'डाकिए अब चिट्ठी नहीं, सिर्फ सरकारी डाक लेकर आते हैं'

"हमने कहा, साहब रजिस्टर रख दीजिये हम डेली साइन लगा कर जाया करेंगे। हम तो हर रोज़ आते हैं, आपके लिए चिट्ठियां आनी कम हो गयी हैं। जो आती हैं वो बस सरकारी डाकें,"

Jigyasa MishraJigyasa Mishra   15 Oct 2018 10:25 AM GMT

डाकिए अब चिट्ठी  नहीं,  सिर्फ सरकारी डाक लेकर आते हैं

राष्ट्रीय डाक सप्ताह (9 -15 अक्टूबर) पर गाँव कनेक्शन की डाकियों और डाक का इंतज़ार करते लोगों से बातचीत


खनऊ: "पहले तो अक्सर गलियों के बाहर डाकिये दिख जाते थे लेकिन अब अगर खाकी कपड़ों में साइकिल की घंटी बजाता कोई डाकिया दिख जाता है तो बड़ी बात होती है। अब नहीं दिखते हैं डाकिये," ये कहना है स्नातक की पढाई कर रहे गौरव तिवारी का।

पांचवी में पढ़ रही कृति फडणीस ने तो आज तक कभी डाकिया देखा ही नहीं। "मैंने स्कूल में पढ़ा है, पोस्टमैन वो होता है जो लेटर्स (चिट्ठियां) लाता है, पर कभी हमारे यहाँ नहीं लाया," वो बताती है।

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ऐसे कुछ सवालों के जवाब के लिए हमने डाकघर में मौजूद पोस्ट-मास्टर नीलेश श्रीवास्तव और अपनी डाकों को छांटते कुछ डाकियों से बात की।

"हम से एक आई ए एस साहब ने भी एक दिन यही सवाल पूछा था कि तुम हर रोज़ तो नहीं आते!" करीब 25 वर्षों से साइकिल पर चिट्ठियां बाटने वाले अम्बिका, हँसते हु बताते हैं। "हमने कहा, साहब रजिस्टर रख दीजिये हम डेली साइन लगा कर जाया करेंगे। हम तो हर रोज़ आते हैं, आपके लिए चिट्ठियां आनी कम हो गयी हैं। जो आती हैं वो बस सरकारी डाकें," वो आगे बताते हैं।

"हम डाकियों के काम में कोई कमी नहीं हुई है, अब तो पहले से काफी ज़्यादा काम हो गया है। हाँ, डोमेस्टिक डाकेँ, जैसे चिट्ठियां और मनी-आर्डर अब ख़तम होते जा रहे हैं लेकिन उतनी ही तेज़ी से कमर्शियल डाकों में बढ़ोत्तरी भी हुई है," 20 वर्षों से लखनऊ में डाकिये का काम करने वाले, भूषण तिवारी बताते हैं।

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"अस्सी के दशक में शहरों में टेलीफोन के साथ ही फैक्स की सुविधा भी उपलब्ध हो गई थी। हाथ से लिखी या फिर टाइप की हुई चिट्ठी कुछ ही मिनट में दूर से दूर पहुंच जाती थी, अभी भी यह सुविधा उपलब्ध है लेकिन ''गिट-गर" वाला विभाग बन्द हो गया है। कम्प्यूटर के माध्यम से आप दुनिया के किसी कोने में सेकंडों मे ई-मेल यानी पत्र भेज सकते हैं। गाँवों में अब बैलगाड़ी हांकते हुए और हल चलाते हुए किसानों के हाथ में मोब़ाइल फोन देख सकते हैं। मानो सारी दुनिया उनकी मुट्ठी में आ गयी हो। शहरों में ऐसे टेलीफोन आ गए हैं जिनमें फोन करने वाले का नम्बर तो दिखाई पड़ ही जाता है उसकी फोटो भी दिख जाती है। फोन की घंटी बजे आप नम्बर और फोटो देखकर चाहें तो बात करें या न करें," डॉक्टर शिव बालक मिश्र, भूगर्भ विशेषज्ञ और गाँव कनेक्शन के प्रधान सम्पादक बताते हैं।

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