हरियाणा के झज्जर में 500-600 एकड़ फसल पानी में डूबी, किसान बोले- "न मुआवजा मिलता है न कंपनियां बीमा करती हैं"

हरियाणा के झज्जर जिले के कई गांवों में पिछले 20-25 दिनों से 500-600 एकड़ जमीन पर कई फीट पानी भरा हुआ। बीमा कंपनियां धान के सीजन में यहां बीमा नहीं करती हैं। सरकार से किसानों को मुआवजा नहीं मिलता।

Arvind ShuklaArvind Shukla   3 Aug 2021 10:26 AM GMT

हरियाणा के झज्जर में 500-600 एकड़ फसल पानी में डूबी, किसान बोले- न मुआवजा मिलता है न कंपनियां बीमा करती हैं

हरियाणा के झज्जर जिले में सैकड़ों एकड फसलों में 3-6 फीट तक पानी भरा है। फोटो- via सुमित डागर

हरियाणा के किसान संजीव धनखड ने इस बार 11 एकड़ में बासमती धान की रोपाई की थी लेकिन जुलाई में भारी बारिश होने से उनकी पूरी फसल डूब गई। पिछले करीब 20 दिनों से खेतों में 5-6 फीट पानी भरा है। उनके मुताबिक आसपास के गांवों की करीब 600 एकड़ फसल पानी में बर्बाद हो गई है।

"अकेले मेरे गांव में कम से कम 150-200 एकड़ जमीन पर 20 दिनों से पानी खड़ा (जलभराव) है। हमने बासमती की 1121 किस्म लगाई थी प्रति एकड़ करीब 15 हजार की लागत आती है। अकेले मेरे ही कम से कम 1.5 लाख रुपए का नुकसान हुआ है। पूरे इलाके को मिलाएंगे तो लाखों का हिसाब बैठेगा। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं है। सरकार न मुआवजा देती है न फसल कंपनी बीमा करती है।" संजीव धनखड़ (46वर्ष) मायूसी के साथ बताते हैं।

संजीव का गांव छुड़ानी हरियाणा के झज्जर जिले में आता है, जो जिला मुख्यालय से करीब 5 किलोमीटर है। स्थानीय किसानों और मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक छुड़ाना, बेरी, कबलाना, ढुलेड़ा. खरमान समेत आसपास के कई गांवों की करीब 500-600 एकड़ फसल बर्बाद हो गई है। संजीव के मुताबिक उनके गांव में 3000 से ज्यादा किसान होंगे। और हर किसान का नुकसान हुआ है।

झज्जर जिले के छुड़ानी गांव के आसपास भरा पानी। फोटो- via सुमित डागर

गांव में ये तबाही बरसाती पानी निकालने के लिए बनी नहर (ड्रेन) से आई है। रोहतक इलाके से आया बरसाती पानी इसी नहर से दिल्ली की तरफ जाकर यमुना नदी में गिरता है। लेकिन ये अक्सर टूट जाती है, जिससे कई इलाकों में किसानों का भारी नुकसान होता है।

2021 से पहले 2019 में भी इस इलाके में भारी नुकसान हुआ था। इस बारिश ज्यादा बारिश के चलते निचले इलाकों में किसानों को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।

"हरियाणा के 22 में से 19 जिलों में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई है। एक जून से लेकर 2 अगस्त तक प्रदेश में 224.1 मिलीमीटर बारिश होनी थी जबकि 321.4 मिलीलीटर बारिश हुई। जो सामान्य से करीब 43 फीसदी ज्यादा है।" हरियाणा के मौसम वैज्ञानिक प्रो. एमएल खिच्चर बताते हैं। प्रो. खिच्चर हिसार के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में कृषि मौसम विभाग के मुखिया और ग्रामीण कृषि मौसम सेवा के प्रमुख नोडल अधिकारी हैं।

छुड़ानी गांव के युवा किसान सुमित डागर (32 वर्ष) गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "सर हम लोगों की दिक्कत ये है कि हर 2-3 साल में ऐसे ही पानी भरता है। जिस तरह पानी भरा है उससे धान की फसल तो गई ही, पानी जल्द नहीं गया नमी ज्यादा रहने से गेहूं की फसल की बुवाई भी नहीं हो पाएगी। हर साल नहर टूट जाती है और खेत डूब जाते हैं।"

सुमित और दूसरे किसानों ने जो तस्वीरें भेजी हैं, उनमें दूर-दूर तक पानी ही नजर आ रहा है।

बरसात का पानी निकालने के बनी नहर के टूटने पर भरता है पानी

राजस्व विभाग में पटवारी प्रदीप खत्री गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "ये दिक्कत ड्रेन (नहर) के ओवरफ्लो होने से हुई है। छुड़ानी गांव के आसपास करीब 400 एकड़ में जरुर पानी भरा है। वहां सरकार ने 5 बिजली वाले पंप लगा रखे हैं लेकिन बारिश इतनी ज्यादा हुई है कि पंप से काम नहीं चल पा रहा। धान की फसल का नुकसान हुआ।"

पटवारी प्रदीप खत्री के मुताबिक बिजली वाले पंप कुछ दिन चले फिर इसलिए बंद करने पड़े क्योंकि ड्रेन आगे भी कई जगह टूटा था और दूसरे गांवों में भी पानी भरने लगा था इसलिए सरकार ने रुकवा दिया।

वो आगे कहते हैं, "हम प्रभावित इलाके में 2-3 दिन में जाते हैं। रिपोर्ट डीसी (डिस्ट्रिक कलेक्टर) को सौंप दी है। वो खुद भी गए थे। 5 अगस्त से गिरदावरी शुरु होनी है लेकिन गिरदावरी तो वहां होगी जहां फसल होगी वो पूरा पानी ही पानी है।"

संजीव कुमार के मुताबिक सरकार ने जब से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत हुई, सरकार ने अपनी तरफ से मुआवजा देना बंद कर दिया। लेकिन इस इलाके में कंपनियां भी बीमा नहीं करती है।

"2017 में मिला था फसल बीमा योजना का पैसा उसके बाद बीमा ही बंद हो गया"

"साल 2017 भी हमारी फसल डूबी थी तो 16 हजार रुपए प्रति किल्ले (एकड़) बीमा मिला था, उसके बाद कंपनी ने कहा यहां तो पानी नहर के टूटने से आता है ऐसी जगह का हम बीमा नहीं करेंगे। उसके बाद 19 में भी बहुत नुकसान हुआ था लेकिन कोई पैसा नहीं मिला, न बीमा हुआ।" संजीव कुमार अपनी व्यथा बताते हैं।

बीमा योजना वर्ष 2016-17 से शुरु हुई थी लेकिन मई 2019 में हरियाणा में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की गाइडलाइंस में बदलाव करते हुए ये अधिसूचना जारी की गई थी कि धान और गन्ने जैसी फसलों में जलभराव से होने वाले नुकसान का दावा नहीं मिला मिलेगा। जिसके बाद ऐसे इलाकों में कंपनियों ने खरीफ सीजन में बीमा करना बंद कर दिया।

हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के मुताबिक फसल बीमा योजना में बदलाव कर दिया गया था और जलभराव वाले क्षेत्र में खरीफ में बीमा नहीं होता है। लेकिन ऐसे इलाकों में नुकसान पर सरकार मुआवजा देती है।

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग में संयुक्त निदेशक जगराज दांडी ने गांव कनेक्शन से कहा, "जिन इलाकों में फसल बीमा नहीं होता है, या लागू नहीं है वहां फसल का नुकसान होने पर राजस्व विभाग अपने नियमों के अनुसार मुआवजा देता है।"

झज्जर के छुड़ानी गांव में किसानों का कहना है कि 2017 के बाद कोई मुआवजा नहीं मिला जबकि 500-600 एकड़ फसल इस बार भी डूबी है। इस सवाल के जवाब में संयुक्त निदेशक ने कहा, "उन्हें भी मुआवजा मिलेगा, मैं इस मुद्दे को देखता हूं।"

संसद के जारी मानसून सत्र में सरकार ने लोकसभा में बताया था कि वर्ष 2020-21 के दौरान जल/मौसम संबंधी आपदाओं/संकटों से देश के 15 राज्यों में 66.55 लाख हेक्टेयर फसल का नुकसान हुआ था। इस आंकड़े में हरियाणा का नाम नहीं था।

हरियाणा के किसानों के मुताबिक अच्छी बारिश और भाव ठीक रहने पर उन्हें बाममती धान से 50000 रुपए एकड़ तक की आमदनी हो जाती है लेकिन यहां तो लागत डूब गई।

सुमित डागर कहते हैं, "हजारों किसानों का नुकसान इसलिए होता है क्योंकि सरकार नहर को पक्की नहीं करवा रही है। एक हफ्ता पहले भी डीसी साहब आए थे, उन्होंने फिर आश्वासन दिया था ड्रेन (नहर) को ठीक कराएंगे, पहले भी ऐसे आश्वासन मिल चुके हैं। लेकिन किसानों का क्या कसूर, एक फसल बोकर उनके बच्चे कैसे जिएंगे। झील का एरिया है तो किसान खेती छोड दें।"

संजीव धनखड़ आखिर में कहते हैं, "कुछ न करे सरकार तो हमारी लागत ही वापस कर दे, कुछ तो राहत मिल जाएगी।"

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