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बुनकरों का अनोखा प्रयास : गरीब बच्चों को पढ़ाने की जिद थी, जहां जगह मिली वहीं शुरू की कोचिंग क्लास

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   21 Aug 2017 12:36 PM GMT

बुनकरों का अनोखा प्रयास : गरीब बच्चों को पढ़ाने की जिद थी, जहां जगह मिली वहीं शुरू की कोचिंग क्लासखुले में क्लास लेते बच्चे।

भदोही। उत्तरप्रदेश के भदोही जिले में औराई विधानसभा के अंतर्गत एक गांव आता है सरई मिश्रानी। गांव में जाने के लिए आपको कोई उपयुक्त साधन नहीं मिलेगा।

जितना छोटा यह गांव है उससे बड़ा यहां के युवाओं का हौसला है। यह गांव आपको तब और आश्चर्यचकित कर देगा जब आप यहां किसी के घर के बाहर या कहीं बगीचे में 200 से 400 की संख्या में बच्चों को पढ़ते देखेंगे। दरअसल यहां के युवाओं की एक टोली गरीब और असमर्थ बच्चों के लिए निशुल्क कोचिंग संचालित कर रही है जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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हम तो पढ़ नहीं पाए, इसलिए पढ़ा रहे

बात मार्च 2014 की है। गोपाल बिंद पढ़ लिखकर कुछ बनना चाहते थे। खुद तैयारी कर वे प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल हुए, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। घर की स्थिति भी ठीक नहीं थी जिस कारण कोचिंग नहीं कर पाए। यहीं से मन खिन्न हुआ और गोपाल ने फैसला किया कि पैसे के अभाव में कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न रह जाए और यहीं से शुरुआत हुई जय हिंद निशुल्क कोचिंग सेंटर की।

15 बच्चों से शुरू हुआ कारवां 2723 तक पहुंचा

गोपाल की इस जिद में उनके सहयोगी बने अजीत कुमार बिंद, रविंद्र कुमार और मनीषा बिंद। चंदे से शिक्षण सामग्री खरीदी और 15 बच्चों से कोचिंग की शुरुआत हुई। मौजूदा समय में नौ गांवों में कोचिंग संचालित हो रही जिसमें एलकेजी से कक्षा 12 वीं तक के बच्चे निशुल्क शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। पढऩे वाले छात्रों में 80 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूलों के हैं और 20 प्रतिशत कॉन्वेंट स्कूलों के।

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बगीचे और अस्पताल में चला रहे क्लास

कोचिंग चलाने वाले गोपाल बताते हैं "उनके पास किराया वहन के लिए पैसे नहीं हैं। ऐसे में ज्यादातर सेंटर बगीचे तो किसी के घर के बाहर संचालित किए जा रहे हैं। इस बीच अगर मौसम खराब होता है तो पास के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या फिर पंचायत भवन में बच्चों को पढ़ाते हैं"।

बने 180 सहयोगी

कोचिंग में बच्चों को पढ़ाने वाले कुल 180 लोग हैं, जिसमें 30 छात्राएं भी हैं जो खुद पढ़ती और बच्चों को भी पढ़ाती हैं। अन्य लोगों में ज्यादातर बुनकर हैं और कालीन की बुनाई करते हैं। कोचिंग के संचालक गोपाल भी खुद कालीन बुनते हैं। सुबह 6 से 8 और शाम 4 से 6 तक कक्षाएं लगाई जाती हैं। कोचिंग में बच्चों के उत्साहवर्धन के लिए हर शनिवार को टेस्ट भी लिया जाता है। टेस्ट में बेहतर प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कृत भी किया जाता है।

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पहले चलते थे 12 सेंटर

पहले 12 गांवों में कोचिंग संचालित की जाती थी, लेकिन कालीन का धंधा मंदा होने के कारण टीम से कुछ लोग बाहर चले गए जिस कारण तीन सेंटर बंद करने पड़े। कुछ दिन कक्षाएं भी बाधित रहीं, लेकिन युवाओं का उत्साह डिगा नहीं। स्थिति ठीक होते ही फिर कक्षाएं संचालित होने लगीं। इस बारे में गोपाल कहते हैं कि “हमें कुछ सेंटर अाैर बंद करने पड़ रहे हैं। आर्थिक मदद न मिल पाने के कारण हमें एसा करना पड़ रहा है।”

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