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गन्ने की खेती छोड़ अपनाई सहफसली खेती, केले के साथ पपीते की खेती ने बढ़ाई आमदनी

केले और पपीते का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से आज रजनीश की अलग पहचान बन सकी है। अब और राज्यों के किसान भी उनसे सहफसली खेती करने के लिए सलाह लेने के लिए आते हैं।

Mohit SainiMohit Saini   25 Aug 2020 6:31 AM GMT

मेरठ (उत्तर प्रदेश)। रजनीश पहले गन्ने की खेती करते थे, पर चीनी मिल से उन्हें कभी समय पर भुगतान नहीं मिला। परेशान होकर रजनीश ने गन्ने की खेती छोड़ दी और सहफसली खेती को अपनाया।

उन्होंने केले के साथ पपीते की सहफसली खेती करनी शुरू की। आठ सालों की कड़ी मेहनत के बाद आज रजनीश न सिर्फ अपने क्षेत्र में सबसे अच्छी गुणवत्ता का केला उत्पादन कर रहे हैं, बल्कि अच्छी आमदनी भी कमा रहे हैं।

इतना ही नहीं, रजनीश दूसरे किसानों को भी सहफसली खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। अपने क्षेत्र में बड़े पैमाने में केले का उत्पादन करने में एक बार फिर रजनीश आगे रहे हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले से 23 किलोमीटर दूर गढ़मुक्तेश्वर ब्लॉक सँभावली में गाँव दात्यना के रहने वाले रजनीश त्यागी अपने क्षेत्र में अकेले किसान हैं जो आठ एकड़ में इतने बड़े पैमाने में केले और पपीते की खेती कर रहे हैं।

रजनीश 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "समय के साथ परिवर्तन जरूरी है, पहले गन्ने में खेती में इतनी आमदनी भी नहीं हो पाती थी, तब मैंने केले के साथ सहफसली में पपीते की खेती शुरू की, पहले लोगों ने स्वीकार नहीं किया मगर आज हमें अच्छी आमदनी मिल रही है, जब तक हमारे केले की फसल तैयार होती है, उससे पहले हमारा पपीता तैयार होकर बिक जाता है, अच्छे दामों में पपीता भी बिकता है।"

केले की नर्सरी तैयार कर उनसे पौध देकर और किसानों को भी कर रहे केले की खेती के लिए प्रोत्साहित। फोटो : गाँव कनेक्शन

केले की प्रजाति के बारे में पूछने पर रजनीश बताते हैं, "हमारे पास जी-9 केले की प्रजाति है जिसमें सबसे अच्छा फल आता है और सबसे बड़ी बात यह है कि हमने पिछले दो सालों से अपने फार्म पर नर्सरी भी तैयार कर ली है, वहां हम जी-9 प्रजाति के पौधे तैयार कर रहे हैं।"

रजनीश के मुताबिक जहाँ पहले गन्ने की खेती से प्रति एकड़ ज्यादा से ज्यादा सवा लाख रुपये कमा पाते थे, वहीं अब केले और पपीते की खेती से तीन लाख रुपये एकड़ तक निकल जाता है।

केले की नर्सरी के बारे में रजनीश कहते हैं, "हमने दो साल पहले नर्सरी भी तैयार की, इससे हम और किसानों को भी कम दामों में केले की पौध दे पाते हैं, इससे भी हमें थोड़ा मुनाफा होता है, साथ ही और किसान भी केले के साथ सहफसली खेती करने के लिए प्रेरित होते हैं।"

केले और पपीते का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से आज रजनीश की अलग पहचान बन सकी है। अब और राज्यों के किसान भी उनसे सहफसली खेती करने के लिए सलाह लेने के लिए आते हैं।

रजनीश बताते हैं, "मेरे पास असम, गुवाहाटी, केरल, मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों से किसानों के फोन आते हैं और वह सलाह भी लेते हैं कि हमें सहफसली के साथ केले की खेती करनी है।"

अपने क्षेत्र में बड़े पैमाने में केले का उत्पादन करने में एक बार फिर रजनीश आगे रहे। फोटो : गाँव कनेक्शन

केले का फूल भी हैं गुणकारी, डायबिटीज के मरीजों के लिए लाभकारी

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. आरएस सेंगर 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी किसान केले की खेती करने लगे हैं। कच्चा केला सब्जी के रूप में बहुत उपयोग किया जाता है। केले के अलावा उसका फूल भी काफी लाभकारी होता है। यह फूल डायबिटीज के मरीजों को तो लाभ पहुंचाता है, इसके अलावा पाचन क्रिया में भी लाभकारी होता है। एंटी ऑक्सीडेंट्स की मात्रा से भरपूर इन केलों के फूलों को किसान अगर बाजार में बेचें तो इससे अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।"

गांव के लोगो को भी मिल रहा है रोजगार

रजनीश त्यागी बताते हैं, "हमारे खेतों की देखरेख के लिए हमने सात मजदूर भी लगाए हुए हैं जिन्हें गांव में ही रोजगार मिल रहा है और हमें आज खुशी होती है कि हमने ऐसी खेती कर कुछ गांव के लोगों को रोजगार दिया, और वह मजदूरी के साथ केले की खेती भी सीख रहे हैं।"

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