वाराणसी: एग्रो फूड पार्क की फैक्ट्रियों की गंदगी से काली हुई नाद नदी, ग्रामीण परेशान

वाराणसी की पिंडारा विधानसभा क्षेत्र में बहने वाली एक छोटी सी नदी फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे, केमिकल युक्त अपशिष्ट के चलते नाला बन गई है। गांव के लोगों के मुताबिक नदी इतनी दूषित हो गई है, अगर पशु और कुत्ते इस नदी में चले जाते हैं तो उनके बाल झड़ जाते हैं। पढ़िए "क्या कहता है गांव" सीरीज की अगली कड़ी

Ankit Kumar SinghAnkit Kumar Singh   3 March 2022 10:58 AM GMT

बिन्दा गांव (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)। जोखू राम प्रजापति न ज्यादा बचपन में बीमार न हुए न जवानी के दिनों में, लेकिन बुढ़ापे में ऐसा बुखार आया कि अस्पताल में लाखों रुपए खर्च करने के बाद अब वो चारपाई पर आ गए हैं। घर के मुख्य दरवाजे पर पड़ी चारपाई पर ही लेटे रहते हैं। सीमेंट वाली चादर से लटकी ग्लूकोज की बोतल से बूंद-बूंद ग्लूकोज उनके शरीर में जाता रहता है, खाना-पानी भी नाक में पड़ी पाइप के जरिए दिया जाता है।

अपने पति की इस हालत के लिए उनकी पत्नी प्रेमा देवी पास में बहती नाद नदी की गंदगी को जिम्मेदार बताती हैं। साड़ी के पल्लू से अपनी छलकी आंखों को पोछते वो कहती हैं, "मलेरिया हो गया था, कितना दिन से बुखार आते-आते ये हाल हो गया। बुखार छोड़ता ही नहीं। कर्जा लेकर इलाज करवाए हैं।"

नदी के काले-काले पानी को दिखाते हुए वो कहती हैं, "मनई और गोरू (आदमी और पशु) दोनों को इस नदी से दिक्कत है। नदी नहीं नरक है। जब हवा चलेगी बदबू से यहां बैठना मुश्किल हो जाएगा। हम तो मजबूरी में यहीं रहते हैं। पूरी कंपनी (पास की इंडस्ट्री) का पानी इसी में धकेल देते हैं। हम लोग गंदगी से कैसे बचेंगे। सरकार को चाहिए इसे बंद (गंदगी) कराए या कोई दूसरा रास्ता (गंदे पानी के लिए) बनाए।"

पिंडारा विधानसभा क्षेत्र में करखियांव इंडस्ट्रियल एरिया

प्रेमा देवी का गांव बिंदा, बनारस की पिंडारा विधानसभा क्षेत्र में आता है, जो वाराणसी जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर है। इस गांव के लोग नाद (नंद) नदी के प्रदूषण से काफी परेशान हैं। ग्रामीणों के मुताबिक नदी के प्रदूषण की मुख्य वजह पड़ोस का इंडस्ट्रियल एरिया है। उप्र राज्य औद्योगिक विकास निगम के करखियांव इंडस्ट्रियल एरिया यानी एग्रो पार्क फूड कंपनियों ने निकलने वाले अपशिष्ट के चलते नदी में प्रदूषण हुआ है। बनारस में विधानसभा चुनाव के सातवें चरण में 7 मार्च को मतदान है।

बिंदा गांव की प्रेमा देवी, पीछे चारपाई पर उनके पति जोखू राम प्रजापति। फोटो- अंकित कुमार सिंह

साल 2000 से लेकर 2015 तक ग्राम पंचायत के प्रधान रहे देवनाथ राम प्रजापति गांव के मुताबिक 2002 से पहले नदी का पानी इतना साफ था कि लोग सीधे उसमें से पानी पी लेते थे। देवनाथ प्रजापति गांव कनेक्शन को बताते हैं, "2002 से पहले इसका पानी बिल्कुल साफ था। हम लोग जब पशु चराने आते थे, तो इसके ऊपर का पानी हटाकर पी भी लेते थे, लेकिन आज के दिन में पशु पानी पी लेते हैं तो बीमार हो जाते हैं, मर जाते हैं। गांव के जो कुत्ते इस नदी से गुजर जाते हैं उन्हें खउरा (बाल झड़ना) रोग हो जाता है।"

वो आगे बताते हैं, "गंदगी इतनी ज्यादा है कि आसपास के 10-15 गांवों के लोग परेशान हैं। गांव में मलेरिया, टीबी और सांस के मरीज हो रहे हैं। मच्छर तो इतने ज्यादा है कि खाना खाते वक्त कुछ मच्छर मुंह में चले जाते हैं। जो किसान इस पानी से सिंचाई करते हैं वो भी अच्छी न होती है।"

नाद नदी, जिसे गांव के लोग नंदलाल या फिर नंद नदी भी कहते हैं। वो पड़ोसी जिले जौनपुर के मड़ियाहूं से निकलती है और आगे चलकर पहले गंगा की सहायक नदी वरुणा और फिर बलुआ घाट के पास गंगा में मिल जाती है। बिन्दा ग्राम पंचायत के पूर्व प्रधान देवनाथ राम प्रजापति ने गांव कनेक्शन को बताया कि नाद नदी के प्रदूषित होने से बिंदा समेत 11-12 गांव के लोग प्रभावित हैं।

नाद नदी (नंद नदी) में आकर मिलता एग्रो पार्क की तरफ से आ रहा दूषित पानी का नाला।

एग्रो पार्क में बिस्किट, दूध, कुरकुरे, खाद्य तेल की है इंडस्ट्री

यूपीएसआईडीसी द्वारा बनारस समेत पूर्वांचल में उद्योग को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिक क्षेत्र करखियांव में 166 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में ये औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया गया है। जिसमें ज्यादा कंपनियां खाद्य पदार्थ बनाती हैं। दूध, बिस्किट, कुरकुरे, खाद्य तेल, सिवईं, नूडल्स की दर्जनों इकाइयां हैं। ग्रामीणों के मुताबिक जब तक इंडस्ट्री कम थीं समस्या नहीं थी, जैसे-जैसे फैक्ट्रियां बढ़ीं नदी में प्रदूषित जल की मात्रा बढ़ती गई।

इसी गांव के रहने वाले मुन्ना लाल यादव के मुताबिक 2003-04 में करखियांव इंडस्ट्रियल एरिया में कंपनी स्थापित होना शुरू हो गया। लेकिन समस्या 2015 के बाद ज्यादा बढ़ी।

वह कहते हैं, "2002-03 में कंपनियां चालू हुईं लेकिन हालात ज्यादा 2015 के बाद खराब हुए। पहले कंपनियां कम थीं तो दिक्कत नहीं थी, अब बहुत बड़ी समस्या है। फैक्ट्रियां लगाने में हमारी ही जमीन गई, हम ही प्रदूषण झेल रहे हैं और हम लोगों को नौकरी मिलती भी है तो वही झाड़ू पोछा वाली।"

फैक्ट्रियों से निकलता अपशिष्ट

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक बनाई गई है जांच कमेटी, जारी हुई हैं नोटिस

एग्रो फूड पार्क की फैक्ट्रियों से छोड़े जाने वाले पानी में और उसकी व्यवस्था में दिक्कत है, इसकी जानकारी जिला प्रशासन को भी है और कार्रवाई भी हुई है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड वाराणसी के क्षेत्रीय अधिकारी कालिका सिंह के मुताबिक करखियान इंडस्ट्रियल एरिया (फूड पार्क) में ब्रेड, बिस्किट, खाद्य तेल, कैटल फीड जैसी इंडस्ट्री हैं, जहां से 3-4 महीने पहले प्रदूषण की शिकायत आई थी, जिस पर कार्रवाई की गई है।

कालिका सिंह ने गांव कनेक्शन से कहा, "फूड पार्क की इंडस्ट्री से जो अपशिष्ट पानी निकलता है, उसके लिए सभी ने ट्रीटमेंट प्लांट तो लगाया है लेकिन उसका संचालन समुचित ढंग से न होने के कारण कभी कभी गंदा पानी नांद नाला में गिराए जाने की बात सामने आई थी, जिस पर जिला प्रशासन कमेटी बनाई गई थी, इंडस्ट्री का निरीक्षण किया गया है। कंपनी प्रबंधन के साथ बैठकें हुई हैं। जो दोषी हैं, उन पर कार्रवाई हुई है। कारण नोटिस भेजे गए हैं। जल प्रदूषण अधिनियम 1974, वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम-1981 के 31 धारा के तहत नोटिस जारी की गई हैं। नोटिस के बाद उन्होंने अपने प्लांट सही कर लिए हैं, अब उसका निरीक्षण किया जाएगा। अगर तब कुछ गड़बड़ी पाई जाएगी तो उद्योग बंदी का अधिकार है।"

उधर, ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायत पर जांच कमेटी बनाई जाती हैं लेकिन क्या कार्रवाई होती है ये पता नहीं चलता। पूर्व प्रधान देवनाथ राम प्रजापति कहते हैं, "कुछ साल समय पहले हमारे गांव के पुन्नवासी यादव की तीन गाय मर गई थीं और एक पड़ोसी की भैंस मर गई थी, जिसके बाद हमने तहसील दिवस में शिकायत की थी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कहा था, जांच करने वाले आए और कोरम पूरा करके चले गए, जांच में कभी ग्रामीणों को शामिल नहीं किया जाता है।"

नाद नदी का काला पानी।

10 साल में बढ़े त्वचा रोग, एलर्जी और पीलिया और टाइफाइड जैसी बीमारियों के मरीज-डॉक्टर

वाराणसी के एसएसपीजी मंडलीय जिला चिकित्सालय कबीरचौरा में वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ और बिंदा गांव के इलाके में पिछले 30 वर्षों से क्लीनिक चला रहे है डॉ. रंगनाथ दूबे के मुताबिक पिछले 10 वर्षों में इलाके के कई गांवों में जल जनित और सांस, अस्थमा संबंधी मरीजों की संख्या बढ़ी हैं।

डॉ. रंगनाथ दूबे फोन पर गांव कनेक्शन को बताते हैं, "मैं फूलपुर में करीब 30 साल से प्रैक्टिस कर रहा हूं। और अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि पिछले 10 वर्षों में त्वचा रोग, एलर्जी, अस्थमा, पीलिया के मरीजों की संख्या बढ़ी है। टाइफाइड के मरीजों की बाढ़ सी आ गई है। जल जनित बीमारियां बढ़ी हैं, फिर चाहे वो टाइफाइड हो या आंतड़ियां बुखार। ये समस्या बच्चों और बुजुर्ग लोगों में ज्यादा है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है।"

नाद नदी के प्रदूषण बारे में पूछने पर वो कहते हैं, "हमने अपने द्वारा कराई जांच में पाया है कि इसमें शरीर के लिए हानिकारक हैवी मेटल्स, मरकरी, लेड हैं। यहां पर जब मानसून के दौरान जब नदी ओवरफ्लो होती है तो त्वचा रोग के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। धुआं धक्कड़ से अलग दिक्कत हो रही है।"

स्थानीय लोगों के मुताबिक पानी के साथ उनके यहां की हवा से भी दिक्कत हो रही है। बिंदा गांव के पूर्व प्रधान देवनाथ राम प्रजापति कहते हैं, " अगर आप अपने आँगन में एक बाल्टी पानी रख दो तो वो कुछ ही देर में उसमें काली-काली राख की परत जम जाएगी, क्योंकि फैक्ट्रियों से निकलने वाली राख उड़ती रहती है।"

नाद नदी असबरनपुर गांव में बिल्कुल साफ है जबकि 3 किलोमीटर आगे बिंदा गांव में नदी नाला बन गई है।

इंडस्ट्री का नाला गिरने से पहले बिल्कुल साफ है नदी

ग्रामीणों के मुताबिक गंदगी इंडस्ट्रियल एरिया से ही हो रही है। वहां से काला-काला पानी नाले में छोड़ा जाता है। जबकि इसी गांव के तीन किलोमीटर पहले के गांव में नांद नदी का पानी एकदम स्वच्छ है। गांव कनेक्शन की टीम बिन्दा गांव से पश्चिम में असबरनपुर गांव (जौनपुर जिला) पहुंची, जहां इंडस्ट्री का पानी इस गांव के बाद नाद नदी में गिरता है। वहां नंदलाल नदी यानि नाद नदी आज भी स्वच्छ और धीमी गति के साथ बहती हुई नजर आई।

असबरनपुर गांव के रहने वाले राज कुमार बिंद ने कहा, "हम लोग आज भी नाद नदी के पानी से फसलों की सिंचाई और जानवरों को पानी पीने के उपयोग में लाते हैं। हमारे यहां का पानी बिल्कुल साफ है। हम लोग भाग्यशाली हैं कि गांव पर नाद नदी का आशीर्वाद है।"

अपनी बात खत्म करते हुए उन्होंने ये भी कहा कि बिन्दा गांव के पास नदी पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है,जिसे देखकर लगता ही नहीं है यहीं नाद नदी है।

राज कुमार बिंद नदी की जिस पुलिया (छोटा पुल) पर बैठकर बात कर रहे थे, उसके पीछे बहती नदी का पानी इतना साफ था कि दूर से तलहटी (नदी का तल) नजर आ रहा था।

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