंजौर चित्रकारी’

कला और शिल्प का मेल है ‘तंजौर चित्रकारी’कला और शिल्प दोनों का ही एक अच्छा मिश्रित रूप तंजौर की चित्रकारी में दिखाई देता है।

लखनऊ। देश में कई ऐसी लोक कलाएं हैं, जिनका अपना अलग इतिहास रहा है। ऐसी ही एक लोक कला है, तंजौर चित्रकारी। इस कला ने भारत को विश्व मंच पर प्रसिद्धि दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। कला और शिल्प दोनों का ही एक अच्छा मिश्रित रूप तंजौर की चित्रकारी में भी दिखाई देता है।

तंजावर चित्रकारी बन गयी तंजौर चित्रकारी

चेन्नई से लगभग 300 किमी. दूर तंजावर में इस कला की शुरुआत हुई। ये कला चोल सम्राज्य के समय में एक नयी ऊंचाई तक पहुंची। इसके बाद आने वाले शासकों के संरक्षण में यह कला आगे और समृद्ध हुई। शुरू में ये भव्य चित्र राज भवनों की शोभा बढ़ाते थे, लेकिन बाद में ये घर-घर में सजने लगे।

एक राजसी विरासत वाले धार्मिक चित्र 'तंजावर चित्रकारी', जिसे अब 'तंजौर चित्रकारी' के नाम से जाना जाता है, की सर्वोत्तम परिभाषा हैं। तंजौर कि चित्रकारी महान पारंपरिक कला रूपों में से है, जिसने भारत को विश्वप्रसिद्ध बनाया है। कला के कुछ रूप ही तंजौर की चित्रकारी की सुंदरता और भव्यता से मेल खाते हैं।

कला और शिल्प का अनूठा संगम

कला और शिल्प दोनों का एक विलक्षण मिश्रित रूप तंजौर कि इस चित्रकारी का विषय मुख्य रूप से हिन्दू देवता और देवियां हैं। कृष्ण इनके प्रिय देव थे, जिनके विभिन्न मुद्राओं में चित्र बनाए गए हैं, जो उनके जीवन की अवस्थाओं को व्यक्त करते हैं। तंजौर चित्रकारी की मुख्य विशेषताएँ उनकी बेहतरीन रंग की सज्जा, रत्नों और कांच से गढ़े गए सुंदर आभूषणों की सजावट और उल्लेखनीय स्वर्ण पत्रक का काम है। स्वर्ण पत्रक और बहुमूल्य और अर्द्ध मूल्य पत्थरों के भरपूर प्रयोग ने चित्रों को भव्य रूप प्रदान किया है। इन्होंने तस्वीरों में इस कदर जान डाल दी है कि ये तस्वीरें एक विलक्षण रूप में संजीव प्रतीत होती हैं।

रत्न-मणियों का होता था प्रयोग

शुरुआत में इन चित्रकारियों में बहुमूल्य मानिक, हीरे और दूसरे रत्न-मणियों का प्रयोग होता है, जो राजाओं के महलों में सजायी जाती थीं। समय के साथ इनमें बहुमूल्य पत्थरों की जगह अब सस्ते रत्नों का प्रयोग होने लगा है। लेकिन स्वर्ण पत्रकों का प्रयोग होता है।

स्रोत: राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल

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