मुर्गियों का वजन बढ़ाने के लिए हो रहा एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध प्रयोग हो सकता है घातक

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लखनऊ। पशु-पक्षियों को जीवाणुजनित रोगों से बचाने के लिए पशुपालक एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल करते हैं पर ज़्यादातर मुर्गीपालक ज़्यादा मुनाफे के लिए पक्षियों का वजन बढ़ाने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इसकी ज्यादा मात्रा घातक हो सकती है।

“पशु-पक्षियों में बैक्टीरिया के द्वारा जो भी जीवाणुजनित रोग होते हैं उनको रोकने के लिए उपचार के रूप में एंटीबायोटिक दवाओं का निर्धारित मात्रा में प्रयोग किया जाता है। दुधारू पशुओं की अपेक्षा इन दवाओं का प्रयोग पोल्ट्री में ज़्यादा होता है क्योंकि एंटीबायोटिक दवाओं के प्रयोग से मुर्गियों की समय से जल्दी बढ़वार होती है और वजन भी ज़्यादा होता है जो बाजार में महंगे दामों में बिकता है।’’ लखनऊ स्थित पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डाॅ. वीके. सिंह ने बताया।

डॉ सिंह आगे बताते हैं, ‘‘चारे में एंटीबायोटिक दवाओं को मिलाने से पक्षियों में प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है, जिससे उनमें संक्रमण (इंफेक्शन) नहीं फैलता है और उनकी बढ़वार जल्दी होती है जिससे उनके वजन भी काफी तेजी से बढ़ता है, जब मुर्गियों को एंटीबायोटिक मिश्रित आहार दिया जाता है तो उनका वजन बढ़ता है। इसी वजह से किसान थोक में एंटीबायोटिक खरीदते हैं और उसे उनके चारे में मिला देते हैं। या वे किसी बड़ी पोल्ट्री से एंटीबायोटिक मिला हुआ तैयार चारा ही ख़रीद लेते हैं जिसके लेबल पर यह दावा किया गया होता है कि इससे चिकन के मांस में वृद्धि होगी।’’

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लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में गोसाईंगंज ब्लॉक के चांदसराय गाँव के मुर्गीपालक ने नाम न बताने की शर्त पर बताया,‘‘मुर्गियों को एंटीबायोटिक मिश्रित आहार देने से उनका वजन बढ़ता है और अच्छे दामों पर बिकता है। मैं ही नहीं कई मुर्गीपालक ऐसा करने के लिए पक्षियों में एंटीबायोटिक का प्रयोग करते है।’’ वो आगे बताते हैं, ‘‘बाड़े में मुर्गियां झुंड और गंदी जगहों पर अपने चूजे को जन्म देती हैं इसलिए शुरुआत में एंटीबायोटिक दवाओं का प्रयोग ज़्यादा करते है ताकि उनमें बैक्टीरिया मर जाए।’’

मुर्गियों के आहार के लिए भारतीय मानक ब्यूरो ने निर्देश दिए हैं जिसके मुताबिक एंटीबायोटिक का उपयोग इनके विकास के लिए नहीं किया जाना चाहिए, हालांकि इसे भी अनिवार्य नहीं बनाया गया है। ऐसे में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर कोई रोक नहीं है।

किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के मेडिसिन विभाग के डॉ़ अजय वरदान बताते हैं, ‘‘कई बार लोग बीमार होने पर एंटीबायोटिक दवा खाते हैं, यह शरीर में बीमारी फैलाने वाले कीटाणु को मारने के लिए खाई जाती है। ऐसे में अगर एंटीबायोटिक दवा असर नहीं करती है तो उस असर को एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस कहते हैं।’’

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एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस का असर समझाते हुए डॉ. अजय ने बताया, ‘‘शरीर में एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस होने के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें ऐसा संभव है कि अगर व्यक्ति मांसाहारी है,जो मांस खाता है उसमें एंटीबायोटिक पहले से मौजूद हो जो खाने वाले के शरीर में आ गया हो। इससे शरीर में पहले से ही उसे एंटीबायोटिक के शरीर में होने से जब उस दवा को खाया जाएगा तो वह असर नहीं करेगी। ऐसे में इस बात की संभावना रहती है कि शरीर में मौजूद कीटाणु उस दवा का आदि हो चुका हो।’’

हर एंटी बायोटिक दवा को खाने के लिए विशेष सलाह की जरूरत होती है, ‘‘कोई भी एंटी बायोटिक दवा की मात्रा और कितनी दिनों को अंतर पर खाना है यह हर दवा के लिए अलग-अलग होता है ऐसे में यह दवाएं बिना डॉक्टरी सलाह के नहीं खानी चाहिए।’’

पक्षियों में एंटीबायोटिक दवाओं के प्रयोग से मनुष्य में पड़ने वाले असर के बारे में कुम्हरावां के डॉ. रामगोपाल यादव बताते हैं, “बकरे और मुर्गिंयों में इन दवाओं का प्रयोग ज़्यादा किया जाता है। अगर कोई व्यक्ति एंटीबायोटिक चिकन खाता है तो जब कभी बीमार हो जाने पर डॉक्टर एंटीबायोटिक दवाएं देता तो उस दवा का उस व्यक्ति पर कोई असर नहीं पड़ता है क्योंकि चिकन के माध्यम से उस व्यक्ति के शरीर में पहले से ही एंटीबायोटिक की मात्रा रहती है। हालांकि कुछ पशुपालक मुर्गियां किसी बीमारी से ग्रस्त न हो जाएं इसके लिए एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि वे बड़े झुंड में और बेहद गंदी जगहों पर अपने चूजे को जन्म देती हैं। इसी वजह से मुर्गीपालक अक्सर पीने के पानी में एंटीबायोटिक मिलाते हैं ताकि वे किसी बीमारी के प्रकोप से बची रहें।”

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