महंगा चूनी चोकर और मजदूरों की कमी पशुपालन और डेयरी इंडस्ट्री की राह का रोड़ा 

महंगा चूनी चोकर और मजदूरों की कमी  पशुपालन और डेयरी इंडस्ट्री की राह का रोड़ा चूनी-चोकर के साथ भूसा आदि महंगा होने से पशुपालन महंगा हो गया है।

अकर्रा रसूलपुर (शाहजहांपुर)। विजय सिंह (30 वर्ष) के पास पांच साल पहले दो गाय और दो भैंस थी, लेकिन आज उनके पास सिर्फ एक ही भैंस बची है। महंगाई और देख-रेख में आने वाली मेहनत की वजह से उन्हें अपने पशुओं को बेचना पड़ा।

महंगा हो रहा चारा और भूसा

शाहजहांपुर जिले से उत्तर दिशा में लगभग 20 किलोमीटर दूर अकर्रा रसूलपुर गाँव में विजय सिंह रहते हैं। अजय बताते हैं, ‘‘अब तो एक भैंस ही पालना कठिन होता है। चारा और भूसा इतना ज्यादा महंगा हो गया है कि उनका पेट भरना ही मुश्किल हो जाता है और पशु को जितना खिलाओ उतना ही दूध मिलता है।’’

चारे की कमी को पूरा करने के लिए पशुपालन विभाग द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही है।

100 रुपये में एक दिन का चारा

विजय सिंह अपनी भैंस को एक समय में एक किलो चारा और एक किलो भूसा देते हैं। बाजार में इस समय चारे की कीमत 400 रूपये क्विंटल और भूसे की कीमत 800 रूपये क्विंटल है। उनकी भैंस एक दिन में करीब 100 रुपए का चारा खा जाती है।

पहले हर घर में होते थे 4-5 पशु

वहीं, अकर्रा गाँव-गाँव के छोटेलाल (35 वर्ष) के पास पहले दुधारु पशु हुआ करते थे और दूध बेचकर ही आमदनी होती थी। कुछ साल पहले तक उनके पास तीन भैंसे थीं, जो उन्हें अब बेचनी पड़ी। वह अब बाजार से थोक के भाव दुध खरीद कर फुटकर में बेचते हैं। गाय-भैंसों पर ज्यादा खर्च के चलते उन्होंने पशुओं को बेचना ठीक समझा। छोटेलाल बताते हैं, ‘‘पहले हर घर में चार-पांच पशु होते थे पर अब चारा इतना महंगा हो गया कि उन्हें पालन बहुत महंगा हो गया है।’’

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बहुत लगती है मेहनत भी

छोटेलाल पहले संयुक्त परिवार में रहते थे, तब उनके घर में एक दर्जन से ज्यादा पशु हुआ करते थे, लेकिन परिवार में बंटवारा होने के बाद चार भाईयों में तीन-तीन पशु बंट गए। परिवार अलग होने के बाद हर व्यक्ति को खेती और पशुओं पर अकेले ही ध्यान देना पड़ रहा है। ‘‘अब लोग इतनी मेहनत नहीं कर पाते है कि वो खेती भी करें और गाय-भैंसों की सेवा भी करें।’’ छोटेलाल बताते हैं।

नौकरी के लिए चले जाते हैं शहरों में

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री प्रोफेसर एएल श्रीवास्तव बताते हैं, ‘‘संयुक्त परिवार अब छोटे परिवारों में बदल गये हैं और दूसरा कारण ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अब रोजगार के लिये शहर चले जाते हैं। कुछ समय बाद जो लोग गाय-भैंसों को रख रहे हैं, वो भी नहीं रखेंगे। चारा और भूसा इतना महंगा है कि वो पशुओं को ठीक तरह से समपोषित नहीं कर पाते हैं। इसका अगर व्यावसायिक दृष्टिकोण देखें तो अब दूध में वो व्यावसायिक आकर्षण नहीं रह गया है।’’

आंकड़ों की जुबानी पशुपालन का हाल

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के 2010-11 के आंकड़ों के अनुसार, इस देश में 10,301 हेक्टेयर चारागाह हैं, जिसमें भी पिछले दो दशको में 1,100 हेक्टेयर चरागाह खत्म हो गए। लगभग 53 करोड़ पशुधन भारत में हैं, भारतीय पशुपालन विभाग की रिपोर्ट की मानें तो साल 2003 में 18 करोड़ 51 लाख 80 हजार पशु थे, जो साल 2009 में घटकर महज 16 करोड़ रह गए हैं।

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लोगों के पास अब ज्यादा खेत नहीं बचे हैं, जगह नहीं हैं कि वो एक-दो से ज्यादा गाय-भैसों को पाल सकें। इसमें मुख्य बात यह भी है कि लोग अब दुधारू पशुओं पर मेहनत नहीं करना चाहते हैं।
डॉ. पीके त्रिपाठी, संयुक्त निदेशक, उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग

ग्राम पंचायतें करें सस्ते चारे की व्यवस्था

जहां एक ओर भारत विश्व में सबसे बड़ा पशुधन संख्या वाला देश है, वहीं अब ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गाय-भैंसों को पालने से कतराते हैं। कृषि मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2013-14 के अनुसार, भारत में विश्व की 56.8 प्रतिशत भैंसे और 14.5 प्रतिशत गोपशु हैं। अगर दुधारू पशुओं की संख्या बढ़ानी हो तो जरूरी होगा कि ग्राम पंचायतें सरकार सस्ते चारे की व्यवस्था करें और हरे चारे बांटे जाये ताकि ग्रामीण लोग गाय-भैंसों को पाल सकें।

पुष्पा रानी (45) किसानी करती हैं। पुष्पा बताती हैं, "हमारे गाँव मे कई ऐसे परिवार थे। जहां पहले दस गाय-भैंस थी पर अब एक भी नहीं है। अब समय बदल गया है। लोगों के पास इतना समय नहीं है कि वो जानवरों को पालन-पोषण करें।

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