घोड़ों और गधों के जरिए पशुपालकों की आमदनी बढ़ाने के सिखाए गए गुर

घोड़ों और गधों के जरिए पशुपालकों की आमदनी बढ़ाने के सिखाए गए गुरगाय- भैंस ही नहीं बाकी जानवर पालकर भी कमा सकते हैं मुनाफा।

कहा जाता है जब खेती साथ न दे तो पशु पालन करें। लेकिन पशुपालन के नाम पर सिर्फ भैंस की चर्चा होती है। इसलिए गाय-भैंस के अलावा घोड़े-गधे, बकरी और मुर्गियां कैसे किसानों की आमदनी बढ़ाने से सहायक हो सकते हैं इस पर चर्चा तेज हो गई है।

“पशुओं से कमाई के लिए जरुरी है उनकी अच्छी नस्ल और अच्छा पोषण, नस्ल अच्छी होती तो अच्छे रिजल्ट मिलेंगे, दुधारु पशु होगा जो ज्यादा दूध देगा और दूसरे होंगे तो उनकी उपयोगिता बढ़ेगी। दूसरा अच्छा पोषण और रखरखाव होगा तो पशु पालक के साथ पूरी सहभागिता कर पाएगा।” डॉ. बीबीएस यादव, पूर्व कार्यकारी अधिकारी पशुपालन विभाग यूपी बताते हैं।

बुधवार को लखनऊ में उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग और अश्व वंश के लिए काम करने वाली संस्था ब्रुक इंडिया की तरफ से आयोजित कार्यशाला में ऐसे किसानों को पशुओं से आमदनी बढ़ाने के गुर सिखाए गए। यहां पर सबसे ज्यादा जोर घोड़ों, गधों और खच्चरों पर दिया गया। समारोह में इन्हीं पर आधारित शोध रिपोर्ट को भी जारी किया गया।

गांव कनेक्शन से विशेष बातचीत में ब्रुक इंडिया की मुख्य सलाहकार सृजना निज्जर बताती हैं, “यूपी में करीब ढाई लाख घोड़े, गधे और खच्चर हैं और हजारों परिवारों का गुजारा इऩ पर निर्भर है। हमारी संस्था में मेरठ और मुजफ्फरनगर के 4-4 गांवों में जो सर्वे किया है, उसके मुताबिक पशुपालक परिवारों की 80 फीसदी आमदनी इन्हीं पशुओं पर निर्भर है। इसलिए ये बहुत उपयोगी है।”

यह भी पढ़ें- मिलिए दुनिया के ऐसे जानवरों से, तकनीक ने बदल दी जिनकी जिंदगी

उत्तर प्रदेश में इन पशुओं से मुख्य रुप में ईंट भट्टों और यातायात के काम में लाया जाता है, जबकि महाराष्ट्र और दक्षिण के कुछ राज्यों में खेती जबकि पर्यटन और धार्मिक स्थलों पर घोड़े और गधे कमाई का बड़ा जरिया है।

वो बताती हैं, “ पहले इऩ पशुओं पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता है। ग्लैंडर जैसी बीमारी पशु की तुरंत मौत हो जाती थी, और पालक को सिर्फ 200 रुपए मिलते थे हमारे प्रयासों से सरकार ने इसे 25 हजार किया है। अब हम चाहते हैं इन पशुओं का बीमा बड़े पैमाने पर हो और इन्हें ज्यादा से ज्यादा सरकारी सुविधाएं दी जाएं।’

घोड़ा-गधा पालने वालों को ज्यादा सुविधाएं देने की हिमायत करते हुए डॉ. बलभद्र सिंह यादव कहते हैं, “ ये पशु ज्यादातर समाज के सबसे कमजोर लोगों के पास हैं, ऐसे में उन्हें सुविधाएं मिलने से इन परिवारों का जीवन स्तर बेहतर होगा।’

पूरे देश में अश्व वंश की संख्या करीब 12 लाख है। सृजना निज्जर कहती हैं, पिछले कुछ वर्षों में इन पशुओं के प्रति लोगों का लगाव कम हुआ है, क्योंकि इनका उपयोग कम होता जा रहा है। जैसे यूपी में सिर्फ ईंट भट्टों पर ही 75 फीसदी तक ये उपयोग होते हैं। इसलिए हम चाहते हैं प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं को देखते हुए यूपी सरकार कुछ पर्टयन स्थलों पर सिर्फ घोड़ों को साधन बनाए। जैसे हिमाचल में कुफरी और महाराष्ट्र के माथेरान मो होता है।” समारोह में जहां ईंट भट्टे बंद हो रहे हैं, वहां के पशुओं और पशुपालकों को पुर्नवास की भी मांग की गई।

उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग और ब्रुक इंडिया संस्था ने किसानों के लिए आयोजित की कार्यशाला।

ये भी पढ़ें- नेपियर घास एक बार लगाएं पांच साल हरा चारा पाएं

उत्तर प्रदेश के बाहर वैष्णों देवी, बद्रीनाथ केदारनाथ में काफी लंबा सफर घोड़ों और खच्चरों से तय किया जाता है। इन जगहों पर बनी पशुपालकों की समितियां काफी सशक्त हैं। जबकि यूपी में सिर्फ ईंट भट्टे, बालू-मौरंग की ढुलाई, तांगा और शादी-बारात में ही इस्तेमाल किए जाते हैं।

अश्व वंश में ही ऐसे पशु पाए जाते हैं जो नर हो या मादा दोनों का अच्छे से उपयोग होता है। इसलिए ऐसे पशुओं को लाभकारी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। कार्यशाला में कई जिलों की महिलाओं को भी बुलाया गया था। मेरठ के कक्केपुर से आईं कमलेश (45 वर्ष) बताती हैं, “मेरे पास 3 घोड़ियां हैं जो साल के कुछ महीने ईंट-भट्टे और बाकी समय चारा ( गन्ने के अगौरा) बेचने का काम करते हैं। यहां हमने सीखा है, कैसे घोड़ों की सेवा की जाए, क्या और कैसे खिलाया जाए। उनके रहने की जगह साफ सुथरी रखनी होगी, इससे वो बीमार नहीं होंगे और काम भी अच्छा करेंगे।’

इस एक दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ विशेष सचिव पशुपालन विभाग सतेंद्र सिंह ने किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि सरकार की कोशिश है किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए उसकी हर तरह से मदद की जाए। छोटे पशुपालकों को भी मदद के दायरे में लाया गया है।

इस दौरान विभाग के कर्मचारियों को भी जागरुक किया कि किसानों को कैसे लाभ के दायरे में लाया जा सकता है। समारोह में पशु विशेषज्ञ और बरेली में मीरगंज के विधायक डीसी वर्मा, पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. सीएस यादव समेत नाबार्ड, पशुपालन विभाग और ब्रुक इंडिया के कई अधिकारी और मौजूद रहे।

ये भी पढ़ें- गधों और घोड़ों पर मंडरा रहा है लाइलाज बीमारी का खतरा, इस बीमारी का इलाज है सिर्फ मौत

अख़बार में प्रकाशित ख़बर

महंगा चूनी चोकर और मजदूरों की कमी पशुपालन और डेयरी इंडस्ट्री की राह का रोड़ा

क्या आपने गधों के अस्पताल के बारे में सुना है?

वर्ल्ड एनिमल डे विशेष : गाय भैंस के लिए कृत्रिम गर्भाधान बेहतर लेकिन ये हाईटेक उपकरण और जानकारी ज़रूरी

Share it
Top