आधे किसान समय पर काट पाए फसल और 28 फीसदी ही समय पर बेच पाए अपनी उपज- गांव कनेक्शन सर्वे

ये लॉकडाउन के बाद का ग्रामीण भारत से सबसे बड़ा सर्वे है, जिसमें पता चलता है पहले से मुश्किलों घिरे किसानों को कैसी-2 मुसीबतों का सामना करना पड़ा और अब आगे होना चाहिए? देखिए प्रख्यात कृषि एवं खाद्य विशेषज्ञ देविंदर शर्मा से खास बात.. गांव कैफे में

Arvind ShuklaArvind Shukla   12 Aug 2020 4:30 AM GMT

लॉकडाउन का समय किसानों पर भारी पड़ा। सब्जी और फलों की खेती करने वाले किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा। गांव कनेक्शन के सर्वे में शामिल 41 फीसदी किसानों ने कहा कि वे लॉकडाउन के चलते समय से अपनी फसल नहीं काट पाए, जबकि 55 फीसदी किसान अपनी उपज समय पर बेच नहीं पाए। 38 फीसदी के करीब किसानों को अपनी उपज निजी व्यापारियों को बेचनी पड़ी।

25 मार्च को राजस्थान के झालावाड़ में रहने वाले किसान बाल मुकुंद डांगी 2 ट्राली (40 कुंतल) खीरा कटवा कर जयपुर ले जाना चाहते थे लेकिन पुलिस ने जाने नहीं दिया आखिर में उन्हें 60 हजार रुपए का ये खीरा गायों को खिलाना पड़ा।

मार्च के आखिरी हफ्ते में मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा और उसके आसपास के जिलों के बागवान बहुत परेशान थे क्योंकि संतरे और किन्नू पककर नीचे गिर रहे थे लेकिन बागों तक न आढ़ती पहुंच रहे थे ना किसान अपनी उपज मंडियों तक ले जा पा रहे थे।


अप्रैल महीने में छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक किसान ने अपनी 10 एकड़ लौकी जुतवा दी। वहीं कर्नाटक में चामराज नगर के किसान कन्नैया सुब्रमणियम ने 18 अप्रैल को एक ट्वीट किया उनके साढ़े तीन एकड़ खेत में एक लाख गोभी तैयार हैं लेकिन कोई लेने वाला नहीं, इस पर उनकी 4 लाख रुपए की लागत आई है। किसानों के साथ मुश्किलों का ये सिलसिला हर राज्य में दिखा लॉकडाउन खुलने के बाद भी जारी रहा। महाराष्ट्र में नाशिक के किसान अंगूर नहीं बेच पाए तो यूपी समेत कई राज्यों में गेहूं खरीद 15 दिन बाद शुरु हो पाई।

जिसके चलते किसानों की बड़ी आबादी फसल समय पर काट नहीं पाई, जो काट पाए वो मंडी नहीं पहुंचा पाए और जो किसी तरह मंडी,आढ़ती या दूसरे खरीद केंद्रों पर पहुंचे उन्हें अच्छा रेट नहीं मिला।

गांव कनेक्शन के सर्वे में 52 फीसदी किसानों ने कहा वो समय पर फसल काट पाए, जबकि 41 फीसदी ने कहा नहीं, वहीं 6 फीसदी ने कोई जवाब नहीं दिया। 38 फीसदी किसानों ने कहा वो समय पर बुवाई कर पाए, 42 फीसदी ने कहा नहीं बो पाए तो 20 फीसदी लोगों ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया। वहीं 55 फीसदी किसानों ने कहा कि वो समय पर अपनी उपज नहीं बेच पाए, जबकि 28 फीसदी ने कहा अपनी फसल समय पर बेच पाए, 17 फीसदी ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया।

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अगर राज्यों की बात करें तो राजस्थान में 77 फीसदी किसान समय पर फसल काट पाए, 49 फीसदी समय से बो पाए और लेकिन 45 फीसदी ही टाइम से बेच पाए। इसके बाद यूपी का नंबर आता है जहां, 65 फीसदी किसान समय पर फसल काट पाए, 47 फीसदी समय पर बो पाए जबकि 35 फीसदी समय से बेच पाए।


बिहार में 35 फीसदी किसान समय फसल काट पाए, पश्चिम बंगाल में 34 फीसदी तो जम्मू-कश्मीर और लद्धाख में महज 10 फीसदी किसान ही समय पर फसल काट पाए। और जम्मू-कश्मीर और लद्धाख में सिर्फ 2 फीसदी किसान ही अपनी फसल समय से बेच पाए।

यहां गौर करने वाले बात है कि जिन किसानों ने निजी कारोबारी को अपनी फसल बेची उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत मिली। निजी कारोबारियों को फसल बेचने वाले 32 फीसदी किसानों ने कहा कि उन्हें एमएसपी से कम कीमत मिली। 58 फीसदी ने कहा जो पैसा उन्हें मिला वो एसएसपी के बराबर था जबकि 5 फीसदी ने कहा उन्हें एसएसपी से ज्यादा कीमत मिली वहीं 6 फीसदी ने जवाब नहीं दिया।

मुख्य बातें गांव कनेक्शन सर्वे में शामिल 72 फीसदी किसान खुद की जमीन पर खेती करते थे, जबकि 7 फीसदी बंटाईदार थे। 10 फीसदी अपनी और बंटाई या ठेके की जमीन दोनों लेकर खेती करते थे। जबकि 11 फीसदी ने ये नहीं बताया कि किस तरह के किसान हैं।

सर्वेक्षण की पद्धति

भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने लॉकडाउन का ग्रामीण जीवन पर प्रभाव के लिए कराए गए इस राष्ट्रीय सर्वे को दिल्ली स्थित देश की प्रमुख शोध संस्था सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम के परामर्श से पूरे भारत में कराया गया।

देश के 20 राज्यों, 3 केंद्रीय शाषित राज्यों के 179 जिलों में 30 मई से लेकर 16 जुलाई 2020 के बीच 25371 लोगों के बीच ये सर्वे किया गया। जिन राज्यों में सर्वे किया गया उनमें राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, अरुणांचल प्रदेश, मनीपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, केरला, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और चंडीगढ़ शामिल थे, इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, लद्धाख, अंडमान एडं निकोबार द्पी समूह में भी सर्वे किया गया। इन सभी राज्यों में घर के मुख्य कमाने वाले का इंटरव्यू किया गया साथ उन लोगों का अलग से सर्वे किया गया जो लॉकाडउन के बाद शहरों से अपने गांवों को लौटे थे। जिनकी संख्या 963 थी। सर्वे का अनुमान 25000 था, जिसमें राज्यों के अनुपात में वहां इंटरव्यू निर्धारित किए गए थे।


इसमें से 79.1 फीसदी पुरुष थे और और 20.1 फीसदी महिलाएं। सर्वे में शामिल 53.7 फीसदी लोग 26 से 45 साल के बीच के थे। इनमें से 33.1 फीसदी लोग या तो निरक्षर थे या फिर प्राइमरी से नीचे पढ़े हुए सिर्फ 15 फीसदी लोग स्नातक थे। सर्वे में शामिल 43.00 लोग गरीब, 24.9 फीसदी लोवर क्लास और 25. फीसदी लोग मध्यम आय वर्ग के थे।

ये पूरा सर्वे गांव कनेक्शन के सर्वेयर द्वारा गांव में जाकर फेस टू फेस एप के जरिए मोबाइल पर डाटा लिया गया। इस दौरान कोविड गाइडलाइंस (मास्क, उचित दूरी, हैंड सैनेटाइजर) आदि का पूरा ध्यान रखा गया।

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सीएसडीएस, नई दिल्ली के प्रोफेसर संजय कुमार ने कहा, "सर्वे की विविधता, व्यापकता और इसके सैंपल साइज के आधार पर मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि यह अपनी तरह का पहला व्यापक सर्वे है, जो ग्रामीण भारत पर लॉकडाउन से पड़े प्रभाव पर फोकस करता है। लॉकडाउन के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और अन्य सरकारी नियमों का पालन करते हुए यह सर्वे गांव कनेक्शन के द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें उत्तरदाताओं का फेस टू फेस इंटरव्यू करते हुए डाटा इकट्ठा किए गए।"

"पूरे सर्वे में जहां, उत्तरदाता शत प्रतिशत यानी की 25000 हैं, वहां प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और 95 प्रतिशत जगहों पर संभावित त्रुटि की संभावना सिर्फ +/- 1 प्रतिशत है। हालांकि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उनके जनसंख्या के अनुसार एक निश्चित और समान आनुपातिक मात्रा में सैंपल नहीं लिए गए हैं, इसलिए कई लॉजिस्टिक और कोविड संबंधी कुछ मुद्दों में गैर प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और वहां पर हम संभावित त्रुटि की गणना करने की स्थिति में नहीं हैं," संजय कुमार ने आगे कहते हैं।

इस सर्वे के कुछ मुख्य निष्कर्ष नीचे दिए गए हैं

  • लॉकडाउन के दौरान लगभग 23 फीसदी ग्रामीणों को उधार लेना पड़ा, जबकि 8 फीसदी लोगों को अपने कीमती सामान जैसे- घड़ी, मोबाइल आदि बेचने पड़े, जबकि 7 फीसदी लोगों को अपने गहने गिरवीं रखने पड़े। 5 फीसदी लोग ऐसे भी थे, जिन्हें लॉकडाउन की दिक्कतों के कारण अपनी जमीन गिरवी रखनी पड़ी या उसे बेचना पड़ा।
  • गांव कनेक्शन के सर्वे में शामिल लोगों में सबसे ज्यादा संख्या किसानों की थी, सर्वे में शामिल आधे से अधिक किसान लॉकडाउन के दौरान अपने फसल को सही समय पर काटने में सफल तो हुए लेकिन सिर्फ एक चौथाई किसानों को ही अपनी फसल का सही दाम मिल पाया।
  • वो लोग जिनके पास राशन कार्ड था, उनमे से 71 फीसदी लोगों को लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा निर्धारित राशन (गेंहू या चावल) मिला। सर्वे के दौरान 17 फीसदी लोग ऐसे मिले जिनके पास राशन कार्ड नहीं था और ऐसे राशन कार्ड विहीन लोगों में से सिर्फ 27 फीसदी लोगों को ही राशन मिल सका। जबकि सरकार ने सभी के लिए निःशुल्क राशन की घोषणा की थी।
  • लॉकडाउन से सबसे अधिक प्रभावित कुशल कामगार और अकुशल मजदूर रहें। 60 फीसदी कुशल कारीगरों का काम पूरी तरह ठप रहा, जबकि 64 फीसदी अकुशल मजदूर भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुए और उनका काम पूरी तरह से ठप हो गया।
  • सर्वे के दौरान हर आठ में से एक ग्रामीण परिवार ने कहा कि लॉकडाउन में आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कई बार पूरे दिन भूखा रहना पड़ा।
  • सिर्फ 20 प्रतिशत ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान मनरेगा के तहत काम मिला। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक 70 फीसदी लोगों को मनरेगा के तहत काम मिला, जबकि 65% और 59% के साथ उत्तराखंड और राजस्थान तीसरे स्थान पर रहें। वहीं गुजरात और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर-लद्दाख का प्रदर्शन इस मामले में सबसे खराब रहा और वहां क्रमशः सिर्फ 2% और 4% मजदूरों को ही मनरेगा के तहत काम मिल सका।
  • 68 फीसदी से अधिक ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान आर्थिक दिक्कतों का गंभीर सामना करना पड़ा।
  • लॉकडाउन के दौरान 23 फीसदी मजदूर ऐसे रहें, जिन्होंने पैदल ही शहर से अपने घर-गांव की यात्रा की। वहीं 33 फीसदी प्रवासी मजदूरों ने कहा कि वे रोजगार के लिए फिर से शहरों की तरफ वापस जाना चाहते हैं।
  • ऐसे घर जिनमें गर्भवती महिलाएं थी, उनमें से 42 फीसदी लोगों ने कहा कि लॉकडाउन के कारण वे गर्भावस्था के दौरान होने वाली नियमित जांचों (चेकअप) को नहीं करा सकीं। पश्चिम बंगाल (29%) और ओडिशा (35%) इस सूची में सबसे निचले पायदान वाले राज्यों में रहे।
  • डेयरी और पोल्ट्री उद्योग से जुड़े 56 फीसदी लोगों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें अपने उत्पाद बेचने में बहुत कठिनाई हुई जबकि 35 फीसदी ने कहा कि उन्हें अपने उत्पाद का सही कीमत नहीं मिला।
  • 78 प्रतिशत लोगों ने कहा कि लॉकडाउन के कारण उनका काम (रोजगार) पूरी तरह से रुक गया या काफी हद तक प्रभावित हुआ। 44 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनका काम लॉकडाउन के दौरान पूरी तरह ठप हो गया।
  • 71 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उनके परिवार की मासिक आय में गिरावट आई।
  • सबसे अधिक गरीब प्रभावित हुए। 75 फीसदी गरीब परिवारों और 74 फीसदी निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के मासिक आय में गिरावट दर्ज हुई।
  • 38 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें जरूरी दवा या चिकित्सा मिलने में परेशानी हुई। पूर्वोत्तर राज्य इससे सबसे अधिक प्रभावित रहें। असम में 87% और अरुणाचल प्रदेश में 66% परिवारों ने कहा कि उन्हें जरूरी दवा या चिकित्सा उपलब्ध नहीं हुई।
  • आंगनबाड़ी और सरकारी स्कूलों में पंजीकृत बच्चों वाले आधे से अधिक परिवारों (54%) को लॉकडाउन के दौरान सूखा राशन/भोजन प्राप्त हुआ। उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर-लद्दाख और छत्तीसगढ़ में यह प्रतिशत क्रमशः 90%, 89% और 86% रहा, जो कि अधिकतम है। जबकि बिहार और गुजरात में क्रमश: 32% और 25% के साथ सबसे नीचे के राज्य रहें।
  • 64 फीसदी लोगों ने कहा उन्हें या उनके घर में किसी शख्स को लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा भेजी गई आर्थिक सहायता (जनधन 500 रुपए महीना, 2000 रुपए पीएम किसान योजना, 1000 रुपए श्रम कल्याण योजना या उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी गैस की सब्सिडी) बैंक खाते में सीधी पहुंची, हालांकि सबसे गरीब परिवारों को इन डीबीटी योजनाओं का उतना लाभ नहीं मिल पाया।
  • 40% लोगों ने कहा कि लॉकडाउन 'बहुत कठोर' था, जबकि 38% ने कहा कि यह 'पर्याप्त कठोर' था। वहीं 11% ने कहा कि लॉकडाउन को और कठोर होना चाहिए था। जबकि 4% लोग ऐसे भी थे जिन्होंने कहा कि लॉकडाउन बिल्कुल नहीं होना चाहिए था।

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