ऐसे बनते हैं रेशम के धागे, जिनसे बनती हैं रेशमी साड़ियां

रेशम की साड़ियां और कपड़े तो सभी ने देखें होंगे, लेकिन किस तरह रेशम के धागे बनाए जाते हैं, कम ही लोग जानते होंगे, महीनों की मेहनत के बाद बनते हैं ये धागे, जिनसे बनती हैं रेशमी साड़ियां।

सोनभद्र। रेशम की साड़ियां और कपड़े तो सभी ने देखें होंगे, लेकिन किस तरह रेशम के धागे बनाए जाते हैं, कम ही लोग जानते होंगे, महीनों की मेहनत के बाद बनते हैं ये धागे, जिनसे बनती हैं रेशमी साड़ियां।

सोनभद्र के जंगलों में पिछले कई वर्षों ये यहां के लोग रेशम कीटों को पालकर उनसे रेशमी धागे बनाने का काम कर रहे हैं। सोनभद्र से करीब 130 किमी. दूर दुद्धी ब्लॉक के गोविंदपुर में दस हज़ार हेक्टेयर में रेशम के फार्म हैं, इस फार्म में अर्जुन के पेड़ों पर रेशम के कीट पाले जाते हैं, जिससे यहां के स्थानीय आदिवासी परिवारों को भी रोजगार मिल रहा है।


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फार्म के प्रमुख हरी प्रसाद बताते हैं, "हम काकून को कूकर में सोडा डालकर उबालते हैं, उबालने के बाद इसका धागा अलग-अलग होने लगता है, उसके बाद उसे छीलते हैं छीलने के बाद एक-एक धागा उससे निकलने लगता है। जब एक-एक धागा निकलेगा तो उसे हम लगा देंगे, जिस तरह से हमें मोटा पतला धागा चाहिए होता है, उसी हिसाब से काकून लगाते हैं, धागा निकालने के बाद उसे हम बुनकर को दे देते हैं।"

रेशम कीट पालन के बारे में वो बताते हैं, "रेशम के कीड़े (ककून) कोल्ड स्टोर करके रखते हैं और फिर जुलाई में फार्म हाउसों को देते हैं। कुछ समय बाद ककून से तितली निकलती है। एक तितली एक हजार से ज्यादा अंडे देती है। अंडों से इल्ली (कीड़े) निकलते हैं, जिनको अर्जुन के पेड़ पर छोड़ते हैं, जिससे रेशम तैयार होती है।"


गोविंदपुर रेशम फार्म हाउस में पिछले 25 वर्षों से रेशम का धागा बनाने में कार्यरत रजवन्ती देवी (58 वर्ष) बताती हैं, "सबसे पहले कट ककून को उबालते हैं फिर कई घड़ो से रेशा निकालकर मशीन पर चढ़ाते हैं। चार से पांच घड़ों के रेशे से एक धागा बनाया जाता है।" यहां की दूसरी कर्मचारी चमेली देवी (40 वर्ष) बताती हैं, "हमारे फार्म हाउस में ककून से रेशम का धागा बनाने वाली 13 मशीने हैं। एक दिन में 80 ग्राम धागा निकलता है।"

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सोनभद्र जिले में 400 एकड़ जंगल में 20 रेशम फार्म है। जंगल क्षेत्र में लगभग 900-1000 परिवारों द्वारा रेशम कोया उत्पादन किया जा रहा है। वर्तमान में प्रति वर्ष लगभग 80 लाख रेशम कोया उत्पादन हो रहा है, जिसका बाजार मूल्य लगभग एक करोड़ का होता है।


रेशम की खेती तीन प्रकार से होती है- मलबेरी खेती, टसर खेती व एरी खेती। उत्तर प्रदेश में मलबेरी के लिए 158 फार्म, टसर के 56 फार्म व एरी के तीन फार्म हैं, जिनमें 57 जिलों में रेशम का उत्पादन किया जा रहा है। प्रदेश में कुल 25 हजार रेशम कीट पालक हैं। भारत का रेशम उत्पादन धीरे-धीरे बढ़कर जापान और पूर्व सोवियत संघ देशों से ज्यादा हो गया है, जो कभी प्रमुख रेशम उत्पादक हुआ करते थे। भारत इस समय विश्व में चीन के बाद कच्चे सिल्क का दूसरा प्रमुख उत्पादक है।

इन राज्यों में होता है रेशम का उत्पाद

भारत में शहतूत रेशम का उत्पादन मुख्यतया कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में किया जाता है जबकि गैर-शहतूत रेशम का उत्पादन झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में होता है।

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