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सड़कों और नहरों में फेंक रहे टमाटर, जो कीमत मिल रही उससे किसानों की लागत तक नहीं निकल पा रही

टमाटर की कीमत न मिलने से किसान परेशान हैं। मध्य प्रदेश में तो किसान ने नाराज होकर उपज सड़क पर ही फेंक दिया तो वहीं उत्तर प्रदेश की मंडियों में भी कीमत सही न मिलने की वजह से किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

Mithilesh DharMithilesh Dhar   9 April 2021 1:00 PM GMT

सड़कों और नहरों में फेंक रहे टमाटर, जो कीमत मिल रही उससे किसानों की लागत तक नहीं निकल पा रही

टमाटर की सही कीमत न मिलने से मध्य प्रदेश के रायसेन में किसान ने टमाटर सड़क पर फेंक दिया। (Photo- By Arrangement)

मध्य प्रदेश/उत्तर प्रदेश। "इस साल 4 एकड़ में टमाटर की फसल लगाई है। टमाटर की फसल अच्छी है, लेकिन जो रेट सोचा था नहीं मिल रहा। फसल लगाने में डेढ़ लाख रुपए का खर्चा भी आया। लगा था कि चार से पांच लाख रुपए का व्यापार हो जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हो रहा।" यह कहना है 48 वर्षीय सुरेंद्र तिवारी का।

सुरेंद्र मध्य प्रदेश के जिला रायसेन की तहसील बाड़ी में रहते हैं। वे बताते हैं कि टमाटर खरीदने वाले व्यापारी नहीं आ रहे हैं। मंडियों में गाड़ियां खड़ी हैं कोई माल उतारने को तैयार नहीं है। लॉकडाउन का माहौल बन रहा है तो सब नुकसान में चल रहा है। इसलिए मैंने एक अप्रैल को टमाटर फेंक दिया, जो कीमत मिल रही थी उससे किराया तक नहीं निकल पा रहा था।

रायसेन जिले को 'एक जिला-एक उत्पाद योजना' के अंतर्गत टमाटर के लिए चुना गया है। इसके बाद किसानों ने यहां टमाटर की जमकर खेती की, लेकिन दाम न मिलने से अब किसान परेशान हैं। किसानों का कहना है कि मौजूदा समय में एक कैरेट (22 किलो) का रेट 40 से 50 रुपए मिल रहा है। मतलब टमाटर की कीमत किसानों को डेढ़ से दो रुपए प्रति किलो मिल रही है। इससे नाराज किसान टमाटर सड़क, नाली और नहर में फेंक रहे हैं।

किसान अकरम खान (39) ने बताया कि रायसेन का टमाटर दिल्ली, आगरा, प्रयागराज (इलाहाबाद) भी जाता है, लेकिन व्यापारी नहीं आ रहे। मैंने करीब 15 एकड़ में टमाटर लगा रखे हैं। जमीन भी चार लाख रुपए में किराए पर ली है। टमाटर के एक कैरेट की कीमत अभी 40 से 50 रुपए मिल रही है। ऐसे में मुझे 6 से 7 लाख रुपए का घाटा लगेगा। मजबूरी में टमाटर नाली और नहर में फेंक रहे हैं।

टमाटर मवेशियों को खाने के लिए डाल दिया गया। ((Photo- By Arrangement))

ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब किसानों को उनकी फसल की सही कीमत नहीं मिल रही है। आलू, प्याज और टमाटर को लेकर तो अक्सर होता है। पिछले साल मई में भी टमाटर की कीमत 50 पैसे प्रति किलो तक पहुंच गई थी। मध्य प्रदेश में प्याज के सीजन के समय भी कीमत गिर जाती है और एक समय ऐसा भी आता है जब यही टमाटर, प्याज बाजार में उपभोक्ताओं को 100-200 रुपए किलो में खरीदना पड़ता है, लेकिन किसानों को इसका फायदा न करे बराबर ही मिलता है।

मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग के जिला कार्यालय रायसेन के सहायक संचालक एन. एस. तोमर ने गांव कनेक्शन को बताया कि रायसेन जिले की बाड़ी तहसील में सर्वाधिक टमाटर उत्पादित होता है। वर्ष 2019-20 में सब्जी का रकबा 13141.00 हेक्टेयर रहा। चालू वर्ष टमाटर का रकबा 5150.00 हेक्टेयर है। जिले में करीब 3000 किसान टमाटर का उत्पादन कर रहे हैं।

पांच सीजन में 2018 सर्वाधिक टमाटर उत्पादन का साल रहा

मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग ने सब्जियों और फलों का अनुमानित ब्यौरा तैयार किया है। इसके अनुसार पिछले पांच सीजन में केवल एक साल ही सर्वाधिक बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों के अनुसार टमाटर की बात करें तो सीजन 2015-16 से लेकर 2019-20 तक में सर्वाधिक उत्पादन सीजन 2018-19 में 29.46 फीसदी प्रति हेक्टेयर रहा। इस वर्ष 85412.36 हेक्टेयर क्षेत्रफल में उत्पादन लिया गया। हालांकि यह क्षेत्रफल सीजन 2015-16 से कम था। तब 95395.42 हेक्टेयर था। आंकड़ों के अनुसार 2015-16 में उत्पादकता 25.71 फीसदी प्रति हेक्टेयर, 2016-17 में 25. 33, 2017-18 में 24. 53 और 2019-20 में 29.19 फीसदी प्रति हेक्टेयर रहा। यह पिछले सीजन से 0.27 फीसदी कम है।

नालियों में फेंका गया टमाटर (Photo- By Arrangement)

मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग में बतौर सहायक संचालक (ज़िला रायसेन) पदस्थ एन. एस. तोमर ने गांव कनेक्शन को बताया "किसानों की यह समस्या संज्ञान में है। रायसेन जिले की बाड़ी तहसील के टमाटर उत्तर और दक्षिण भारत के प्रदेशों में जाता था। इस साल जहां बाड़ी का टमाटर सप्लाई होता था, वहां की किसानों की फसल भी बढ़िया रही। इसलिए वहां के व्यापारी नहीं आ रहे। इसके अलावा प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (पीएम-एफएमई) के तहत फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट बनाये जाने हैं। अभी तक तीन किसानों ने आवेदन किया है।"

उत्तर प्रदेश में भी टमाटर की कीमत गिरी

उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव की सदर तहसील क्षेत्र के बलऊ खेड़ा गांव के किसान रामदास यादव (45 वर्ष) ने इस बार एक बीघे में टमाटर की खेती की थी। अभी बाजार भाव क्या है, यह पूछने पर वे बताते हैं, "इस बार बाजार भाव अच्छा न रहने के चलते टमाटर की खेती में कोई फायदा नहीं हो रहा। हमारे खेत में हर तीसरे दिन 25 कैरेट (लगभग डेढ़ कुंतल) टमाटर निकलता था। व्यापारी अभी एक कैरेट (25 किलो) के लिए लगभग 100 रुपए दे रहे हैं। जबकि खेत से टमाटर तुड़वाने के लिए चार से पांच मजदूर लगाने पड़ते थे, जिन्हें 1,000 रुपया देना पड़ता था। अब आप बताओ कि हमने टमाटर से क्या कमाया?"

टमाटर की खेती के बारे में जिला उद्यान अधिकारी उन्नाव बालकृष्ण गांव कनेक्शन को बताते हैं, "सितंबर-अक्टूबर में लगने वाला टमाटर ज्यादा दिन नहीं चल पाता। मार्च में जैसे ही गर्मी बढ़ती है तो टमाटर की फसल एक साथ पक जाती है। टमाटर ऐसी फसल है, जिसे किसान रोक नहीं सकता। इसलिए अक्सर किसानों को टमाटर की इस समय की फसल में नुकसान उठाना पड़ता है।"

देश की राजधानी नई दिल्ली की सबसे बड़ी मंडी आजादपुर सब्जी मंडी में आढ़ती मोहम्मद आरिफ ने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया, "पिछले साल भी आपसे बात हुई थी। हालांकि तब मई था और तब तो टमाटर एक रुपए किलो था। अभी कीमत डेढ़ से दो रुपए प्रति किलो है। मई आते-आते कीमत एक बार फिर एक रुपए के नीचे पहुंच जायेगी।"

सीतापुर में टमाटर बेचने ले जाता किसान। (फोटो- मोहित शुक्ला)

उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के महोली विकास खण्ड में टमाटर की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। यहां से देश के अलग अलग राज्यो में रोजाना दर्जनों ट्रक टमाटर सप्लाई किया जाता है, लेकिन इस बार कोविड-19 के चलते सहालग न होने के कारण टमाटर की खेती करने वाले किसानों को बहुत ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है।

अल्लीपुर गाँव में रहने वाले किसान विनोद मौर्य गांव कनेक्शन को बताते हैं, "मैंने पाँच एकड़ में टमाटर लगाया था जिसमें एक एकड़ की लागत की बात करें तो एक से डेढ़ लाख रुपए आती है, लेकिन इस बार शादी ब्याह न होने की वजह से डेढ़ सौ रुपए कैरेट के भाव में जा रहा है। ऐसे में मेरी लागत भी नहीं निकल पा रही है।

बनीकोड़र ब्लॉक की नई सड़क में टमाटर की खेती करने वाले कपिल कुमार वर्मा बताते हैं, "इस वक्त टमाटर का रेट ₹150 कैरेट तक मिल रहा है, जो ₹6 किलो पड़ रहा है। एक कुंतल टमाटर की तुड़ाई में ही लेबर चार्ज करीब ₹300 आ जाता है। दवा, पानी पर 300 रुपया हर हफ्ते खर्च आता है। सिंचाई और रखरखाव को शामिल कर लिया जाए तो इस भाव में टमाटर की लागत भी नहीं निकल पा रही, लेकिन मजबूरी है क्या करें। फसल ज्यादा दिन नहीं रख सकते इसलिए बेचना मजबूरी है।"

शुरू हुआ था ऑपरेशन ग्रीन

आलू, प्याज और टमाटर की कीमत अक्सर सीजन में कम हो जाती है। इसे देखते हुए केंद्र सरकार ने "टॉप्स' यानी टमाटर, प्याज और आलू को प्राथमिकता देने की बात कही थी। इसी लिए ऑपरेश ग्रीन की शुरुआत हुई, जिसमें बाद में 22 जल्दी खराब होने वाले उत्पादों को शामिल किया गया।

केंद्र सरकार की टॉप (टोमैटो, ओनियन व पोटैटो) स्कीम के तहत कोल्ड स्टोरेज, कोल्ड चेन और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को प्रोत्साहन देने की योजना थी। इस योजना को चलाने का दायित्व खाद्य प्रसंस्करण विभाग को दिया गया था। इसमें किसान उत्पादक संगठन के गठन के साथ उन्हें पोस्ट हार्वेस्टिंग में नुकसान रोकने जैसी तकनीक को अपनाने और इन संवेदनशील फसलों की खेती पर ज़ोर देना था।

खेत से टमाटर तोड़ता किसान। (फोटो- मोहित शुक्ला)

सरकार ने 2018-19 के बजट भाषण में ऑपरेशन ग्रीन के लिए 500 करोड़ रुपए की घोषणा की थी। इसमें प्रमुख टमाटर उत्पादक राज्य, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, गुजरात और तेलंगाना, प्रमुख प्याज उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, बिहार और प्रमुख आलू उत्पादक राज्य, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश और पंजाब को प्रोडक्शन क्लस्टर क्षेत्र बनाया गया है, लेकिन इतने सालों के बाद अभी प्याज, टमाटर और आलू की कीमत अक्सर बहुत कम हो जा रही है, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर और बरेली जिले में भी टमाटर की खेती करने वाले किसान परेशान हैं। बाईगूल नदी से कुछ दूर बसे बरेली के उचसिया गांव में टमाटर की खेती करने वाले राजेश बताते हैं "इस बार टमाटर का रेट तीन से चार गुना तक नीचे हो गया है। जो टमाटर पंद्रह से बीस रुपए किलो तक में जा रहा था, वह अब महज पांच रुपए किलो में निकल पा रहा है। इसके लिए या तो उन्हे यहां से बरेली जाना पड़ता है या फिर शाहजहांपुर। पिछले साल ऐसे ही फूल गोभी एक रुपए की एक बिकी थी। अब वैसे ही टमाटर की कीमत गिरी है।"

मध्य प्रदेश से सचिन तुलसा त्रिपाठी, शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश से राम जी मिश्रा, बाराबंकी से वीरेंद्र सिंह, सीतापुर से मोहित शुक्ला और उन्नाव से सुमित यादव की रिपोर्ट

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