मशरुम गर्ल ने उत्तराखंड में ऐसे खड़ी की करोड़ों रुपए की कंपनी, हजारों महिलाओं को दिया रोजगार

मशरुम गर्ल ने उत्तराखंड में ऐसे खड़ी की करोड़ों रुपए की कंपनी, हजारों महिलाओं को दिया रोजगारदिव्या रावत उत्तराखंड में मशरुम की ब्रांड एंबेसडर भी हैं।

लखनऊ/देहरादून। महिला किसान की बात करने पर लोगों के जेहन में अभी तक सिर्फ महिला मजदूरों की तस्वीर आती थी, लेकिन कुछ महिलाएं सफल किसान बनकर इस भ्रम को तोड़ रही है। उत्तराखंड की दिव्या रावत मशरूम की खेती से सालाना एक करोड़ से ज्यादा की कमाई करती है, उनकी बदौलत पहाड़ों की हजारों महिलाओं को रोजागार भी मिला है। दिव्या के सराहनीय प्रयासों के लिए पिछले वर्ष राष्ट्रपति ने इन्हें नारी शक्ति अवार्ड से सम्मानित किया था।

दिव्या ने अपनी मेहनत और लगन से असम्भव काम को सम्भव कर दिखाया। पांच वर्ष की इनकी मेहनत से पलायन करने वाले लोगों की संख्या यहां कम हो रही है। दिव्या कई राज्यों के रिसर्च सेंटर से सीखकर मशरुम की खेती यहां की हजारों महिलाओं को सिखा रही हैं। कम पैसे से यहां के लोग कैसे मशरूम की शुरूवात कर सकते हैं इस बात का दिव्या ने खास ध्यान दिया है।

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मशरुम के साथ दिव्या रावत

पलायन रोकने के लिए दिल्ली से लौटी उत्तराखंड

उत्तराखंड राज्य के चमोली (गढ़वाल) जिले से 25 किलोमीटर दूर कोट कंडारा गाँव की रहने वाली दिव्या रावत दिल्ली में रहकर पढ़ाई कर रही थी, लेकिन पहाड़ों से पलायन उन्हें परेशान कर रहा था, इसलिए 2013 में वापस उत्तराखंड लौटीं और यहां मशरूम उत्पादन शुरु किया। दिव्या फोन पर गांव कनेक्शन को बताती हैं, "मैंने उत्तराखंड के ज्यादातर घरों में ताला लगा देखा। चार-पांच हजार रुपए के लिए यहां के लोग घरों को खाली कर पलायन कर रहे थे जिसकी मुख्य वजह रोजगार न होना था। मैंने ठान लिया था कुछ ऐसा प्रयास जरुर करूंगी जिससे लोगों को पहाड़ों में रोजगार मिल सके।" सोशल वर्क से मास्टर डिग्री करने के बाद दिव्या रावत ने दिल्ली के एक संस्था में कुछ दिन काम भी किया लेकिन दिल्ली उन्हें रास नहीं आई।

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अपने सहयोगियों के साथ दिव्या।

अब सालाना करोड़ों का टर्नओवर करती है दिव्या की कंपनी

दिव्या रावत ने कदम आगे बढ़ाए तो मेहनत का किस्मत ने भी साथ दिया। वो बताती हैं, "वर्ष 2013 में तीन लाख का मुनाफा हुआ, जो लगातार कई गुना बढ़ा है। किसी भी साधारण परिवार का व्यक्ति इस व्यवसाय की शुरुवात कर सकता हैं । अभी तक 50 से ज्यादा यूनिट लग चुकी हैं जिसमे महिलाएं और युवा ज्यादा हैं जो इस व्यवसाय को कर रहे हैं ।" मशरूम की बिक्री और लोगों को ट्रेनिंग देने के लिए दिव्या ने मशरूम कम्पनी 'सौम्या फ़ूड प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी' भी बनाई है। इसका टर्नओवर इस साल के अंत तक करीब एक करोड़ रुपए सालाना का हो जाएगा।

दिव्या खुद तो आगे बढ़ी ही हजारों और लोगों को मशरूम की खेती के लिए प्रेरित भी किया। उन्होंने लोगों को भी मशरूम का बाजार दिलवाया। पहाड़ों पर मशरुम 150 से 200 रुपये में फुटकर में बिकता है। ये लोग अब सर्दियों में बटन, मिड सीजन में ओएस्टर और गर्मियों में मिल्की मशरूम का उत्पादन करते हैं। बटन मशरूम एक महीने में ओएस्टर 15 दिन में और मिल्की मशरूम 45 दिन में तैयार हो जाता है। दिव्या कहती हैं, "मैंने लोगों को बताने के बजाय खुद करके दिखाया जिससे उनका विश्वास बढ़ा।"

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पहाड़ों के जिन घरों में लटके थे ताले अब वहां उग रहे हैं मशरूम

दिव्या बताती हैं, पढ़ाई के दौरान जब कभी वो घर लौटती थीं अधिकांश घरों में ताले लटके मिलते थे। 4000 से 5000 की नौकरी के लिए स्थानीय लोग दिल्ली जैसे शहर भाग रहे थे। दिव्या की बातों में दम भी है। रोजगार के लिए पहाड़ों से पलायन करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट की माने तो पिछले 17 वर्षों में करीब 20 लाख लोग उत्तराखंड को छोड़कर बड़े शहरों में रोजी-रोटी तलाश रहे हैं। दिव्या की बदौलत अब इनमें से हजारों घरों में लोग 10-15 हजार रुपये की कमाई करते हैं। मशरूम ऐसी फसल है जिसमें लागत काफी कम आती है। 20 दिन में उत्पादन शुरु हो जाता है और करीब 45 दिन में ही लागत निकल आती है। दिव्या ने मशरूम की खेती को इतना सरल कर दिया है कि हर व्यक्ति इसे कर सकता है।

पहाड़ों की हजारों महिलाएं उगाने लगी हैं मशरुम।

उत्तराखंड सरकार ने बनाया मशरुम की ब्रांड अंबेसडर

उत्तराखंड सरकार ने दिव्या के इस सराहनीय प्रयास के लिए उसे 'मशरूम की ब्रांड एम्बेसडर' घोषित किया। दिव्या और उनकी कंपनी अब तक उत्तराखंड के 10 जिलों में मशरूम उत्पादन की 53 यूनिट लगा चुके हैं। एक स्टेंडर्ड यूनिट की शुरुवात 30 हजार रुपये में हो जाती है जिसमे 15 हजार इन्फ्रास्ट्रक्चर में खर्च होता है जो दसियों साल चलता है, 15 हजार इसकी प्रोडक्शन कास्ट होती है।

दिव्या कहती हैं, हम लोग, लोगों को रोजगार नहीं देते बल्कि उन्हें सक्षम बनाते हैं गांव-गांव जाकर लोगों को ट्रेनिंग दी है। अब उसका असर नजर आ रहा है लोग भी ये काम करना चाहते हैं। इस साल तक इन यूनिट की संख्या करीब 500 पहुंच जाएगी।"

सड़क पर खुद खड़ी होकर बेचती हैं मशरुम

ब्रांड अम्बेसडर होने के बावजूद वो रोड खड़े होकर खुद मशरूम बेचती हैं, जिससे वहां की महिलाओं की झिझक दूर हो और वो खुद मशरूम बेंच सके। दिव्या का कहना है अभी उत्तराखंड में इतना मशरूम पैदा नहीं हो रहा है कि उसका बाहर निर्यात किया जा सके, यहाँ मशरूम की बहुत खपत है। वो बताती हैं, पहाड़ की महिलाएं बहुत धैर्यवान होती हैं, मशरूम उन्हें धनवान भी बनाएगा।

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