इसी मौसम में लगते हैं धान में कीट और रोग : समय से करें प्रबंधन

इसी मौसम में लगते हैं धान में कीट और रोग : समय से करें प्रबंधनधान की फसल में रोपाई के बाद रसायनिक उर्वरकों का इस्तेमान होने से बढ़ जाता है कीटों व रोगों का प्रकोप

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

रायबरेली। देश में करीब 90 फीसदी किसानों ने धान की बुवाई कर ली है। समय पर धान की फसल में कीट प्रबंधन न करने से धान की फसल में कई रोगों का प्रकोप हो जाता है, जिससे किसानों को नुकसान झेलना पड़ता है। समय रहते धान की फसल में कीट प्रबंधन तकनीक अपनाकर किसान अपनी फसल को हानिकारक रोगों से बचा जा सकता है।

रायबरेली जिला मुख्यालय से लगभग 27 किमी दूर कुंदनगंज क्षेत्र में रहने वाले किसान संग्राम सिंह (62 वर्ष) पांच एकड़ खेत में धान की बुवाई की है।धान की उन्नत खेती के लिए उन्हें जिला प्रशासन की ओर से सम्मानित भी किया जा चुका है। संग्राम बताते हैं,'' धान में यूरिया की पहली टॉप ड्रेसिंग के बाद फसल तेज़ी से बढ़ती है। इस समय सफेद फुदका कीट धान की जड़ में लग जाता है। यह कीट जड़ के रस को चूस लेता है,जिससे फसल सूखकर गिरने लगती है।इससे पैदावार पर भी उल्टा असर पड़ता है।''

कृषि विभाग , उत्तर प्रदेश के अनुसार प्रदेश में इस बार 59.66 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान खेती की गई है और इससे 150 लाख मीट्रिक टन धान उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।किसानों को धान की उन्नत खेती के लिए जिला कृषि विभाग और केवीके के माध्यम से उच्च गुणवत्ता के बीज, खाद और कीटनाशक उप्लब्ध करवाए जा रहे हैं, ताकी किसानों को समय से अच्छी पैदावार मिल सके।

केन्द्रीय नाशीजीवी प्रबंधन केंद्र, लखनऊ के कृषि विशेषज्ञ राजीव कुमार बताते हैं,'' धान की फसल में रोपाई के बाद रसायनिक उर्वरकों का इस्तेमान होने से रोगों का प्रकोप सबसे अधिक होता है।सही समय पर अगर धान में कीट प्रबंधन न किया जाए तो, फसल में पर्णच्छाद अंगमारी, आभासी कंड, भूरा धब्बा और शीथ ब्लाइट रोगों का खतरा बढ़ जाता है।इसके अलावा फसल प्रबंधन में देरी होने से धान में पत्ती लपेटक, सफेद भुदका और तना छेदक कीटों का प्रकोप हो जाता है।''

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रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय व्दारा धान की फसल में कीट व रोग नियंत्रण पर की गई शोध में यह सामने आया है कि धान की फसल में उपज घटाने में 33 प्रतिशत खरपतवार, 26 प्रतिशत रोगों से , 20 फीसदी कीट, आठ प्रतिशत चूहे और तीन प्रतिशत चिड़ियों से नुकसान होता है। धान की फसल में भरपूर उपज और आर्थिक लाभ के लिए फसल को हानिकारक कीट एवं रोगों से बचाना आवश्यक होता है।इसलिए समय से धान में फसल प्रबंधन बेदह ज़रूरी होता है।

धान की फसल में कीट प्रबंधन के बारे में जिलों में स्थापित किए गए कृषि विज्ञान केंद्र जागरुकता कार्यक्रम चला रहे हैं। इन कार्यक्रमों में किसानों को समय पर धान में संतुलित मात्रा में कीटनाशक, धान की उन्नत किस्मों का चयन और रोगों के प्रभाव को नियंत्रित करने के बारे में बताया जाता है।

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धान की खेती में फसल प्रबंधन के बारे में चंद्रशेखर आज़ाद कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक शैलेंद्र विक्रम सिंह ने बताया,'' इस समय अगैती धान की फसल में किसान टॉप ड्रेसिंग कर रहे हैं।इस दौरान फसल में कीटों व रोगों का प्रकोप सबसे अधिक होता है। कृषि विभाग, उत्तर प्रदेश ने कृषि विश्वविद्यालयों व्दारा संचालित किए जा रहे कृषि विज्ञान केंद्रों को किसानों धान में फसल प्रबंधन की तकनीक समझाने का निर्देश दिया है। इससे प्रदेश के धान उत्पादन पर अच्छा असर पड़ेगा।''

धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग व कीट

प्रमुख रोग - पर्णच्छाद अंगमारी -

यह रोग मुख्यरूप से फसल की शुरूआती अवस्था में पत्तियों पर दिखाई देता है।इस रोग में पत्तियां में पीला आने लगता है और पत्तियां सूख जाती हैं। इस रोग के लक्षण दिखने पर संतुलित मात्रा में नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। बीज को थीरम 2.5 ग्राम/किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें। जुलाई व अगस्त में रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैकोजेब (0.24 प्रतिशत) का छिड़काव करें।

भूरी चित्ती रोग -

इस रोग के लक्षण मुख्यतया पत्तियों पर छोटे- छोटे भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देतें है। उग्र संक्रमण होने पर ये धब्बे आपस में मिल कर पत्तियों को सूखा देते हैं। इस रोग का प्रकोप धान में कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में अधिक दिखाई देता है।

इस रोग के रोकथाम के लिए बुवाई से पहले बीज को ट्राईसाइक्लेजोल दो ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर 10-20 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील धूल की 15-20 ग्राम मात्रा को लगभग 15 ली पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

प्रमुख कीट - धान का तना छेदक कीट -

यह कीट फसल की सूड़ी अवस्था में सबसे हानिकारक होती है। सबसे पहले अंडे से निकलने के बाद सूड़ियां मध्य कलिकाओं की पत्तियों में छेदकर अन्दर घुस जाती हैं और अन्दर ही अन्दर तने को खाती हुई गांठ तक चली जाती हैं। पौधों की बढ़वार की अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां नहीं निकलती हैं।

इस कीट से बचाव के लिए जिंक सल्फेट में बुझा हुआ चूना (100 ग्राम+ 50 ग्राम) प्रति नाली की दर से 15-20 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। पौध रोपाई के समय पौधों के ऊपरी भाग की पत्तियों को थोड़ा सा काटकर रोपाई करें, जिससे अंडे नष्ट हो जाते हैं।

धान का पत्ती लपेटक कीट -

मादा कीट धान की पत्तियों के शिराओं के पास समूह में अंडे देती हैं। इन अण्डों से छह-आठ दिनों में सूड़ियां बाहर निकलती हैं। ये सूड़ियां पहले मुलायम पत्तियों को खाती हैं और बाद में अपने लार से रेशमी धागा बनाकर पत्ती को किनारों से मोड़ देती हैं और अन्दर ही अन्दर खुरच कर खाती है।

इस कीट से बचाव के लिए मालाथियान पांच प्रतिशत विष धूल की 500-600 ग्राम मात्रा प्रति नाली की दर से छिड़काव करें। खेत के मेड़ों पर उगे घास की सफाई करें क्योंकि इन्ही खरपतवारों पर ये कीट पनपते रहते हैं और दुग्धावस्था में फसल पर आक्रमण करते हैं।

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