भावांतर को पूरे देश में लागू करने की सुगबुगाहट लेकिन, एमपी के किसान ही खुश नहीं...

भावांतर को पूरे देश में लागू करने की सुगबुगाहट लेकिन, एमपी के किसान ही खुश नहीं...क्या किसानों की इस योजना का लाभ किसानों को मिलेगा ?

नेशनल ब्यूरो ऑफ इंडिया के सर्वे के अनुसार मध्य प्रदेश में किसानों की संख्या 54 लाख है, जबकि शिवराज सरकार के अनुसार इस योजना के लिए केवल 21 लाख 88 हजार किसानों का ही रजिस्ट्रेशन हुआ। फिर योजना को सफल कैसे बताया जा सकता है ?

“पांच नवंबर को आठ क्विंटल उड़द की फसल मंडी में भावांतर योजना के तहत बेची थी। अभी तक पैसा नहीं मिला है। पैसे की अभी सख्त आवश्यकता है। खाद खरीदना है, लेकिन नहीं खरीद पा रहा हूं। किसी से कर्ज लेना पड़ेगा।" ये कहना है मध्य प्रदेश, दतिया के विजनापुर निवासी किसान अतरसिंह (45) का।

मध्य प्रदेश के ज्यादातर जिलों के किसानों का यही हाल है। लेकिन जरा सोचिए, जब ये योजना पूरे देश में लागू हो जाएगी तो किसानों का क्या होगा। कहीं ऐसा न हो जाये कि भावांतर के भंवर में किसान फंसे रह जाएं। मध्य प्रदेश की ये योजना हरियाणा सरकार ने भी अपने यहां लागू करने का फैसला लिया है। पिछले दिनों हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट‌्टर ने इसकी घोषणा की।

31 दिसंबर को इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से एक खबर में बताया कि केंद्र सरकार इस योजना को पूरे देश में लागू करने के लिए राज्यों से बात करने वाली है। केंद्र की योजना का खाका भी मध्य प्रदेश की योजना के अनुरूप होगा। सूत्रों के अनुसार 28 दिसंबर को मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच इसके आर्थिक मसले पर भी बात हुई।

ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि योजना को पूरे देश में फसल बीमा योजना की तरह लागू किया जाएगा। योजना के खर्च का वहन प्रदेश और केंद्र सरकार 50:50 करेगी। मध्य प्रदेश सरकार भले ही भावांतर योजना को सफल बता रही हो, लेकिन बेहतर प्रचार-प्रसार और विभागीय लापरवाही के चलते इस योजना का लाभ मध्य प्रदेश के किसान उठा ही नहीं पा रहे हैं।

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मंडी में भावों के उतार-चढ़ाव से किसानों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए पिछले दिनों मध्य प्रदेश सरकार ने 2017 के लिए चालू खरीफ के मौसम में प्रायोगिक आधार पर ‘‘मुख्यमंत्री भावांतर भुगतान योजना’’ शुरू की। इस योजना के तहत सरकार किसान को मंडी में उपज का दाम कम मिलने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य या औसत आदर्श दर से अंतर की राशि का सरकार सीधे किसान के खाते में भुगतान करेगी।

mpinfo.org ने एक जनवरी 2018 को विज्ञप्ति जारी की जिसमें बताया गया कि भावांतर भुगतान योजना में पंजीबद्ध 5 लाख 12 हजार किसानों ने एक से 30 नवम्बर 2017 के बीच अधिकृत कृषि उपज मण्डियों में अपनी फसल समर्थन मूल्य पर व्यापारियों को बेची। राज्य सरकार द्वारा इन किसानों को कुल 703 करोड़ 96 लाख रुपए भावांतर राशि इसी माह बैंक खातों में दी जाएगी। इसके पूर्व योजनान्तर्गत 16 से 31 अक्टूबर 2017 तक 1.28 लाख पंजीकृत किसानों ने अधिकृत मंडियों में अपनी फसल बेची थी। इन्हें राज्य सरकार ने 136 करोड़ 75 लाख रुपए भावांतर राशि का भुगतान कर दिया है। इसी योजना में मक्का की विक्रय अवधि को राज्य सरकार ने 31 जनवरी 2018 तक बढ़ा दिया है।

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मध्य प्रदेश में भावांतर भुगतान योजना में 21 लाख 88 हजार 764 किसानों ने पंजीयन कराया। योजना में 41 लाख 43 हजार 389 हेक्टयर रकबा कवर किया गया है। किसानों को भावांतर राशि का भुगतान डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) सिस्टम से सीधे बैंक खाते में किया जा रहा है। इसकी सूचना किसानों को उनके मोबाइल पर एसएमएस के माध्यम से भी दी जा रही है। किसानों को भावांतर राशि के साथ गोदाम भंडारण अनुदान राशि भी दी जा रही है। दोनों लाभ एक साथ दिए जा रहे है। गोदाम भंडारण अनुदान को 7 रुपए प्रति क्विंटल प्रतिमाह से बढ़ाकर 9 रुपये 90 पैसे प्रति क्विंटल प्रतिमाह कर दिया गया है।

गांव कनेक्शन के पेज एक पर प्रकाशित खबर..

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योजना अक्टूबर से शुरू हुई। इसके लिए किसानों का रजिस्ट्रेशन भी करवाया गया। गड़बड़ी यहीं से शुरू हो गई। इससे पहले भी कई योजनाएं ऐसी रही हैं जिनकी पहुंच से किसान दूर रहे और परिणाम ये रहा कि योजना असफल रही। इस योजना का लब्बोलुआब भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है। नेशनल ब्यूरो ऑफ इंडिया के सर्वे के अनुसार मध्य प्रदेश में किसानों की संख्या 54 लाख है, जबकि मध्य प्रदेश सरकार के अनुसार इस योजना के लिए केवल 21 लाख 88 हजार किसानों का ही रजिस्ट्रेशन हुआ। फिर योजना को सफल कैसे बताया जा सकता है। आधे से ज्यादा किसानों का तो रजिस्ट्रेशन ही नही हुआ है। योजना का सही क्रियान्वयन जब एक प्रदेश में नहीं हो पा रहा तो पूरे देश में कैसे होगा।

इस बारे में मध्य प्रदेश, दतिया के कृषि मंडी सचिव एसपी श्रीवास्तव कहते हैं "यह सही है कि नबंवर माह से किसानों के खाते में अभी तक भावांतर योजना की राशि नहीं आई है। एक नवंबर से 22 दिसंबर तक करीब 16 करोड़ धनराशि आना है। इसके लिए मैंने शासन को मांग पत्र भी भेजा है। साथ ही कलेक्टर को भी अवगत कराया गया है। धनराशि आने के बाद तत्काल किसानों के खाते में भेजी जाएगी।"

फ्लाप सिद्ध हो रही है योजना

योजना के लागू होते ही राज्य की मंडियों में सोयाबीन एंव उड़द के भाव पिछले तीन बरसों के न्यूनतम स्तर पर आ चुके हैं। मंडी में न्यूनतम मूल्य का खामियाजा उन किसानों को भुगतना पड़ा है, जिन्होंने भावान्तर योजना में पंजीयन प्रक्रिया की जटिलता को देखकर पंजीयन नहीं कराया था। राज्य में 45 फीसदी किसान अभी भी भावान्तर योजना में पंजीकृत नहीं हो पाये हैं।

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इसमें अधिकांश अनपढ़ एंव गरीब तबके के वह किसान हैं जिनके पास खेती के छोटे-छोटे रकबे हैं। योजना में किसान को पंजीयन के बाद बिक्री पर्ची को लेकर मंडी कर्यालय में पहुंचकर बिक्री पर्ची को पुन: भावान्तर के पोर्टल पर अपडेट कराना होता है। इस प्रक्रिया के लगभग एक सप्ताह बाद ही मंडी कर्मचारी उसकी बिक्री का प्रमाण पत्र जारी करते हैं। इस तरह एक फसल बेचने के बाद किसान को कम से कम तीन बार शहर की मंडी के चक्कर लगाना पड़ रहे हैं।

सतना के किसान पुष्पेंद्र पांडेय का कहना है "भावांतर योजना के तहत अंतर का पैसा कब मिलेगा ये पता नहीं, लेकिन फौरी तौर पर किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। किसानों को जानकारी नहीं है कि पैसा खातों में कब आएगा। सरकार के ऐलान के उलट किसान को कैश मिलने में भी भारी परेशानी हो रही है। सोयाबीन और उदड़ की दर काफी घट गई है। ऐसे में किसान बेहद गुस्से में हैं।"

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सीएम शिवराज की गेम चेंजर कही जा रही इस भावांतर योजना को लेकर किसानों की नाराजगी की वजह ये भी है कि सरकार ने बाजार मूल्य और एमएसपी के अंतर का ही भुगतान किसानों को देने का फैसला किया है। ये फायदा भी किसानों को खरीदी बंद होने के दो महीने बाद किया जाएगा। ऐसे में अब किसानों की मांग है कि भाव के अंतर के बजाए सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदी कराना सुनिश्चित कराए। योजना को लेकर उठ रहे सवालों के बाद सरकार के अधिकारी सामने आकर सफाई ज़रूर दे रहे हैं लेकिन किसानों को फायदा कैसे मिलेगा इस पर उनके पास भी कोई पुख्ता जवाब नहीं है।

इसी तरह देवास, तहसील खातेगांव के हरणागांव के किसान हेमेंत गुर्जर कहते हैं " फसल बेचे हुए एक महीने से ज्यादा का समय हो गया है। कब मिलेगा, ये भी पता नहीं है। हमें तो पता ही नहीं कि ये योजना किसानों के लिए है या उसके खिलाफ।"

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