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10 में से 8 लोगों ने कहा, लॉकडाउन में लगभग बंद रहा उनका काम: गांव कनेक्शन सर्वे

वो कौन सा वर्ग था जिसका कामकाज कोविड आपदा में सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ? नौकरी पेशा को लगता है उसका नुकसान हुआ, व्यापारी को लगता है सबसे ज्यादा घाटा उसका हुआ, लेकिन देश का सबसे बड़ा ग्रामीण सर्वे क्या कहता है देखिए?

Mithilesh DharMithilesh Dhar   16 Aug 2020 3:00 AM GMT

गांव कनेक्शन के राष्ट्रीय सर्वे में हर 10 में से 8 लोगों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उनका काम लगभग बंद रहा। सर्वे में शामिल 44 फीसदी लोगों के मुताबिक उनका काम पूरी तरह बंद रहा तो 34 फीसदी लोगों के मुताबिक काफी हद तक काम बंद रहा। दोनों को मिला दें तो 78% लोगों का काम लॉकडाउन में लगभग बंद रहा। जबकि 15 फीसदी ने कहा उनका काम कुछ दिन के लिए बंद रहा, सिर्फ 5 फीसदी लोग ऐसे थे, जिन्होंने कहा उनके काम पर कोई असर नहीं पड़ा। जबकि 2 फीसदी लोगों ने सवाल का जवाब नहीं दिया।

करीब तीन महीने के राष्ट्रव्यापी बंद के चलते देश में लाखों-करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए, लाखों लोगों के कामधंधे बंद हो गए। लॉकडाउन के दौरान किसी की दुकान पर ताला पड़ा तो किसी को लंबी तालेबंदी के चलते अपना धंधा की बदलना पड़ा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बनारसी साड़ी के बुनकर और हैंडलूम के मालिक मोहम्मद जावेद कहते हैं, "घर का खर्च चलाने के लिए रिश्तेदारों से अब तक 35,000 रुपए का कर्ज ले चुका हूं। इसे वापस कब तक कर पाऊंगा, यह नहीं पता। लॉकडाउन में ढील मिलने के बाद हमें लगा कि कुछ ऑर्डर मिलेगा, लेकिन कोई काम आ ही नहीं रहा है। दो हैंडलूम मशीनें हैं। दोनों बंद पड़ हुई हैं। लॉकडाउन में हमारा काम इतना भी नहीं चला कि हम 2 टाइम खाना खा सकें।"

इसी वाराणसी के सारनाथ इलाके में जुलाई महीने एक पिता अपनी बेटी के साथ रेलवे ट्रैक पर कूद गया। मृतक व्यक्ति की पहचान 45 साल के राकेश जायसवाल के रूप में हुई। उनकी बेटी गंभीर रूप से घायल है। राकेश सब्जी और फल बेचते थे। परिजनों के लॉकडाउन में कारोबार प्रभावित हुआ था, आर्थिक तंगी से घर में (पति-पत्नी के बीच) लड़ाई झगड़े होते थे, जिसके बाद उन्होंने ये कदम उठाया।

ये कहानी जावेद और राकेश की नहीं है, लॉकडाउन में शहरों के साथ ग्रामीण इलाकों की बड़ी आबादी को मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जिसमें कई लोग हालातों के आगे हार भी गए। कोविड-19 लॉकडाउन का दौरान ग्रामीण इलाकों में जनजीवन और कारोबार पर कैसा प्रभाव पड़ा और कैसे लोगों इस मुश्किल वक्त में अपनी आजीविका चलाते रहे, इसे समझने के लिए गांव कनेक्शन ने देशव्यापी सर्वे कराया। 30 मई से लेकर 16 जुलाई तक 20 राज्यों और 3 केंद्र शाषित राज्यों के 179 जिलों में 25371 ग्रामीण लोगों से बात की।


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इस सर्वे के दौरान लोगों से पूछा गया कि लॉकडाउन में उनका काम काज कैसा रहा? सर्वे में शामिल 25371 में से जो 11,130 लोग अपने घर के मुख्य कमाने वाले थे, उनमें से 44 फीसदी ने कहा ने जिस काम से उनके घर की कमाई होती थी वो पूरी तरह ठप रहा। जबकि 8,598 (34 फीसदी) लोगों ने माना कि इस दौरान पूरी तरह तो नहीं, काम काफी हद तक बंद था। इस तरह देखेंगे तो 78 फीसदी लोगों ने कहा कि उनका काम पूरी तरह या काफी हद तक बंद रहा।

ग्रामीण भारत की बात करें तो लॉकडाउन के दौरान बाजार की दुकानों का काम तो प्रभावित हुआ ही अपने ही जिलों में हजारों लोगों को रोजगार देने वाले स्थानीय कुटीर उद्योग मसलन, बनारस और चंदेरी का साड़ी उद्योग, मुंबई और नोएडा में गारमेंट, हरियाणा के मानेसर और झारखंड के जमशेदपुर और बोकारो में आटो इंडस्ट्री के पार्ट, मिर्जापुर में पीतल उद्योग तो फिरोजबाद में कांच के उद्योग को बंदी का सामना करना पड़ा। फैक्ट्रियों में काम करने वाले लोगों की नौकरियां गई तो रोज कमाने वाले मजदूरों, निर्माण श्रमिक भी बंदी की चपेट में आए। सब्जियां और फल बेचने वाले किसानों को करारा झटका लगा तो उन मजदूरों को जो खेती पर निर्भर थे।

सर्वे में शामिल कुल लोगों में से 38 फीसदी किसानों ने कहा कि लॉकडाउन की वजह से उनका काम पूरी तरह से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा जबकि 34 फीसदी किसानों का काम कुछ हद तक प्रभावित रहा, 15 फीसदी किसानों ने कहा कि काम प्रभावित हुआ लेकिन कुछ समय तक के लिए। पांच फीसदी किसानों ने कहा कि उनका काम पहले जैसा ही चलता रहा और एक फीसदी लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।

ओडिशा के पुरी जिले के निंपारा ब्लॉक में धलेश्वर गांव के अशोक मंगौली अपने गांव में ही किराना की दुकान चलाते हैं और खेती भी करते हैं। लॉकडाउन का प्रभाव उनके काम पर कितना पड़ा, इस बारे में वे कहते हैं, "दुकान की स्थिति ठीक नहीं है। लॉकडाउन में बहुत नुकसान हुआ, अब हमारे पास इसे फिर से शुरू करने के लिए पैसे बचे ही नहीं। मैं तो खेती भी करता हूं। छोटी जोता का किसान हूं। सब्जी लगाया, लेकिन बेच ही नहीं पाया। सरकारी मंडियां बंद रहीं जिस कारण हम पर दोहरी मार पड़ी। बड़ी मुश्किल कुछ सब्जियां बेच पाया, लेकिन उसकी सही कीमत नहीं मिली।"


सर्वे में कौन-कौन सा काम करने वाले लोगों शामिल थे अगर इसकी बात की जाए, तो किसान सबसे ज्यादा 6,783 (26.7 फीसदी) शामिल रहे। इसके अलावा 5,037 (20 फीसदी) कृषि मजदूर, 10 फीसदी (2,572) दुकानदार और व्यापारी, डेयरी से जुड़े 429 (2 फीसदी), सेवा कार्य से जुड़े 484 (2 फीसदी), स्किल्ड वर्क में लगे 801 (3 फीसदी), अनस्किल्ड 2,395 (9 फीसदी) और दूसरे काम में लगे जैसे प्राइवेट नौकरी, सरकारी नौकरी, डॉक्टर और टीचर 25 फीसदी (6,387) शामिल रहे।

लॉकडाउन की वजह से स्किल्ड और अनस्किल्ड लोगों का काम सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। स्किल्ड यानी कुशल श्रम का मतलब होता है कि वह काम जिसे करने के लिए किसी विशेष कौशल या ट्रेनिंग की जरूरत होती है जैसे सॉफ्टवेयर इंजीनियर। अनस्किल्ड यानी कि अकुशल श्रम, इसका मतलब होता है किसी श्रम को करने के लिए विशेष कौशल या ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती, जैसे ईंटा गारे का काम या खेतों में कटाई करने वाले कृषि मजदूर। ऐसे लोग लॉकडाउन की वजह से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

सर्वे में 60 फीसदी स्किल्ड और 64 फीसदी अनस्किल्ड लोगों ने कहा कि लॉकडाउन में उनका काम पूरी तरह से प्रभावित रहा, जबकि 29 और 24 फीसदी ने कहा कि असर तो रहा लेकिन एक सीमा के अंदर। क्रमश: 10 और 6 फीसदी लोगों ने माना कि असर कुछ समय के लिए रहा जबकि 1 और चार फीसदी ने माना कि असर नही पड़ा। 4 और 2 फीसदी ने कुछ भी कहने से मना कर दिया।

"तीन पीढ़ियों से मिठाई (खुरचन) का व्यापार कर रहे हैं। बाबा जी के बाद पिता जी और अब हम चला रहे हैं। लॉकडाउन की वजह से व्यापार पूरी तरह से बंद हो चुका है। घर चलाने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।" चंद्रमणि मिश्रा (50 वर्ष), लॉकडाउन के दौरान और बाद में आई मुश्किलें गिनाते हैं।


मध्य प्रदेश के सतना जिले के रामपुर बाघेलान नगर और इससे जुड़े आसपास के एक दर्जन से ज्यादा गांवों में खुरचन बनता है। दूध और पिसी चीनी को मिलाकर बनने वाली सतना की यह मिठाई पूरे प्रदेश में है। दुकानें हाईवे पर लगती हैं जिस कारण इसकी पहचान देश के दूसरे राज्यों में भी है। लगभग 80 सालों से इस क्षेत्र में खुरचन का व्यापार हो रहा है, लॉकडाउन में यहां का पूरा काम बंद रहा और अब कुछ ढील के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ है।

मध्य प्रदेश में ही सतना जिले के रहने वाले दसैया बसोर बांस से बना सामान बेचते थे जिससे उनका पांच लोगों का परिवार चलता था, लेकिन लॉकडाउन में उनका पूरा काम चौपट रहा।

वे कहते हैं, "पिछले 35 साल से बांस के बने सामान बेच रहा हूं। लॉकडाउन से पहले रोज 400 से 500 रुपए की कमाई हो जाती थी, लेकिन लॉकडाउन में एक डलिया तक नहीं बिकी। पूरे लॉकडाउन में एक पैसे की कमाई नहीं हुई।"

भारत में देशव्यापी लॉकडाउन में सबसे ज्यादा मार असंगठित क्षेत्र पर पड़ी। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ मजदूरों के सामने मुश्किलें पैदा हो गयी हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) द्वारा जिनेवा में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन की वजह से मेट्रो और बड़े औद्योगिक शहरों में रहकर रोज कमाने-खाने वालों को अपने गांव लौटना पड़ा है।

भारत, नाइजीरिया और ब्राजील में लॉकडाउन के कारण अंसगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों पर ज्यादा असर पड़ा है। अभी के हालात देखते हुए आने वाले समय में यह कह पाना मुश्किल होगा कि ये असंगठित मजदूर कब शहर वापस लौटेंगे? रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ऐसे हालात से निपटने के लिए तैयार नहीं है। यही वजह है कि पेट भरने के लिए कई लोग लोग कर्ज लेने को विवश हैं।

कृषि मजदूरी से जुड़े लोगों पर भी लॉकडाउन का व्यापक असर पड़ा। 48 फीसदी कृषि मजदूरों का काम पूरी तरह से प्रभावित रहा है जबकि 35 फीसदी का कुछ हद तक प्रभावित रहा। 19 फीसदी का काम प्रभावित हुआ लेकिन कुछ समय तक के लिए ही। 07 फीसदी ने कहा उनका काम प्रभावित नहीं हुआ, एक फीसदी ने कोई जवाब नहीं दिया।

डेयरी और पोल्ट्री कारोबार से जुड़े 30 फीसदी लोगों ने कहा कि लॉकडाउन में उनका काम पूरी तरह से बंद रहा जबकि 40 फीसदी लोगों ने कहा कि काम कुछ हद तक प्रभावित रहा। 22 फीसदी लोगों ने कहा कि काम कुछ दिनों तक ही प्रभावित था। 6 फीसदी लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और 02 फीसदी लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।

दुकान चलाने वाले और अपना व्यवसाय करने वाले 48 फीसदी लोगों का काम पूरी तरह से बंद रहा। 35 फीसदी ने कहा कि हमारा काम कुछ हद तक बंद रहा जबकि 13 फीसदी लोगों ने कहा कि हमारा काम कुछ दिनों तक ही बंद रहा। 02 फीसदी ने माना कि कोई प्रभाव नहीं पड़ा जबकि एक फीसदी लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।

"लॉकडाउन में हमारी स्थिति तो ऐसी हो गई कि मैंने कर्ज लेकर दुकान का किराया दिया। सरकार ने हमारी कोई मदद नहीं की। सरकार ने कहा कि हम छोटे व्यापारियों को लोन देंगे, लेकिन जब आप बैंक जाइये तो बैंक वाले सीधे मना कर देते हैं। लॉकडाउन में हम दो वक्त की रोटी भी बड़े कष्ट के साथ खा पाएं।" जितेंद्र लखेरा कहते हैं।


जितेंद्र उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लगभग 230 किलोमीटर दूर महोबा जिले में जनरल स्टोर चलाते हैं। वे आगे कहते हैं, "लॉकडाउन में ढील के बाद भले ही कुछ राहत मिली, लेकिन संपूर्ण लॉकडाउन के दौरान जो नुकसान हुआ उससे पार पाने में बहुत समय लगेगा।"

नौकरीपेशा लोगों का काम भी लॉकडाउन की वजह से काफी प्रभावित हुआ। 55 फीसदी लोगों ने कहा कि लॉकडाउन में उनका पूरी तरह बंद रहा जबकि 23 फीसदी लोगों का काम कुछ हद तक बंद रहा और 15 फीसदी लोगों ने कहा काम प्रभावित तो हुआ लेकिन कुछ समय के लिए। 6 फीसदी लोगों का काम प्रभावित नहीं हुआ और 01 फीसदी लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।

उत्तराखंड के अल्मोड़ा में रहने वाले वीरेंद्र सिंह विष्ट गुड़गांव के सेक्टर 52 के एक कंपनी में डाइवर थे। मार्च में लॉकडाउन के बाद उन्हें कंपनी से सैलरी नहीं मिली। वे बताते हैं, "मार्च के बाद ही हमें सैलरी नहीं मिली। पहले 1-2 महीने का खर्च को किसी तरह चला, फिर जब हमें लगा कि सब कुछ इतनी जल्दी ठीक नहीं होने वाला है तो मैं अपने कुछ दूसरे साथियों के साथ गांव लौट आया। लॉकडाउन की वजह से हमारी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हुई है। अब तो हमारे पास कोई नौकरी भी नहीं है।"

दूसरे ऐसे काम जिन्हें किसी श्रेणी में नहीं रखा जा सका, इसमें 37 फीसदी लोग ऐसे रहे जिन्होंने माना कि उनका काम लॉकडाउन में पूरी तरह बंद रहा। 33 फीसदी ने कहा कि असर तो रहा लेकिन कुछ हद तक। 19 फीसदी लोगों ने कहा कि असर कुछ दिनों तक रहा। आठ फीसदी लोगों ने कहा कि कोई असर नहीं रहा जबकि तीन फीसदी लोगों ने कुछ भी कहने से मना कर दिया।

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उत्तर प्रदेश चित्रकूट के ब्लॉक कर्बी, गांव कल्ला के सोहन लाल मिस्त्री गांव में ही छोटी सी किराना दुकान चलाते हैं। वे कहते हैं, "हम तो छोटे दुकानदार हैं। अचानक से लॉकडाउन लगा दिया गया। इससे हमें नुकसान यह हुआ कि एक बार जब गल्ले का सामान खत्म हो गया है तो हम दोबारा भरा ही नहीं पाये। ग्राहक दुकान पर तो आ रहे थे लेकिन हमारे पास सामान था ही नहीं। ग्राहक दुकान से निराश लौट गये। इससे हमें आर्थिक रूप से बहुत नुकसान हुआ।"

बिहार के नवादा जिले के अभिषेक कुमार कहते हैं, "मैंने अपने खेत में लौकी कद्दू, बैंगन लगाया था, लेकिन लॉकडाउन की वजह से एक भी फसल बेच नहीं पाया। मंडी नवादा लेकर गया तो पुलिस मारने लगी। पुलिस से भागने में मेरी साइकिल भी खराब हो गई। सारी सब्जी खेत में ही खराब हो गई। बीमार हो गया तो कर्जा लेकर इलाज कराना पड़ा। लॉकडाउन की वजह से बहुत नुकसान उठाना पड़ा।"

बनारस से सटे मिर्जापुर जिले कालीन और खनन का काम होता ही है, पीतल के बर्तन बनाने का करोड़ों रुपए का कारोबार था, जो बंदी के कगार पर पहुंच गया है। पूर्वांचल में होने वाली शादियों में पीतल के बर्तनों की विशेष मांग होती है।

"पीतल के बर्तन तो अब लोग वैसे ही बहुत कम इस्तेमाल करते हैं। अप्रैल, मई जून इन तीन महीनों में शादियों की वजह से हमारी अच्छी कमाई होती थी और उसी से हमारा सालभर का खर्च चलता था, लेकिन लॉकडाउन ने हमें बर्बाद कर दिया। हमारा काम इतना भी नहीं चला कि हम उससे अपना पेट भर सकें।' एक टूटी सी साइकिल पर बैठे पीतल कारीगर मक्खन सिंह कहते हैं।

कोरोना संकट की वजह से भारत के सूक्ष्म, लुघ और मध्यम उद्यम (MSME) अपना अस्तित्व बचाने के संकट से जूझ रहे हैं। उनकी आमदनी घटकर करीब 20 फीसदी पर पहुंच गई है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक स्टडी में यह बात सामने आई है। अध्ययन के मुताबिक कोरोना संकट की वजह से इस वित्त वर्ष में ज्यादातर एमएसएमई की आय में बड़ी गिरावट की आशंका है। पूरे देश में कोरोना संकट की वजह से ऐसे एमएसएमई पर सबसे बुरा असर पड़ा है जो लोगों के लिए गैर जरूरी सामान के उत्पादन (जैसे कपड़े आदि), निर्माण और निर्यात आधारित कारोबार में हैं।

इस सेक्टर को बचाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश के सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) में काम करने वाले करीब 12 करोड़ लोगों की नौकरी बचाने लिए 9.25 फीसदी की रियायती दर पर 3 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त ऋण उपलब्ध कराने की योजना को मंजूरी भी दी है।

सर्वेक्षण की पद्धति

भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने लॉकडाउन का ग्रामीण जीवन पर प्रभाव के लिए कराए गए इस राष्ट्रीय सर्वे को दिल्ली स्थित देश की प्रमुख शोध संस्था सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम के परामर्श से पूरे भारत में कराया गया। देश के 20 राज्यों, 3 केंद्रीय शाषित राज्यों के 179 जिलों में 30 मई से लेकर 16 जुलाई 2020 के बीच 25371 लोगों के बीच ये सर्वे किया गया।

जिन राज्यों में सर्वे किया गया उनमें राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, अरुणांचल प्रदेश, मनीपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, केरला, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और चंडीगढ़ शामिल थे, इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, लद्धाख, अंडमान एडं निकोबार द्वीप समूह में भी सर्वे किया गया। इन सभी राज्यों में घर के मुख्य कमाने वाले का इंटरव्यू किया गया साथ उन लोगों का अलग से सर्वे किया गया जो लॉकाडउन के बाद शहरों से अपने गांवों को लौटे थे। जिनकी संख्या 963 थी। सर्वे का अनुमान 25000 था, जिसमें राज्यों के अनुपात में वहां इंटरव्यू निर्धारित किए गए थे। इसमें से 79.1 फीसदी पुरुष थे और और 20.1 फीसदी महिलाएं।

सर्वे में शामिल 53.7 फीसदी लोग 26 से 45 साल के बीच के थे। इनमें से 33.1 फीसदी लोग या तो निरक्षर थे या फिर प्राइमरी से नीचे पढ़े हुए सिर्फ 15 फीसदी लोग स्नातक थे। सर्वे में शामिल 43.00 लोग गरीब, 24.9 फीसदी लोवर क्लास और 25. फीसदी लोग मध्यम आय वर्ग के थे। ये पूरा सर्वे गांव कनेक्शन के सर्वेयर द्वारा गांव में जाकर फेस टू फेस एप के जरिए मोबाइल पर डाटा लिया गया। इस दौरान कोविड गाइडलाइंस (मास्क, उचित दूरी, हैंड सैनेटाइजर) आदि का पूरा ध्यान रखा गया।

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गांव कनेक्शन के संस्थापक नीलेश मिश्रा ने इस सर्वे को जारी करते हुए कहा, "कोरोना संकट की इस घड़ी में ग्रामीण भारत, मेनस्ट्रीम राष्ट्रीय मीडिया के एजेंडे का हिस्सा नहीं रहा। यह सर्वे एक सशक्त दस्तावेज है जो बताता है कि ग्रामीण भारत अब तक इस संकट से कैसे निपटा और आगे उसकी क्या योजनाएं है? जैसे- क्या वे शहरों की ओर फिर लौटेंगे? क्या वे अपने खर्च करने के तरीकों में बदलाव करेंगे, ताकि संकट की स्थिति में वे तैयार रहें और फिर से उन्हें आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़े।"

सीएसडीएस, नई दिल्ली के प्रोफेसर संजय कुमार ने कहा, "सर्वे की विविधता, व्यापकता और इसके सैंपल साइज के आधार पर मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि यह अपनी तरह का पहला व्यापक सर्वे है, जो ग्रामीण भारत पर लॉकडाउन से पड़े प्रभाव पर फोकस करता है। लॉकडाउन के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और अन्य सरकारी नियमों का पालन करते हुए यह सर्वे गांव कनेक्शन के द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें उत्तरदाताओं का फेस टू फेस इंटरव्यू करते हुए डाटा इकट्ठा किए गए।"

"पूरे सर्वे में जहां, उत्तरदाता शत प्रतिशत यानी की 25000 हैं, वहां प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और 95 प्रतिशत जगहों पर संभावित त्रुटि की संभावना सिर्फ +/- 1 प्रतिशत है। हालांकि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उनके जनसंख्या के अनुसार एक निश्चित और समान आनुपातिक मात्रा में सैंपल नहीं लिए गए हैं, इसलिए कई लॉजिस्टिक और कोविड संबंधी कुछ मुद्दों में गैर प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और वहां पर हम संभावित त्रुटि की गणना करने की स्थिति में नहीं हैं," संजय कुमार आगे कहते हैं।

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