मिड-डे मील में शामिल होंगे मोटे अनाज, किसानों को मिल सकता है कमाई का नया जरिया

मिड-डे मील में शामिल होंगे मोटे अनाज, किसानों को मिल सकता है कमाई का नया जरियासरकार ने 2018 को मोटे अनाज का वर्ष घोषित करने का निर्णय लिया है

मोटे अनाज खराब मिट्टी में भी अच्छी तरह उग सकते हें। मोटे अनाज जल्दी खराब नहीं होते। देश का 40 फीसदी खाद्यान्न बेहतर रखरखाव के अभाव में नष्ट हो जाता है, जबकि मोटे अनाज उगने के 10 से 12 वर्ष बाद भी खाने योग्य बने रहते हैं

सरकार मोटे अनाज को प्रोत्साहित करने की योजना बना रही है। इसके लिए मोटे अनाज को मध्यान्ह भोजन में शामिल तो किया ही जा रहा है साथ ही सरकार ने 2018 को मोटे अनाज का वर्ष घोषित करने का निर्णय लिया है।

दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा "सरकार पोषण सुरक्षा को हासिल करने के लिए मिशन स्तर पर रागी और ज्वार जैसे मोटे अनाज की खेती को प्रोत्साहित कर रही है। उन्होंने कहा कि बाजरा, जिसे कि पोषक अनाज कहा जाता है, को समर्थन मूल्य पर खरीदा जा रहा है और इसे मध्यान्ह भोजन योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत शामिल किया जा रहा है।"

वेबसाइट इंडियास्पेंड के अनुसार, गेहूं और धान की तुलना में मोटे अनाजों को कम संसाधनों की जरूरत होती है। मसलन, बाजरा और रागी को धान की तुलना में एक तिहाई पानी की जरूरत होती है। मोटे अनाज खराब मिट्टी में भी अच्छी तरह उग सकते हें। मोटे अनाज जल्दी खराब नहीं होते। देश का 40 फीसदी खाद्यान्न बेहतर रखरखाव के अभाव में नष्ट हो जाता है, जबकि मोटे अनाज उगने के 10 से 12 वर्ष बाद भी खाने योग्य बने रहते हैं। इसके अलावा ये मैग्नीशियम, विटामिन बी3 और प्रोटीन से भरपूर होने के साथ ग्लूटन फ्री होते हैं। इस लिहाज से ये शुगर के रोगियों के लिए आदर्श भोजन साबित हो सकते हैं। इनके इसी गुण की वजह से इन्हें अब सुपर फूड के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।

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सिंह ने आगे कहा "सरकार ने 2018 को राष्ट्रीय मोटे अनाज का वर्ष भी घोषित करने का निर्णय लिया है। पोषण सुरक्षा को प्राप्त करने के लिए बाजरा की खेती को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं क्योंकि 2016-17 के फसल वर्ष में खेती का रकबा घटकर एक करोड़ 47.2 लाख हेक्टेयर रह गया जो रकबा वर्ष 1965-66 में तीन करोड़ 69 लाख हेक्टेयर था।"

उन्होंने कहा कि खपत पद्धति में परिवर्तन, खानपान की आदतें, बाजरे की अनुपलब्धता, कम उपज, कम मांग तथा सिंचित भूमि को चावल और गेहूं उगाने के लिए इस्तेमाल किए जाने के कारण बाजरा सहित मोटे अनाज की खेती में कमी आई है। इसके परिणामस्वरूप, प्रोटीन, विटामिन ए, आयरन और आयोडीन जैसे पोषक तत्वों का स्तर महिलाओं और बच्चों में घटा है। इस कारण ज्वार, रागी सहित मोटे अनाज पर विशेष ध्यान गया है तथा नीति आयोग के सदस्य रमेश चन्द की अगुवाई वाली समिति की सिफारिशों के बाद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) के तहत इन मोटे अनाजों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

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उल्लेखनीय है कि 18 जुलाई 2017 को आयोजित बैठक में प्रधानमंत्री ने पोषण सुरक्षा में सुधार लाने के लिए लोक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत पौष्टिक धान्यों का वितरण शुरू करने का निर्णय लिया था। इसके बाद 13 अक्तूबर 2017 को नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद की अध्यक्षता में एक बैठक का आयोजन किया गया था, जिसमें लोगों के आहार में पोषक तत्वों को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से देशभर में पीडीएस के माध्यम से पौष्टिक धान्य अर्थात ज्वार, बाजरा और रागी के उपयोग को बढ़ावा देने का फैसला लिया गया था। इस विभाग ने निर्णय लिया है कि पौष्टिक धान्य को मोटे अनाजों की श्रेणी से निकालकर पौष्टिक धान्य उप-मिशन में शामिल कर लिया जाए।

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